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 Raag Ratlami Patwari Agitation: सरकार,अफसर,पटवारी और स्वामित्व का संकट,खान पान वालों की लापरवाही से गई बच्चे की जान

 

 

-तुषार कोठारी

रतलाम। कहने को तो पटवारी रेवेन्यू महकमे की सबसे निचली पायदान का कर्मचारी है,लेकिन रेवेन्यू का पूरा महकमा पटवारी के ही कन्धों पर टिका हुआ है। पटवारी चाहे सबसे निचली पायदान पर हो,लेकिन उसकी कलम से ज्यादा ताकतवर कलम और किसी की नहीं होती। देश की सबसे बडी अदालत भी पटवारी की कलम से लिखे को काट नहीं पाती। तमाम सरकारी काम पटवारी के ही भरोसे से सरकते है। लेकिन बीते कुछ दिनों से अफसर पटवारियों को निपटाने में लगे हैैं और पटवारी भडके हुए है। स्वामित्व का संकट कुछ इस तरह मण्डरा रहा है कि तमाम सरकारी काम अटकने लगे है। अब सरकार पटवारियों के सामने झुकने की बात तो कह रही है,लेकिन अभी भी सबकुछ साफ नहीं हुआ है। 

सारी खींचतान स्वामित्व के चक्कर में शुरु हुई। सरकार ने अपना चेहरा चमकाने के लिए गांव में रहने वाले तमाम लोगों को उनके घरों की रजिस्ट्री करवा कर देने की घोषणा कर डाली और इसके लिए पटवारियों को जिम्मेदारी दे दी गई। जब पटवारियों को पता चला कि रजिस्ट्री के दस्तावेज में उनका दर्जा निष्पादक का रखा गया है,तो पटवारियों का माथा ठनका। उन्हे समझ में आ गया कि अगर वे निष्पादक बनेंगे तो इन सम्पत्तियों को लेकर होने वाले किसी भी अदालती विवाद में उन्ही को घसीटा जाएगा। बस पटवारी अड गए।

पटवारी अडे,तो अफसरों को भी गुस्सा आ गया। पटवारियों को ना सिर्फ थोक में नोटिस जारी होने लगे बल्कि कई सारों को तो नौकरी से ही बर्खास्त कर दिया गया। रतलाम में ही साठ से ज्यादा पटवारियों को नोटिस दिए जा चुके है। पांच पटवारी नौकरी से निकाले जा चुके है। अब मामला बुरी तरह उलझ चुका है। पटवारी सारे काम काज बन्द करके बैठे है। रेवेन्यू महकमे के तमाम काम अटक गए है। सरकार,अफसर और पटवारियों के इस झगडे में मरण उन बेचारे गांव वालों का हो रहा है,जिनके रेवेन्यू महकमे वाले काम अटके हुए है। किसी को नप्ती करवानी है,तो किसी को बंटवारा करवाना है। जब पटवारी काम नहीं कर रहे तो इस तरह का कोई काम नहीं हो सकता। अफसर को तो सिर्फ दस्तखत करना होते है,काम तो सारे पटवारी के ही जिम्मे होते है।

कुल मिलाकर सरकार और पटवारी अब आमने सामने है। सरकार थोडी नरम तो पडी है,लेकिन पटवारी अभी अडे हुए है। उनका कहना है कि जब तक बर्खास्त किए गए पटवारियों की बर्खास्तगी को बर्खास्त नहीं किया जाएगा,वे काम पर नहीं लौटेंगे। स्वामित्व की रजिस्ट्री का मामला तो अभी उलझा ही हुआ है। उसका क्या होगा? कोई नहीं जानता।

पटवारियों का कहना है कि जब ग्र्रामीण घरों के खाते खसरे और नक्शे तैयार होकर आनलाइन हो चुके है,तो अलग से रजिस्ट्री की जरुरत क्या है? सरकार गांव में हुए घरों की रजिस्ट्री तो करवा रही है,लेकिन दस्तावेज खाली प्लाट का बनाया जा रहा है। ये सरासर धोखाधडी है,जिसकी वजह से जेल जाने तक की नौबत आ सकती है। लेकिन फिर भी सरकार खुद ऐसी धोखाधडी करवा रही है। पटवारी इस धोखाधडी में क्यो शामिल होने लगे? बहरहाल स्वामित्व का ये संकट कब तक चलेगा और कैसे सुलझेगा? इन सवालों के जवाब अभी किसी के पास नहीं है।

खाद्य विभाग की लापरवाही ने ले ली बच्चे की जान

लोगों को मिलावटी और नुकसानदायक खाद्य पदार्थों के खतरे से बचाने के लिए सरकार ने बाकायदा एक महकमा बना कर इसमें इंस्पेक्टर तैनात कर रखे है। इन इंस्पेक्टरों की जिम्मेदारी है कि वे लगातार मिलावटी खाद्य पदार्थों की जांच करते रहे और मिलावटखोरों को सजा दिलवाए। लेकिन खाने पीने के सामानों की जांच करने वाले ये इंस्पेक्टर,जांच करने के अलावा सबकुछ करते है। इसका नतीजा आम लोगों को कई बार अपनी जान देकर भुगतना पडता है।

जावरा में एक मिठाई की दुकान पर मावे की मिठाई महज दो सौ रुपए किलो के भाव में बेची जा रही थी। मिठाई के भाव सुनकर हर कोई समझ सकता है कि जिसे मावा बताया जा रहा है,वह शुद्ध तो हो ही नहीं सकता। शुद्ध मावा इतना सस्ता हो ही नहीं सकता। इसी नकली मावे की मिठाई ने बीते दिनों एक नन्हे बच्चे की जान ले ली। नकली मावे की ये मिठाई एक मजदूर ने खरीदी और अपने बच्चों को भी यही मिठाई खिलाई। नकली मावे ने कुछ ही देर में असर दिखाना शुरु कर दिया। जिस जिस ने मिठाई खाई थी,सबकी हालत खराब हो गई। इन सबको अस्पताल ले जाया गया। लेकिन ढाई साल के एक बच्चे की बचाया नहीं जा सका।

जिन्हे मिलावट की रोकथाम करना चाहिए थी,उस महकमे के जिम्मेदारों ने बच्चे की मौत के बाद मिठाई की दुकान से सैम्पल लेने की रस्म अदायगी पूरी कर ली। दुकान अब भी चल रही है। महकमे के इंस्पेक्टरों को बच्चे की मौत से कोई फर्क पडता नजर नहीं आता। इतना जरुर है कि इस तरह की घटना हो जाने से इंस्पेक्टरों के रेट जरुर बढ जाएंगे।

जंगल के जानवर घरों में और जंगल महकमे वाले गायब

जिले के जंगलों की देखभाल करने के लिए बडा सारा अमला मौजूद है,लेकिन अफसरों की नाकाबिली और नालायकी के चलते सारा अमला बेकार साबित होने लगा है। महकमे की बडी साहिबा को लोगों से मिलना जुलना ही पसन्द नहीं है। जंगलों के आसपास रहने वालो की कई तरह की समस्याएं होती है,लेकिन बडी साहिबा इन्हे कभी सुनने को राजी नहीं होती।

जिले के जंगलों में आजकल बडी तादाद में हिंसक वन्य प्राणी रहने लगे हैैं। नदियों में मगरमच्छ  मौजूद है,तो जंगलों में तेंदुएं बडी तादाद में नजर आने लगे है। अभी कुछ ही दिनों पहले बाजना के कुंदनपुरा गांव के एक घर में मगरमच्छ घुस गया। घर में सौ रही महिला ने अपने बच्चे के साथ खिडकी से बाहर कूदकर जान बचाई। गांव के तमाम लोग इकट्ठे हो गए। गांव के लोगों ने मिलकर मगरमच्छ को पकडा। जंगल महकमे के लोगों को सूचना दी गई कि गांव में मगरमच्छ घुस आया है। लेकिन कमाल देखिए दो दिन तक जंगल वाले मौके पर नहीं पंहुचे। जब बडी साहिबा ही नाकाबिल हो तो नीचे वालों को लापरवाही का कोई डर नहीं होता। इधर शिवगढ के नजदीक भाई बहन के मगरे पर कुछ ही दिनों पहले तेंदूआ भी देखा गया था। अब तेंदुए की मौजूदगी शहरों के पास तक हो गई है। लेकिन जंगल महकमे वालों के तौर तरीके पुराने ढर्रे पर ही चल रहे है। जंगल महकमे के अफसरों को लोग शिकायतें करते है,लेकिन अफसर इन पर कान नहीं देते। बडी साहिबा से लेकर नीचे के स्टाफ तक हर कोई जंगलों की आड में होने वाली कमाई की चिन्ता में लगा रहता है।