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श्रीराम का विग्रह ही श्रीराम मंदिर, रामोला, खाचरोद की चल-अचल संपत्तियों का पूर्ण स्वामी 

 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट खंडपीठ इंदौर का आदेश
 

 

उज्जैन,1 सितम्बर(इ खबर टुडे)। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 5 दशक से अधिक समय से चले आ रहे मंदिर विवाद में आंशिक राहत देते हुए श्रीराम मंदिर के देवता को मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों का स्वामी घोषित किया, राज्य के प्रबंधन को मान्यता दी और रतनदास की पुजारी के रूप में नियुक्ति को वैध ठहराया। हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने वाद खारिज करके त्रुटि की थी। उसने 1968 के निर्णय को निरस्त करते हुए घोषित किया कि श्रीराम की मूर्ति ही श्रीराम मंदिर, रामोला, खाचरोद तथा उससे संबंधित चल-अचल संपत्तियों की पूर्ण स्वामिनी है। यह भी घोषित किया कि मंदिर का प्रबंधन राज्य राजस्व विभाग के जरिए करेगा । औकाफ विभाग को पुजारी नियुक्त करने का अधिकार था।  

न्यायमूर्ति विनय सार्राफ ने 25 अगस्त 2026 को प्रथम अपील क्रमांक 59/1968 में यह निर्णय दिया । यह अपील रतनदास ने अपने विधिक प्रतिनिधियों के माध्यम से 1968 में ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके वाद खारिज किए जाने के खिलाफ दायर की थी। हाईकोर्ट विवाद का मुख्य प्रश्न यह था कि मंदिर के प्रबंधन का अधिकार किसे है और क्या रतनदास पुजारी बने रह सकते हैं। वादी का कहना था कि मंदिर की स्थापना बाबा मयरामदास ने की थी और महंत व पुजारी का पद रामानंद संप्रदाय की परंपराओं के अनुसार चलता है। 

दूसरी ओर, माहेश्वरी समाज ने इस दावे का विरोध करते हुए मंदिर के प्रबंधन पर अपना अधिकार जताया। हाईकोर्ट ने मंदिर और उसके प्रबंधन से जुड़े ऐतिहासिक अभिलेख, मौखिक साक्ष्य और दस्तावेजों का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि महंत गोपालदास निर्विवाद रूप से महंत थे और उन्हें शेबायत अधिकार प्राप्त थे। उनके निधन के बाद उनके शिष्य मुरलीदास गद्दी पर बैठे। हालांकि, माहेश्वरी समाज के सदस्यों से विवाद बढ़ने पर मुरलीदास ने स्वयं औकाफ विभाग से मंदिर को उसके पर्यवेक्षण में लेने का अनुरोध किया।

अदालत ने माना कि वर्ष 1930 से राज्य औकाफ विभाग के माध्यम से मंदिर का प्रबंधन करता रहा, जिसे बाद में राजस्व विभाग में मिला दिया गया। फैसले में यह भी दर्ज है कि माहेश्वरी समाज ने मंदिर परिसर के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और निर्मित कमरे, सामुदायिक भवन तथा अन्य संरचनाएं देवता को समर्पित कीं। मुरलीदास की मृत्यु के बाद रतनदास की नियुक्ति भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा थी। अदालत ने साक्ष्यों को स्वीकार किया कि रामानंद संप्रदाय के साधुओं ने भेख संस्कार के बाद रतनदास को महंत नामित किया था। 

बाद में औकाफ समिति ने उनकी नियुक्ति की सिफारिश की और विभाग ने 1948 में उन्हें पुजारी नियुक्त कर दिया। 12 सितंबर 1948 को उन्हें कार्यभार भी सौंपा गया, हालांकि माहेश्वरी पंचों की आपत्ति के बाद वह वापस ले लिया गया। अदालत ने यह आपत्ति भी खारिज कर दी कि विवाह कर लेने के कारण रतनदास पुजारी पद पर बने रहने का अधिकार खो बैठे। न्यायालय ने कहा कि यह मंदिर कोई मठ नहीं है और अविवाहित रहना पुजारी बने रहने की अपरिहार्य शर्त सिद्ध नहीं हुआ। साक्ष्यों से यह भी स्पष्ट हुआ कि विवाहित व्यक्ति भी मंदिर में महंत या पुजारी की जिम्मेदारियां निभा सकता है। 

वाद की ग्राह्यता पर हाईकोर्ट ने कहा कि रतनदास अपने पुजारी कर्तव्यों और शेबायत अधिकारों की मान्यता चाहते थे, न कि मंदिर के स्वामित्व का दावा कर रहे थे। चूंकि देवता स्वामी हैं और संपत्ति का प्रबंधन राज्य कर रहा है, इसलिए उनके लिए कब्जे संबंधी अलग से राहत मांगना आवश्यक नहीं था। अंततः अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने वाद खारिज करके त्रुटि की थी। उसने 1968 के निर्णय को निरस्त करते हुए घोषित किया कि श्रीराम की मूर्ति ही श्रीराम मंदिर, रामोला, खाचरोद तथा उससे संबंधित चल-अचल संपत्तियों की पूर्ण स्वामिनी है। 

अदालत ने यह भी घोषित किया कि मंदिर का प्रबंधन राज्य राजस्व विभाग के जरिए करेगा और औकाफ विभाग को पुजारी नियुक्त करने का अधिकार था। अदालत ने विशेष रूप से कहा कि रतनदास की पुजारी के रूप में नियुक्ति विधिसम्मत थी और उन्हें अपने दायित्व निभाने का अधिकार है। हालांकि, माहेश्वरी समाज के सदस्यों के विरुद्ध स्थायी निषेधाज्ञा देने से अदालत ने इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें मंदिर का भक्त माना गया। 

इस प्रकार अदालत ने समुदाय की भक्त के रूप में स्थिति और मंदिर पर कानूनी नियंत्रण के बीच स्पष्ट अंतर किया। इसी आधार पर अदालत ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार की और खर्चों के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया। रतनदास की ओर से अधिवक्ता ऋषिराज त्रिवेदी पेश हुए। राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता अंशुल राजपुरोहित ने पक्ष रखा, जबकि निजी प्रतिवादियों के विधिक प्रतिनिधियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वीर कुमार जैन, अधिवक्ता मकबूल अहमद मंसूरी की सहायता से उपस्थित हुए।