देवास शंकरगढ़ पहाडी की हरियाली अब विज्ञान के पन्नों में 'इण्डियन फॉरेस्टर' में दर्ज हुई
उज्जैन,01 सितम्बर(इ खबर टुडे / ब्रजेश परमार)। कभी ओपन-कास्ट खनन के कारण पूरी तरह बंजर और अवनमित हो चुकी देवास की शंकरगढ़ पहाड़ी के कायाकल्प की गाथा अब अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मंच पर स्थापित हो गई है। पर्यावरण पत्रिका 'डाउन टू अर्थ' में सराहना पाने के बाद, इस अभूतपूर्व बदलाव को भारत की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'इण्डियन फॉरेस्टर' के जुलाई 2026 अंक में अनुसंधान पत्र के रूप में स्थान मिला है।
भारतीय वन सेवा अधिकारी प्रदीप मिश्रा द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययन "NDVI- and NDMI-Based Assessment of Post-Mining Ecological Restoration in Shankargarh Hills, Madhya Pradesh, India (2017-2025)" ने उपग्रह डेटा के जरिए यह सिद्ध कर दिया है कि जन-भागीदारी और वैज्ञानिक तकनीकों के मेल से उजड़ी हुई ज़मीन पर भी हरियाली लौटाई जा सकती है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश के बाद वर्ष 2019 से शुरू हुए इस पुनरुद्धार अभियान में वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और जन-समुदाय ने एक साथ मिलकर कार्य किया। इस उपलब्धि में तत्कालीन वन अधिकारी पी. एन. मिश्रा के मार्गदर्शन, ग्रीन आर्मी के अध्यक्ष समरजीत जाधव एवं उनकी पूरी टीम के निरंतर श्रमदान, तथा देवास जिला प्रशासन, पुलिस विभाग, वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों का ऐतिहासिक योगदान रहा। पहाड़ी पर मिट्टी का कटाव रोकने और पानी रोकने के लिए कंटूर ट्रेंच, चेक डैम, बंध और व्यापक स्तर पर पौधरोपण किया गया, जिससे अवनमित भूमि पुनः उपजाऊ और हरी-भरी बन सकी। उपग्रह आंकड़ों से प्रमाणित मुख्य वैज्ञानिक निष्कर्ष में
सेंटिनल-2 (Sentinel-2) सैटेलाइट इमेजरी के 2017 से 2025 तक के विश्लेषणात्मक आंकड़े शंकरगढ़ की सफलता की पुष्टि करते हैं। इससे कुल 58.5 हेक्टेयर अध्ययन क्षेत्र के 83.4% हिस्से (48.82 हेक्टेयर) में वनस्पति और हरियाली की गुणवत्ता में सकारात्मक सुधार दर्ज हुआ है। वनस्पति सूचकांक (NDVI) में वर्ष 2017 में औसत NDVI मान 0.19 था, जो 2025 में बढ़कर 0.30 हो गया। यह सुधार क्षेत्र में तेजी से बढ़ती वनस्पति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
सघन हरियाली का विस्तार में 2017 में विरल (Sparse) वनस्पति का दायरा 32.79 हेक्टेयर था, जो 2025 में घटकर 9.00 हेक्टेयर रह गया। वहीं, मध्यम हरियाली 25.37 से बढ़कर 41.07 हेक्टेयर और सघन वनस्पति (Dense Vegetation) 0.31 हेक्टेयर से बढ़कर 8.37 हेक्टेयर हो गई। मृदा नमी में वृद्धि (NDMI) में जल एवं मृदा संरक्षण संरचनाओं के कारण सतह की नमी और जल धारण क्षमता (NDMI Max) में निरंतर सुधार देखा गया है।
1875 से प्रकाशित हो रही 'इण्डियन फॉरेस्टर' देश में वानिकी, पर्यावरण और पारिस्थितिकी अनुसंधान का सर्वोच्च मानक मानी जाती है। इस पत्रिका में प्रकाशन से यह साबित होता है कि शंकरगढ़ का प्रयास केवल एक भावनात्मक अभियान नहीं, बल्कि उपग्रह तकनीक से प्रमाणित एक वैज्ञानिक सफलता है। यह मॉडल अब देश-दुनिया में खनन प्रभावित अवनमित भू-भागों को पुनर्जीवित करने के लिए एक मानक के रूप में अपनाया जा सकता है।
भारतीय वन सेवा अधिकारी प्रदीप मिश्रा के अनुसार "शंकरगढ़ आज एक प्रेरणा स्वरूप है—प्रकृति को बचाने की, उसे संवारने की और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर भविष्य बनाने की। यह अध्ययन साबित करता है कि जब संकल्प, समुदाय और विज्ञान एक साथ मिलते हैं, तो बंजर ज़मीन पर भी जीवन लौट आता है।"

