Raag Ratlami Revenue : रेवेन्यू के कारिन्दे रंगे हाथों धराए,फिर भी नहीं घबराए,बडे अफसर रहे मुंह छुपाए / गैस की कमी नहीं फिर भी कालाबाजारी चालू
-तुषार कोठारी
रतलाम। रेवेन्यू महकमे में सबसे निचली पायदान पर रहने वाले और जमीनों की नप्ती से नक्शों तक में अपनी कलम से हेर फेर करने में माहिर कारिन्दे रिश्वत लेते रंगे हाथों धराते रहते है। अभी हाल ही में लोकायुक्त वालों ने फिर से एक कारिन्दे को रंगे हाथों पकडा। मामला अडवानिया गांव में एक खेत के सीमांकन का था। रेवेन्यू महकमे के इस कारिन्दे ने सीमांकन जैसे मामूली काम के लिए छोटी मोटी नहीं तीस हजार रु. की मांग की थी। इतनी भारी भरकम मांग पूरी करने की बजाय फरियादी ने सीधे लोकायुक्त को शिकायत कर डाली और आखिरकार उस रिश्वतखोर कारिन्दे को रिश्वत लेते रंगे हाथों धर लिया गया।
जिले में इस तरह की खबरें अब आम हो गई है। ऐसे लोगों की तादाद काफी बढ चुकी है,जिन्हे रंगे हाथों धरा गया है। इसके बावजूद इस महकमे के कारिन्दों की हिम्मत है कि टूटने का नाम नहीं लेती। लोग रंगे हाथों धराते जा रहे है,लेकिन पीछे वालों में किसी तरह की कोई घबराहट नहीं है। रेवेन्यू वालो के पुराने तौर तरीके बदस्तूर कायम है। महकमे के बडे अफसर भी जानबूझकर मुंह छुपाए रहते है ताकि पुराने तौर तरीके कायम रह सके।
कुछ सालों पहले तो जिला इंतजामिया के दफ्तर के भीतर ही एक कारिन्दे को रंगे हाथों पकडा गया था। इस कारिन्दे ने जमीन के बंटवारे के बाद महज पावती बनाने के लिए 25 हजार की मांग की थी। यानी रेकार्ड पर तो बंटवारा हो चुका था,लेकिन सिर्फ पावती बनना बाकी थी। कारिन्दे के रंगे हाथों पकडे जाने के बावजूद महकमे के अफसरों ने फरियादी की पावती बनवाने में कोई मदद नहीं की।
कुल मिलाकर रंगे हाथों धरे जाने के वाकये आजकल लगातार हो रहे है। रंगे हाथों पकडे गए लोगों में से ज्यादातर अदालत में सजा भी पाते है और सजा मिलने के बाद नौकरी से भी हाथ धोना पडता है। लेकिन इसके बावजूद रेवेन्यू वाला महकमा जस का तस है। इसमें कोई बदलाव नजर नहीं आता। तहसील के दफ्तरों में काबिज अफसर और उनके मातहत बरसों पुराने तौर तरीको से ही काम करते नजर आते है।
सरकार ने रेवेन्यू के महकमे को बदलने के लिए कई सारी कोशिशें की है। ज्यादातर रेकार्ड आनलाइन कर दिए गए है,लेकिन इस महकमे के कारिन्दे इतने कलाकार है कि कम्प्यूटर के रेकार्ड में भी गडबडियां कर देते है,ताकि इन गडबडियों को सुधारने के एवज में उनकी कमाई हो सके। नक्शे और खसरे आनलाइन तो हो ही गए है,इनकी नकलों के लिए अब लोक सेवा केन्द्र की व्यवस्था भी की जा चुकी है। लेकिन लोगों को राहत मिलने की बजाय खर्चा बढ गया है। पहले तो केवल महकमे के लोगों को ही फीस चुकानी पडती थी,लेकिन अब लोक सेवा केन्द्र की फीस भी इसमें जुड गई है।
यानी रेवेन्यू का महकमा बदलते को तैयार नहीं है। इसका एक बडा कारण उपर बैठे अफसर है। जिस किसी काम के लिए किसी कारिन्दे को रंगे हाथों पकडा जाता है,फिर पूरा महकमा उस काम को अटकाने में जुट जाता है। जबकि किसी भ्रष्ट कारिन्दे को पकडवाने वाले फरियादी को संरक्षण मिलना चाहिए,लेकिन होता इसका उलटा है।
सीमांकन के लिए तीस हजार मांगने वाले कारिन्दे को जब रंगे हाथों पकड लिया गया है,तो फरियादी के खेत का सीमांकन प्राथमिकता के आधार पर करवाया जाना चाहिए। लेकिन खबर ये है कि अब तक अडवानिया के उस खेत का सीमांकन नहीं हो पाया है।
जिला इंतजामिया की मुखिया मैडम जी को इसमें खुद ध्यान देना चाहिए। उनके पहले के अफसरों ने तो इस तरह की कोई पहल नहीं की,लेकिन नई मैडम जी अगर इस तरह की पहल करती है तो उनका ये कदम बडा परिवर्तन लाने वाला साबित हो सकता है। जिस तहसील में रेवेन्यू के किसी कारिन्दे को किसी काम के लिए रंगे हाथों पकडा जाए,उस तहसील के मुखिया की ये जवाबदारी होना चाहिए कि वह उस काम को त्वरित रुप से पूरा करवाए। अगर नई मैडम जी ऐसा परिवर्तन करवा देती है,तो यह निश्चित ही पूरे प्रदेश के रेवेन्यू महकमे के लिए एक नजीर साबित होगी।
एलपीजी की कमी नहीं,फिर भी ब्लैक में एलपीजी
इरान पर इज्राइल और अमरिका के हमले के बाद पंजा पार्टी को बडी उम्मीदें थी कि वतन में पैट्रोल और एलपीजी का संकट गहरा जाएगा और इसका सीधा फायदा पंजा पार्टी उठा लेगी। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। फिर पंजा पार्टी ने अफवाहों के जरिये एक दिन गैस एजेंसियों पर लाइनें लगवा दी और कुछ दिन बाज पैट्रोल पंपो पर लाइन लगवाई। पंजा पार्टी के एक पुराने नेता पैट्रोल पंप पर खडे होकर फेसबुक लाइव करने लगे कि देशभर में हाहाकार मचा है। लेकिन एक ही दिन में इसकी भी पोल खुल गई।
अब सबकुछ सामान्य है। लेकिन सरकार ने कमर्शियल गैस पर जरुर रोक लगा रखी है। कमर्शियल टंकियों पर लगाई गई रोक ने एजेंसी वालों के मजे कर दिए है। लोगों को पता नहीं था कि इरान और अमेरिका के बीच में युद्ध होने वाला है,इसलिए उन्होने अपने बेटे बेटियों की शादियां तय कर दी थी। रिसेप्शन के कार्ड भी बांट दिए थे। अब पता चला कि कमर्शियल गैस पर राशनिंग हो रही है। भारत का मध्यमवर्गीय व्यक्ति अपने बेटे बेटी के विवाह में मेहमानों को बुलाता है,तो उसकी इज्जत दांव पर लगी होती है। निमंत्रण दे दिया है तो मेहमान भूखे नहीं जाएंगे। चाहे जिस भाव पर गैस मिले लेना पडेगी। बस गैस एजेंसी वालों को यहीं मौका मिल गया। एजेंसी वाले धढल्ले से ढाई हजार की टंकी साढे चार हजार में बेच रहे हैं। अपने बेटे बेटियों का विवाह समारोह करवाने वाले माता पिता दुगुने भाव में टंकिया खरीद रहे हैैं।
जिम्मेदारी जिला इंतजामिया की है। जिला इंतजामिया की मुखिया मैडम जी आम लोगों की तकलीफें दूर करने के लिए खुद को सदैव सक्रिय दिखाती है। दिल्ली से लगाकर भोपाल तक सारे बडे अफसर गैस की कालाबाजारी को रोकने के निर्देश दे रहे है। इसके बावजूद अगर कालाबाजारी हो रही है तो ये सीधे सीधे जिला इंतजामिया की नाकामी है। जरुरत इस बात की है कि इंतजामिया हरएक गैस एजेंसी का स्टाक चैक करें और उस पर निगरानी रखे। जिनको सबसे ज्यादा जरुरत है उन्हे सरकारी रेट पर गैस मिले। काला बाजारी ना हो। ये पूरी जिम्मेदारी जिला इंतजामिया की है। लोगों को मैडम जी से उम्मीद है कि वे इस ओर ध्यान देंगी और गैस की कालाबाजारी पर अंकुश लगाएंगी।

