पत्रकारिता के नाम पर सफेदपोश डकैती!!
महेश झालानी
रतलाम,06अप्रैल (इ खबर टुडे)। यह पत्रकारिता के गिरते स्तर की कहानी नहीं, बल्कि उस चौथे स्तंभ के मलबे पर खड़े एक खौफनाक और संगठित अपराध के साम्राज्य का कच्चा चिट्ठा है। यह अब केवल इक्का-दुक्का घटनाओं का मामला नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा विषैला 'इकोसिस्टम' बन चुका है जिसने मोबाइल कैमरे, सस्ते चाइनीज माइक और चंद रुपयों में मिलने वाले आई-कार्ड को अवैध वसूली के सबसे मारक हथियारों में तब्दील कर दिया है। इन तीन औजारों ने मिलकर एक ऐसा समानांतर मीडिया बाजार खड़ा कर दिया है जहाँ खबरों का संकलन नहीं होता, बल्कि सौदों की नीलामी होती है । जहाँ सच को उजागर नहीं किया जाता, बल्कि सच की आड़ में दबाव का खेल खेला जाता है।
यह एक ऐसी डिजिटल डकैती है जिसने लोकतंत्र की शुचिता को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। आज देश के छोटे शहरों और कस्बों की तंग गलियों में ‘आई-कार्ड की दुकानें’ किसी भी आवश्यक वस्तु की दुकान से ज्यादा तेजी से फल-फूल रही हैं। ‘नेशनल प्रेस’, ‘ऑल इंडिया मीडिया’ या ‘भ्रष्टाचार विरोधी डिजिटल नेटवर्क’ जैसे भारी-भरकम और प्रभाव पैदा करने वाले नामों की आड़ में पत्रकारों की पैदावार तैयार की जा रही है।
असलियत यह है कि आप मात्र दो से दस हजार रुपये खर्च कीजिए और कुछ ही घंटों में बिना किसी शैक्षणिक योग्यता, बिना किसी चरित्र सत्यापन और बिना किसी जिम्मेदारी के खुद को ‘स्टेट हेड’ या ‘चीफ इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर’ घोषित करवा लीजिए। यह वह बिंदु है जहाँ पत्रकारिता का सम्मानजनक आवरण ओढ़कर ब्लैकमेलिंग का नंगा नाच शुरू होता है। किसी भी सरकारी दफ्तर में धड़धड़ाते हुए कैमरा लेकर घुस जाना, निर्माणाधीन दीवारों को हाथ से कुरेदकर भ्रष्टाचार का शोर मचाना, या अस्पतालों और स्कूलों में जबरन घुसकर ‘स्टिंग’ की धमकी देना, यह सब जनहित के लिए नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे होने वाली उस सौदेबाजी की भूमिका है जिसे लोग ‘सेवा-पानी’ का नाम देते हैं।
अफसर हों, ठेकेदार हों या बिल्डर, हर कोई इस डिजिटल आतंक के साये में जीता है कि कहीं एक एडिटेड वीडियो या झूठी खबर उनकी बरसों की प्रतिष्ठा को मिट्टी में न मिला दे। विद्रूपता की पराकाष्ठा तो देखिए कि अब यह गिरोह इतना बेखौफ हो चुका है कि कानून के रखवाले यानी पुलिसकर्मी भी इनके निशाने पर हैं। मजे की बात यह है कि कई लोग तो थानेदार तक को ब्लैकमेल करने से नहीं चूकते। जो कल तक पुलिस की फाइलों में ‘हिस्ट्रीशीटर’ थे और जिनके नाम के आगे संगीन जुर्म दर्ज थे, आज वे ही अपराधी अपने दागदार इतिहास को ‘प्रेस’ के चमकदार कार्ड के पीछे छिपाकर थाने की दहलीज पर धमक रहे हैं।
यह ‘हिस्ट्रीशीटर-टर्न-रिपोर्टर’ अब कलम नहीं चलाते, बल्कि थानेदार की जेब पर डाका डालने के लिए कैमरे को एक आधुनिक कट्टे की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह सीधे तौर पर राज्य की सत्ता और कानून के इकबाल को दी गई एक खुली चुनौती है, जहाँ अपराधी ही जज और पत्रकार बनकर व्यवस्था को मानसिक बंधक बना लेते हैं। इस अराजकता को भयावह बनाने में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने एक अनियंत्रित वैश्विक मंच प्रदान किया है, जहाँ बिना किसी लाइसेंस और बिना किसी एडिटोरियल गाइडलाइन के कोई भी रातों-रात अपना ‘न्यूज नेटवर्क’ खड़ा कर लेता है।
व्यूज की भूख और वायरलिटी की अंधी दौड़ ने सनसनीखेज झूठ और दबाव की इस दुकानदारी को चरम पर पहुँचा दिया है। अब यह फर्जी पहचान व्यवस्था के हर दरवाजे की मास्टर-की बनती जा रही है । कहीं इसी कार्ड के दम पर अपराधी गाड़ियों में प्रेस लिखवाकर शराब की तस्करी कर रहे हैं, तो कहीं यात्रियों की सुरक्षा को ताक पर रखकर अवैध कैब चलाई जा रही हैं। संवेदनशील सरकारी परिसरों और वीआईपी सुरक्षा घेरों में मीडिया बनकर घुसपैठ करना अब एक आसान रास्ता बन चुका है।
कानून की किताबें जालसाजी और
धोखाधड़ी की धाराओं से भरी पड़ी हैं। लेकिन धरातल पर वे बेअसर नजर आती हैं । क्योंकि डिजिटल मीडिया की अनियंत्रित वृद्धि पर नियंत्रण का कोई स्पष्ट ढांचा मौजूद नहीं है। इस अराजकता की सबसे भारी कीमत उन असली और ईमानदार पत्रकारों को चुकानी पड़ रही है जो अपनी जान जोखिम में डालकर सच लिख रहे हैं, क्योंकि आज हर माइक शक के घेरे में है और हर कैमरे पर सवालिया निशान है। ऐसा नहीं है कि हर यूट्यूबर फर्जी या ब्लैकमेलर हो । कुछ लोग बेहतर काम कर रहे है । लेकिन फर्जियों की भीड़ में गधे-घोड़े सब एक समान है।
अब वक्त आ गया है कि हम पहचान की इस मंडी पर ताला लगाएं। समाधान केवल सख्त कानून नहीं, बल्कि एक ऐसी जवाबदेह व्यवस्था है जहाँ हर मीडिया कार्ड का डिजिटल सत्यापन अनिवार्य हो और इसके दुरुपयोग को एक गैर-जमानती अपराध माना जाए। प्रशासन को भी इस डर से बाहर निकलना होगा कि हर कैमरा धमकी नहीं होता । जनता को भी यह समझना होगा कि विश्वसनीयता गले के कार्ड से नहीं बल्कि आचरण से पैदा होती है। अगर आज हमने इस संक्रमण को जड़ से नहीं मिटाया तो पत्रकारिता और ब्लैकमेलिंग के बीच की रेखा पूरी तरह मिट जाएगी और उस दिन सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ और सिर्फ ‘सच’ का होगा।
कैमरे तथा फर्जी आई कार्ड की आड में लूटपाट तथा ब्लैकमेलिंग करने वालों पर अब लगाम कसने का वक्त आ गया है । सरकार को चाहिए कि लोकतंत्र के जर्जरित इस खंभे को मुकम्मल रूप से बचाने का प्रयास करे अन्यथा किसी दिन इसका वजूद ही समाप्त हो जाएगा । आज पत्रकारिता का कारोबार "बाबाओं" से भी बड़ा बनता जा रहा है । सरकार के साथ साथ पत्रकार संगठनों को भी इस दिशा में पहल करते हुए स्वयं के लिए व्यवहारिक आचार संहिता बनानी होगी।

