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 आपरेशन सिन्दूर में सबसे उपयोगी साबित हुई जैमिंग प्रणाली 

 DRDO के पूर्व महानिदेशक डॉ.वी.के. सारस्वत ने कहा
 
 

उज्जैन,4 अप्रैल(इ खबर टुडे)। महाकाल द मास्‍टर ऑफ टाईम के 03 दिवसीय तारामंडल में आयोजित तीसरे सत्र को संबोधित करते हुए भारतीय वैज्ञानिक और DRDO के पूर्व महानिदेशक डॉ.वी.के. सारस्वत ने जैमिंग की दुनिया में भारत की क्षमता का जिक्र करते हुए बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के समय यह प्रणाली सबसे उपयोगी साबित हुई। अमेरिका, जर्मनी समेत कई विकसित देशों के स्पेस प्रोग्राम का उदाहरण लेते हुए आधुनिक समय की तकनीकों और चुनौतियों एवं आधुनिक हथियारों के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे कुल्हाड़ी से शुरू हुई रक्षा प्रणाली आज ड्रोन तक पहुंच चुकी है और आने वाले समय में एआई आधारित न्यूरोलॉजिकल हथियारों की तरफ आगे बढ़ रही है।

डॉ. सारस्‍वत ने पृथ्वी मिसाइल सिस्टम और बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम को विकसित करने में मुख्य भूमिका निभाई। वर्तमान में वे नीति आयोग के सदस्य के रूप में ऊर्जा और सुपरकंप्यूटिंग जैसे राष्ट्रीय मिशनों का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्‍होंने सत्र की शुरुआत अपने बचपन (12 साल की उम्र से जुड़ी हुई) एक कहानी से की। जब रूस की सेटेलाइट के सफल परीक्षण पर पिताजी ने उन्हें वह खबर दिखाई। इसी खबर से उन्हें अंतरिक्ष की दुनिया में आगे काम करने की प्रेरणा मिली। डॉ. सारस्‍वत ने कहा "जो पृथ्वी की कक्षा को नियंत्रित करता है, वह पृथ्वी के निकट के अंतरिक्ष को नियंत्रित करता है। जो पृथ्वी के निकट के अंतरिक्ष को नियंत्रित करता है, वह पृथ्वी को नियंत्रित करता है और जिसने पृथ्वी पर प्रभुत्व जमा लिया, वही मानवजाति का संरक्षक है।" रक्षा क्षेत्र में भारत की तैयारियों के बारे में निश्चिंत करते हुए उन्होंने अपना वक्‍तव्‍य समाप्त किया।डा.सारस्वत ने रक्षा क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर के बढ़ते निवेश के बारे में भी चर्चा की और सभी बढ़ते स्टार्टअप्स और उससे जुड़े युवा वैज्ञानिकों को शुभकामनाएं दी।

व्याख्यान सत्र में मुख्य वक्ता का परिचय करवाते हुए मैपकास्ट के निदेशक डॉ. अनिल कोठारी ने कहा कि‍ डॉ.वी.के. सारस्वत एक प्रतिष्ठित भारतीय वैज्ञानिक और DRDO के पूर्व महानिदेशक हैं। उन्होंने कहा कि‍ डॉ. सारस्वत ने भारत के पृथ्वी मिसाइल सिस्टम और बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम को विकसित करने में मुख्य भूमिका निभाई है और वर्तमान में वे नीति आयोग के सदस्य के रूप में ऊर्जा और सुपरकंप्यूटिंग जैसे राष्ट्रीय मिशनों का नेतृत्व कर रहे हैं। सत्र में आधार व्याख्यान देते हुए डॉ.वी.के. सारस्वत ने कहा कि‍ पूर्व निदेशक राजारमन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलॉजी डॉ. शंकर नाखे ने बताया कि उन्होंने डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी के तहत लगभग 35 वर्षों तक कार्य किया, जिसमें उनका प्रमुख योगदान लेजर तकनीक के विकास में रहा। उन्होंने कहा कि विज्ञान और अध्यात्म परस्पर जुड़े हुए हैं और इनका समन्वय मानव सभ्यता के लिए अत्यंत लाभकारी हो सकता है, जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने भी अपने विचारों में बताया है।

 

उज्जैन के महत्व पर उन्होंने बताया कि महाकालेश्वर मंदिर और कर्क रेखा पर स्थित होने के कारण यह शहर समय (काल) की अवधारणा से प्राचीनकाल से जुड़ा रहा है। रेडियोएक्टिव वेस्ट मैनेजमेंट को उन्होंने एक महत्वपूर्ण चुनौती बताते हुए कहा कि इसमें फ्यूल के पुनः उपयोग और सुरक्षित निपटान के लिए आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किया जाता है।

लेजर तकनीक के उपयोग पर उन्होंने बताया कि इसका प्रयोग चिकित्सा से लेकर उन्नत वैज्ञानिक परियोजनाओं तक हो रहा है, जैसे लेजर इंटरफ़ेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी(LiGo) , जहां अत्यंत सटीक लेजर इंटरफेरोमीटर का उपयोग गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाने में किया जाता है।

अंत में उन्होंने संदेश दिया कि विज्ञान और अध्यात्म को साथ लेकर चलने से एक संतुलित और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव है।