अपीलीय न्यायालय ने दोषमुक्त किया चेक बाउंस केस के आरोपी को
रतलाम, 30 जून(इ खबर टुडे) । चेक बाउंस (धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम) के एक महत्वपूर्ण मामले में प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश संजीव कटारे की अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी उमेश पिता पारसमल कटारिया को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने विचारण न्यायालय द्वारा 24 जुलाई 2025 को पारित दोषसिद्धि एवं दण्डादेश को निरस्त करते हुए आरोपी की अपील स्वीकार कर ली।
संक्षेप में मामला इस प्रकार है कि परिवादी मनीषा पिता मांगीलाल गांधी निवासी हाटीराम दरवाजा रतलाम द्वारा एक परिवार पत्र अंतर्गत धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम के तहत आरोपी उमेश पिता पारसमल कटारिया निवासी रणजीत विलास पैलस रतलाम के विरुद्ध प्रस्तुत किया था कि आरोपी द्वारा अपनी व्यावसायिक आवश्यकता होना बताकर परिवादी से दिनांक 25-09-2013 को पचास हजार रुपए प्राप्त किए थे और उसकी अदायगी के लिए आरोपी ने उसकी खाता बैंक का एक चेक दिनांक 10-11-2017 का पचास हजार रुपए का अपने हस्ताक्षर कर के दिया था लेकिन जब उक्त चेक परिवादी मनीषा द्वारा बैंक में प्रस्तुत किया गया तब उक्त चेक आराेपी के बैंक खाते में 'अपर्याप्त निधि' के कारण बाउंस हो गया।
जिस पर परिवादी द्वारा न्यायालय में आरोपी के विरुद्ध परिवाद संस्थित किया गया था जहाँ ट्रायल न्यायालय द्वारा आरोपी के विरुद्ध दिनांक 24-07-2025 को निर्णय देते हुए 01 वर्ष के सश्रम कारावास और 85000/- रुपये प्रतिकर से तथा प्रतिकर अदायगी में व्यतिक्रम किये जाने पर पृथक से 03 माह सश्रम कारावास से दंडित किया गया था।
ट्रायल कोर्ट के उक्त निर्णय से व्यथित होकर आरोपी द्वारा अपील की गई थी जिसमें आरोपी के अभिभाषक हितेश दख द्वारा मुख्यतः यह आधार बताए गए थे कि परिवादी द्वारा जो राशि आरोपी को देना बताई हे, उक्त राशि दी जाना प्रमाणित ही नहीं हुई हे। तथा कोई वैध वसूली योग्य ऋण ही नहीं हे तो इसी स्थिति में आरोपी के विरुद्ध ट्रायल न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय भी स्थिर रखे जाने योग्य नहीं है। प्रकरण में उपलब्ध दस्तावेज तथा परिवादी की साक्ष्य से भी परिवादी अपना प्रकरण प्रमाणित नहीं कर सकी हे, तथा जो साक्ष्य हुई हे वह किसी भी प्रकार से विश्वसनीय नहीं है। सम्पूर्ण लेनदेन भी संदेहास्पद होकर परिवादिया के कथनों में अत्यधिक विरोधाभास हे ।ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट के निर्णय को निरस्त करते हुए आरोपी को दोषमुक्त किया जाना आवश्यक है ।
आरोपी की ओर से उसके अभिभाषक द्वारा दिये गए तर्कों, एवं बताए गए आधारों से सहमत होकर तथा अभिलेख पर उपलब्ध संपूर्ण मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के गंभीरतापूर्वक ओर समग्र मूल्यांकन से अपील न्यायालय द्वारा यह माना कि विधि अनुसार परिवादी प्रकरण में उसके प्रारंभिक दायित्व को सिद्ध नहीं कर सकी हे, तथा परिवादिया के कथनों में गंभीर विरोधाभास परिलक्षित होते है। जिससे कथित ऋण की वास्तविकता संदेहास्पद हो जाती है।
परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 118 (क) एवं 139 के अधीन उपलब्ध विधिक अवधारणाओं का आरोपी द्वारा संभावना के प्राबल्य के आधार पर सफलतापूर्वक खंडन किया जाना प्रतीत होता है। न्यायालय ने यह माना कि परिवादी संदेह से परे अपना प्रकरण सिद्ध करने में असफल रही है।
ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट द्वारा अपीलार्थी/आरोपी को दण्डित करने में त्रुटि की है । अतः आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल न्यायालय द्वारा घोषित निर्णय ओर दण्डाग्या अपास्त कर अपीलार्थी/ आरोपी को दोषमुक्त किया जाता है। आरोपी की ओर से सफलतापूर्वक पैरवी एडवोकेट हितेष कुमार दख द्वारा की गई।

