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 Raag Ratlami Valentaine : "जेन जी" पर छाई भोले की भक्ति,वेलेन्टाइन को भूले युवा / क्रिकेट टूर्नामेन्ट है या सटोरियो का खेल ?

 
 

-तुषार कोठारी

रतलाम। कुछ सालों पहले तक चैदह फरवरी का दिन आने से काफी पहले से वैलेन्टाइन का हल्ला शुरु हो जाता था। अखबारों में लेख छपने लगते थे। वेलेन्टाइन के तीन चार दिन पहले से हग डे,रोज डे और ना जाने क्या क्या मनाने की सलाहें दी जाती थी। फ्रेन्डशिप बेन्ड और तरह तरह के गिफ्ट आइटमों से दुकानें सज जाती थी। फिर जब वेलेन्टाइन डे आता था,तो बाग बगीचों और रेस्टोरेन्ट्स में वेलेन्टाइन डे मनाने गए युवक युवतियों को घेरने वालों के हंगामे हुआ करते थे। लेकिन ये सब अब बीती बातें हो गई है।

अब लगता है कि वेलेन्टाइन डे पुराने जमाने की बात हो गया है। इस बार तो वेलेन्टाइन डे महा शिवरात्रि से ठीक एक दिन पहले आया। वेलेन्टाइन डे यानी चौदह फरवरी का पूरा दिन महाशिवरात्रि की तैयारियों में गुजर गया। ना तो अखबारों में वेलेन्टाइन की खबरें देखने को मिली और ना ही दुकानों पर फ्रैन्डशिप बेन्ड या वेलेन्टाइन कार्ड बिकते हुए दिखाई दिए। इतना ही नहीं कहीं से भी ऐसी कोई खबर नहीं आई कि वेलेन्टाइन डे के गिफ्ट आइटम बेचने वालों के यहां कोई हंगामा हुआ हो। ना ही कहीं प्रेमी जोडों की पकड धकड की गई।

इसके ठीक उलट चौदह फरवरी का पूरा दिन महाशिवरात्रि की तैयारियों में गुजर गया। महाशिवरात्रि से ठीक पहले दोबत्ती चौराहे पर शिव आरती का भव्य आयोजन किया गया। इस धार्मिक आयोजन में जेन जी युवाओं की जबर्दस्त भीड उमडी और जेन जी वाले युवा शिव आराधना के भजनों पर थिरकते नजर आए। ऐसा लग रहा था जैसे जेन जी युवाओं पर अब भोले की भक्ति छाई हुई है। 

महाशिवरात्रि के दिन भी सडक़ों पर जितने युवक युवतियां नजर आ रहे थे उनमें से अधिकांश के ललाट पर ओम नम. शिवाय या ओम के तिलक लगे हुए दिखाई दे रहे थे। शहर के शिवालयों पर भारी भीड नजर आ रही थी और इस भीड में सर्वाधिक संख्या जेन जी वाले युवाओं की नजर आ रही थी। भोले की भक्ति का उल्लास हर तरफ छाया हुआ था। 

इस घटनाक्रम से यह साबित हो गया कि  बीतें कुछ सालों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की आक्रामक मार्केटिंग स्ट्रेटेजी के कारण वेलेन्टाइन जैसा गुमनाम डे न सिर्फ चर्चाओं में आया था बल्कि देश के अनेक युवा इसे बेहद महत्वपूर्ण दिन मानकर हफ्तों पहले से इसकी तैयारियों में जुट जाया करते थे। लेकिन जैसे ही माहौल बदला और देश में हिन्दुत्व का जागरण होने लगा। विज्ञापनों और मार्केटिंग कम्पनियों द्वारा बनाए गए वेलेन्टाइन डे जैसे फर्जी त्यौहार की वास्तविकता युवाओं की समझ में आ गई। भारत के जेन जी युवा अपनी वास्तविकता से जुडने लगे और अब भोले की भक्ति में ही उन्हे आनन्द भी आने लगा है। रतलाम में दिखाई दिया यह माहौल सिर्फ रतलाम की वास्तविकता नहीं है,बल्कि देश के अधिकांश स्थानों पर अब यही दृश्य दिखाई देते है और ये दृश्य सचमुच प्रसन्नता देने वाले है।

क्रिकेट टूर्नामेन्ट या सटोरियो का खेल ?

वैसे तो रतलाम सेव,सोना और साडी के लिए प्रसिद्ध है लेकिन इसके साथ ही पूरे देश में रतलाम का नाम सïट्टे के लिए भी प्रसिद्ध है। रतलाम के सटोरियों ने पूरे देश में अपना नाम रोशन किया है। पहले किसी जमाने में पानी पतरे का सïट्टा होता था,लेकिन सटोरियों ने वक्त के साथ खुद को बदलना जारी रखा और क्रिकेट का सïट्टा भी शुरु कर दिया। क्रिकेट के सïट्टे में भी रतलामियों ने देश भर में नाम कमाया। 

दुनिया में जहां कहीं इन्टरनेशनल क्रिकेट टूर्नामेन्ट होते है,रतलामी सटोरिये सक्रिय हो जाते है। रन डिफरेन्स से लगाकर हार जीत तक पर जमकर खाईवाली की जाती है। इन्टरनेशनल क्रिकेट को लेकर होने वाले सïट्टे पर वर्दी वाले भी नजरें लगाकर बैठे होते है,इसलिए इस दौरान कई केस भी बनाए जाते है और कम्प्यूटर,टीवी स्क्रीन और नगद रुपए आदि जब्त होते रहते है। 

क्रिकेट सïट्टे की जानकारी रखने वालों का कहना है कि इन्टरनेशनल क्रिकेट के दौरान वर्दी वालों की सक्रियता को देखते हुए अब सटोरियों ने नया दांव आजमाया है। पिछले कुछ दिनों में शहर में लोकल क्रिकेट टूर्नामेन्ट्स की तादाद में एकाएक इजाफा हो गया है। स्टेडियम में कई सारे क्रिकेट टूर्नामेन्ट होने लगे है। एक क्रिकेट टूर्नामेन्ट तो इसी हफ्ते खत्म हुआ है। इस टूर्नामेन्ट में भी कई सारी लोकल टीमें शामिल हुई थी और हजारों रुपए के इनाम भी बांटे गए थे। 

क्रिकेट सïट्टे के जानकारों का कहना है कि शहर में क्रिकेट टूर्नामेन्ट्स की संख्या में जो वृद्धि हुई है,वह ऐसे ही नहीं हो गई। असल में ये सारे टूर्नामेन्ट्स क्रिकेट सटोरियों के काम के है,इसलिए इन आयोजनों में सटोरिये जमकर फन्डिंग करते है ताकि इन टूर्नामेन्ट्स की आड में उनका सïट्टे का धन्धा फले फूले। वर्दी वाले भी इस दौरान ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाते। तो कुल मिलाकर रतलाम के क्रिकेट टूर्नामेन्ट्स अब इन्टरनेशनल टूर्नामेन्ट्स से बराबरी कर रहे है और सटोरिये इसकी आड में जमकर चांदी काट रहे है। 

सरकार बनाने के सपने

रतलाम से निकल कर पंजा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हुई पंजा पार्टी की युवा नेत्री बीते दिनों रतलाम आई। रतलाम वाली ये दीदी एकबार पडोस के संसदीय क्षेत्र का चुनाव भी जीत चुकी है। लेकिन एक बार जीतने के बाद,दूसरी बार वोटरों ने उन्हे नकार दिया था और तभी से वे दिल्ली के वरिष्ठ नेताओं में शुमार की जाती है। आजकल तो वे पंजा पार्टी के युवराज की सलाहकार टीम की भी सदस्य है। पंजा पार्टी ने उन्हे तेलंगाना का प्रभारी भी बनाया हुआ है।

पंजा पार्टी के युवराज के सलाहकारों में शामिल दीदी जब सैलाना पंहुची तो खबरचियों ने उनसे पंजा पार्टी को लेकर कई सवाल पूछे। दीदी का कहना था कि अगले चुनाव में पंजा पार्टी बडे जोर शोर से सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है। जब उनसे पूछा गया कि सत्ता में वापसी करने का आधार क्या है,तो उनका जवाब था कि पंजा पार्टी ने देश भर के 550 जिलों में सैलाना के गुड्डू भैया जैसे उर्जावान नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी है और पंजा पार्टी का संगठन बहुत मजबूत हो गया है। अब उन्हे कौन बताए कि जिस गुड्डू भैया का उदाहरण वे दे रही थी,वही गुड्ड्ू भैया पंजा पार्टी के संगठन से बेहद नाराज चल रहे है। 

पंजा पार्टी में योग्य नेताओं की जमकर उपेक्षा की जाती है और पंजा पार्टी के युवराज की नासमझी के चलते पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है। लेकिन दीदी को पूरी उम्मीद है कि पंजा पार्टी सत्ता में वापसी करेगी। सही भी है। क्योंकि अगर वापसी की उम्मीद ही ना हो तो कोई भी नेता राजनीति में ही क्यो रहेगा? ये अलग बात है कि पंजा पार्टी के ज्यादातर नेता वापसी की उम्मीद पूरी तरह खो चुके है और उनमें युवराज भी शामिल है। बहरहाल अगर रतलाम वाली दीदी को वापसी की उम्मीद है,तो उन्हे अपनी उम्मीद कायम रखनी चाहिए। इस तरह के सपने देखने में कोई बुराई नहीं है। भले ही वास्तविकता इससे कोसों दूर हो।