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 Raag Ratlami Panchayat : जंगल महकमा और बडी पंचायत वाली मैडमों से परेशान है दफ्तर और बाहर के लोग / 40 लाख की लूट में छुपे हैैं कई सवाल

 

 

-तुषार कोठारी

रतलाम। इन दिनों हमारा जिला पूरी तरह से पिंक जिला बना हुआ है। जिले के ज्यादातर सरकारी महकमों का जिम्मा इन दिनों मैडमों के पास है। जिला इंतजामिया हो,या अदलिया,या फिर स्वास्थ्य महकमा। हर कहीं मैडमें ही साहब है। इन मैडमों में से कुछ तो शानदार काम करके नजीरें पेश कर रही हैैं,तो कुछ की कारस्तानियां उनके दफ्तर और बाहर वालों को हैरान परेशान कर रही है। जिले की बडी पंचायत और जंगल महकमा,ये दोनो महकमे भी मैडमों के जिम्मे है और यहां लोग खासे परेशान है।

जिले के देहाती इलाकों में सरकारी इमारतें बनाने और सरकारी मन्दिरों की मरम्मत जैसे काम करने वाले ठेकेदार बीते कुछ महीनों से खासे परेशान है। उनकी परेशानी की वजह और कोई नहीं बल्कि जिले की बडी पंचायत की सबसे बडी वाली मैडम जी है। मैडम जी बडे बाबूओं में शामिल है और शायद पहली बार जिले की पंचायत का कामकाज सम्हाल रही है।

मैडम जी को लगता है कि उनके अलावा बाकी सारे लोग चोर है,जो सरकारी रकम की चोरी करने में लगे हुए है। शायद इसी वजह से जो ठेकेदार अपने काम पूरे कर चुके है उन्हे भी उनकी रकम नहीं मिल पा रही है। बडी मैडम जी के पास जब भी फाइल जाती है,वे बिना दस्तखत के फाइल को लौटा देती है। अपनी गांठ का पैसा लगा कर सरकारी काम पूरा करने वाले ठेकेदार हैरान है कि उनका भुगतान नहीं हो रहा है। 

जिस महकमे का काम पूरा हुआ है,उस महकमे के अफसर जब फाइल लेकर बडी मैडम के पास जाते है,तो मैडम जी उन्हे भी ऐसे देखती हैै,जैसे वे भी चोरों में शामिल हो। तमाम महकमों के अफसरों की यही दिक्कत है। इनमें भी जो महकमे सीधे निर्माण के कामों से जुडे है,उन्हे सबसे ज्यादा दिक्कत है।

जिन ठेकेदारों के भुगतान अटके हुए है,उन्हे लगता है कि ये समस्या कमिशन नहीं दे पाने की वजह से खडी हो रही है। लेकिन दिक्कत ये है कि वे ये नहीं समझ पा रहे कि कमिशन का भुगतान किसको,कैसे और कितना किया जाए। कुछ तो बेचारे पांच पांच महीनों से अपनी रकम मिलने का इंतजार कर रहे है।

मैडम जी के दफ्तर के कारिन्दे भी मैडम जी से कम परेशान नहीं है। कुछ कारिन्दों को तो मैडम जी ने बिना कोई वजह बताए सारे कामों से फ्री कर दिया है। इन कारिन्दों को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर दिक्कत क्या हुई है? वे इस बात से परेशान है कि उन्हे रोजाना टाइम पर दफ्तर में आना है,हाजरी लगानी है और बिना कुछ किए धरे सारे दिन हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहना है।

तरह तरह की परेशानियों से जूझ रहे ये तमाम लोग ये सोच सोच कर हैरान है कि जब भी कभी ये मैडम जी किसी जिले की पूरी कमान सम्हालेंगी,तब उस जिले का क्या हाल होगा?

जंगल महकमा भी परेशान मैडम जी से

जिले का जंगल महकमा भी इन दिनों मैडम जी के हवाले है। मैडम जी भी जंगल महकमे की डायरेक्ट वाली अफसर है। जिले में इन दिनों कई इलाकों में जंगल बनाने के लिए पौधे लगाए जा रहे है। सरकार ने इन पौधों की सुरक्षा के लिए श्रमिकों की तैनाती की है ताकि मेहनत से लगाए गए पौधे,मवेशियों का शिकार ना बन जाए। चूंकि सरकार ने पौधों की सुरक्षा के लिए श्रमिकों की तैनाती की है,इसलिए उन्हे उनका मेहनताना देने की भी व्यवस्था सरकार ने ही की है। जिले में सैकडों सुरक्षा श्रमिक तैनात है। लेकिन इन बेचारों की समस्या यह है कि मैडम जी इनका मेहनताना देने को राजी नहीं है। कई महीनों से ये तमाम श्रमिक बिना मेहनताने के सुरक्षा में लगे हुए है।

इन श्रमिकों से काम करवाने वाले जंगल महकमे के कारिन्दे भी परेशान है। मजदूर अपना मेहनताना इन्ही कर्मचारियों से मांगते है,जो इनसे काम करवाते है। लेकिन ये इतना भी नहीं बता पाते कि इन मजदूरों का मेहनताना इन्हे कब तक मिल पाएगा। मैडम जी से कौन पूछे कि उन्होने मजदूरों के मेहनताने को क्यो रोक कर रखा है?

वैसे जंगल महकमे की मैडम जी के दूसरे कारनामें भी कम नहीं है। कहने को तो सारे सरकारी अफसर जनता की सेवा के लिए होते है,लेकिन ये मैडम जी है कि जनता से बात करने में इन्हे अपनी हेठी महसूस होती है। सरकारी मोबाइल पर चाहे जितने फोन लगाए जाए,मैडम कभी भी फोन उठाने को राजी नहीं होती।

कुछ दिनों से शहर के  स्टेशन रोड इलाके में एक बन्दर ने कई आने जाने वालों को घायल कर दिया। यह बन्दर बीते कई दिनों से उत्पात मचा रहा है और इलाके में आतंक फैला रहा है। लेकिन जब इस मामले में जंगल महकमें की मदद लेने के लिए मैडम जी को फोन लगाए गए तो मजाल है कि मैडम जी फोन उठाए। मैडम जी ने लगातार दो तीन दिनों तक किसी भी फोन नहीं उठाया। थक हार कर किसी ने उज्जैन में बैठने वाले मैडम जी से बडे वाले साहब को भी इसकी शिकायत कर दी। कमाल ये है कि इसके बावजूद भी मैडम जी फोन नहीं उठा रही। 

40 लाख की लूट में छुपे सवाल

बीते हफ्ते की शुरुआत ही एक सनसनीखेज वारदात से हुई थी,जब लुटेरों ने 40 लाख नगद की लूट को अंजाम दिया था। इसमें चौंकाने वाली बात ये थी कि इतनी बडी वारदात की रिपोर्ट दो-तीन दिन बाद दर्ज की जा सकी। इसमें चक्कर ये पड गया था कि लूटी गई रकम का हिसाब कहां से आता। इसलिए दो तीन दिन की माथापच्ची के बाद रिपोर्ट दर्ज करवाई गई। रिपोर्ट दर्ज करते ही वर्दी वालों ने कमाल कर दिखाया और कुछ ही घण्टों में लूट की वारदात को अंजाम देने वाले लुटेरों को धर दबोचा।

ये सबकुछ तो हो गया। वर्दी वालों की जबर्दस्त वाहवाही भी हो गई,लेकिन इसके पीछे के कई सारे सवाल अनसुलझे ही रह गए। जानकारों का कहना है कि लूटी गई रकम वास्तव में हवाला की रकम थी। हवाला का काम वैसे ही गैरकानूनी है। वारदात की रिपोर्ट दर्ज करने में देरी ही इसलिए हुई थी कि हवाला की इस रकम को एक नम्बर की रकम दिखाना थी। इसके लिए कहानी ये बनाई गई कि ये सारी नगदी शराब ठेकेदार की थी,जो कि बैैंक बन्द होने से  इस नगदी को बैैंक में जमा नहीं करवा पाया और इसीलिए उसने ये रकम दो दिन सुरक्षित रखने के लिए अपने मित्र को दे दी। संयोग से यह मित्र घोषित हवाला कारोबारी था। लेकिन शराब ठेके की रकम वाली कहानी भी जल्दी ही फुस्स साबित हो गई। क्योकि जिस शराब ठेकेदार का नाम लिया गया था,उसका कोई भी ठेका रतलाम में है ही नहीं।

अब बडा सवाल ये है कि इतनी भारी भरकम रकम,जिसे पुलिस ने चौबीस घण्टों के भीतर बरामद कर लिया,वो आखिर है किसकी? वो रकम एक नम्बर की है या दो नम्बर की? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए देश में इडी जैसी एजेंसियां बनाई गई है। जिन्हे इसकी सूचना दी जाना चाहिए थी,लेकिन अभी तक ऐसी कोई जानकारी सामने नहीं आई है। वर्दी वालों के तौर तरीकों को बारीकी से जानने वालों का कहना है कि इसी सवाल से वर्दी वालों की चांदी हो रही है। इस सवाल को टालने के एवज में सभी को जमकर मजा मिलने वाला है।