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 गिद्ध गणना में मंदसौर - नीमच जिले में ही 1520 मिले

 गांधीसागर अभ्यारण्य में उत्साहजनक वृद्घि, सुरक्षित ठिकाना बना
 
 

उज्जैन, 23 फरवरी (इ खबर टुडे / ब्रजेश परमार)। हाल ही में 20-22 फरवरी के दौरान तीन दिवसीय गिद्धों की गणना में उज्जैन संभाग के मंदसौर –नीमच जिलों से सुखद परिणाम सामने आए हैं। गांधीसागर अभ्यारण्य जहां चीतों का पूर्नआवास बनाया गया है वहां गिद्धों की उत्साहजनक वृद्धि दर्ज की गई है। दोनों ही जिलों की गणना में मंदसौर जिला के गांधीसागर में 1013 गिद्ध सामने आए हैं तो नीमच में 507 गिद्ध पाए गए हैं।

मंदसौर जिला में स्थित गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य एक बार फिर गिद्धों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। 'प्रदेशव्यापी गिद्ध गणना 2025-26' के तहत संपन्न हुई । गणना का निरीक्षण मुख्य वन संरक्षक (CCF) उज्जैन वृत्त, आलोक पाठक एवं वनमंडलाधिकारी (DFO) मंदसौर, संजय रायखेरे द्वारा किया गया। गणना के परिणामों में कुल 1013 गिद्ध पाए गए हैं।

विदेशी मेहमान गिद्धों का आगमन भी
गाँधीसागर अभयारण्य केवल स्थानीय गिद्धों का ही नहीं, बल्कि विदेशी प्रजातियों का भी पसंदीदा ठिकाना है। हिमालयन ग्रिफन, यूरेशियन ग्रिफन और सिनेरियस जैसे गिद्ध लंबी दूरी तय कर यहाँ पहुँचते हैं। ये मुख्य रूप से तिब्बत, मध्य एशिया, और हिमालय की ऊँचाइयों से शीतकाल के दौरान प्रवास करते हैं। ये प्रवासी गिद्ध आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर के महीने में गाँधीसागर पहुँचते हैं और गर्मी शुरू होने से पहले यानी मार्च-अप्रैल तक यहाँ रुकते हैं। स्थानीय निवासी चार प्रजातियों के गिद्ध वर्ष भर अभयारण्य में रहते हैं और यहीं प्रजनन करते हैं। इनमें भारतीय गिद्ध (Long-billed Vulture)-चंबल की ऊँची चट्टानों पर घोंसले बनाने वाली मुख्य प्रजाति। सफेद पीठ वाला गिद्ध (White-rumped Vulture): पेड़ों पर बसेरा करने वाले ये गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। राज गिद्ध (Red-headed Vulture): अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट लाल सिर वाली प्रजाति। मिस्त्र का गिद्ध (Egyptian Vulture): आकार में छोटे और सफेद रंग के स्थानीय गिद्ध।

विदेशी गिद्घों में ये प्रजातियां शामिल
विदेशी मेहमान/प्रवासी (3 प्रजातियाँ) शीतकाल (अक्टूबर-नवंबर से मार्च-अप्रैल) के दौरान तिब्बत, मध्य एशिया और हिमालय की ऊँचाइयों से प्रवास कर यहाँ पहुँचती हैं। हिमालयन ग्रिफन (Himalayan Griffon): हिमालय के ठंडे क्षेत्रों से आने वाले विशालकाय गिद्ध। यूरेशियन ग्रिफन (Eurasian Griffon): लंबी दूरी तय कर आने वाले अंतरराष्ट्रीय प्रवासी। सिनेरियस गिद्ध दुनिया के सबसे भारी और बड़े गिद्धों में शुमार। डीएफओ संजय रायखेरे ने बताया कि गांधीसागर अपनी अनुकुलता के लिए गिद्धों के स्वर्ग के रूप में देखा जाता है। इसके पीछे कारण चंबल नदी के किनारे स्थित ऊँची और दुर्गम चट्टानें गिद्धों को सुरक्षित घोंसले बनाने और प्रजनन के लिए आदर्श स्थान प्रदान करती हैं। अभयारण्य में वन्यजीवों की अच्छी संख्या और आस-पास के क्षेत्रों में पशुधन की उपलब्धता के कारण इन्हें पर्याप्त भोजन मिलता है। चंबल का पानी इनके लिए बारहमासी जल स्रोत है।अभयारण्य का शांत वातावरण और सुरक्षित कॉरिडोर इनके फलने-फूलने में मदद करता है। सीसीएफ आलोक पाठक ने बताया कि 'गाँधीसागर में 115 सक्रिय घोंसलों का मिलना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ का ईकोसिस्टम बेहद मजबूत है। हम इन 'प्रकृति के सफाईकर्मियों' के संरक्षण के लिए लगातार काम कर रहे हैं। इस गणना कार्य में अधीक्षक अमित राठौर सहित वन विभाग के अमले और पक्षी प्रेमियों का विशेष योगदान रहा।

नीमच में तीन प्रजातियों के 507 गिद्ध 
नीमच में पहली बार गणना ऐप के माध्यम से दर्ज की गई। उपवन मंडल अधिकारी दशरथ अखंड ने बताया, कि मृत पशुओं का मांस खाने वाले प्राकृतिक सफाईकर्मी गिद्धों की संख्या पशुपालकों द्वारा दर्द निवारक दवा डिक्लोफेनेक के उपयोग के कारण विलुप्ति की कगार पर आ गई थी। वन विभाग के लगातार संरक्षण प्रयासों से प्रति वर्ष इनकी संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। नीमच, मनासा, रामपुरा, जावद और रतनगढ़ वन रेंज तथा जिले की राजस्व भाग में की गई इस गणना में 507 गिद्ध पाए गए। इसमें मध्य प्रदेश में पाए जाने वाली कुल 7 प्रजातियों में से 3 प्रजाति सफेद इजिप्टियन गिद्ध, सफेद पीठ वाले व्हाइट रैम्पड वल्चर, और इंडियन लॉन्ग बिल्ड वल्चर प्रजातियों को जमीन व पेड़ पर या घोंसलों में बैठे वयस्क, अवयस्क गिद्धों की प्रजातिवार संख्या, उनके आवास, पेड़ो और विश्राम करते हुए, घोंसलों में शिशुओं के साथ, भोजन करते हुए, नदी नाले के पास पानी में देखे गए गिद्धों की गणना ऐप में दर्ज की गई। गणना के दौरान सख्ती से इस बात का पालन किया गया कि केवल पेड़ों/चट्टानों पर बैठे गिद्धों को गिना जाए। उड़ते हुए गिद्धों को गिनती में शामिल नहीं किया जाता। सूर्योदय से 9 बजे तक चले इस गणना कार्य में वन अमले के साथ नीमच के विशेषज्ञो ने सक्रिय सहभागिता की।