Raag Ratlami Office stairs- चर्चाओं में है जिला इंतजामिया के बडे दफ्तर की सीढियां और माननीयों का धरना / फूलछाप मेंं युवा से बुजुर्ग होने का सफर
-तुषार कोठारी
रतलाम। पिछले दिनों जिला इंतजामिया के बडे दफ्तर की सीढियां भारी चर्चाओं में रही। पहले तो जिले की पंचायत का जिम्मा सम्हालने वाली और राज्यमंत्री के बराबर की हैसियत रखने वाली मैडम जी ने इन सीढियों को अपना ठिकाना बनाया। इसके कुछ ही दिनों बाद एक और माननीय इन्ही सीढियों पर बैठे नजर आए। दोनो ही माननीय सत्तारुढ फूल छाप पार्टी से जुडे हुए थे,इसलिए सीढियां और भी ज्यादा चर्चाओं में आ गई। ये चर्चित सीढियां खत्म होकर जिस बडे चैम्बर के रास्ते पर ले जाती है,उस चैम्बर में भी एक मैडम जी ही विराजती है।
बडे दफ्तर की इन सीढियों पर खडे होकर अक्सर नारेबाजी की जाती है,लेकिन इन तरह की नारेबाजी आमतौर पर या तो पंजा पार्टी वालों की होती है या फिर उन लोगों की,जिनकी हैसियत विरोधियों वाली है। फूल छाप पार्टी चूंकि सरकार चला रही है,इसलिए फूल छाप वाले इन सीढियों पर रुकते नहीं है,बल्कि सीढियां चढ कर भीतर इंतजामिया चलाने वाले अफसरों से मुलाकातें करते हैं और अपने काम करवाते है।
लेकिन बीता हफ्ता इस मायने में अलग रहा कि फूल छाप के दो दो माननीय इन सीढियों पर चढकर भीतर जाने की बजाय सीढियों पर ही टिक गए। फूल छाप वाली मैडम जी तो अपने पतिदेव के साथ कई घण्टों तक सीढियों पर ही टिकी रही। वे जिला इंतजमिया की एक नम्बर वाली मैडम जी से मिलना चाहती थी और एक नम्बर वाली मैडम जी वहां मौजूद नहीं थी। एक नम्बर वाली मैडम जी खबर मिलने के बाद भी माननीय मैडम जी से मिलने दफ्तर में नहीं पंहुची। माननीय मैडम जी कई घण्टों इंतजार करती रही। बाद में अगले दिन फूल छाप पार्टी के जिले के मुखिया माननीय मैडम जी को अपने साथ लेकर गए। गिले शिकवे दूर किए गए और लगा कि अब जिला इंतजामिया के तौर तरीके ठीक हो जाएंगे।
लेकिन मामला फिर बिगड गया। आलोट के चुने हुए माननीय,जिला इंतजामिया की बडी मैडम जी से मिलने पंहुचे थे। लेकिन वे भी सीढियां चढकर भीतर जाने की बजाय सीढियों पर ही टिक गए। काफी देर तक खींचतान चली। आखिरकार मैडम जी को अपने चैम्बर से निकल कर बाहर आना पडा और तब कहीं जाकर मामला शान्त हुआ। लेकिन इस सारी उठापटक में कई सारे कैमरे चलते रहे,अखबारों की सुर्खियां बनती रही।
अब सवाल ये पूछा जा रहा है कि जम्हूरियत में जिला इंतजामिया के अफसर ज्यादा अहम है या लोगों के वोट से चुने हुए माननीय ज्यादा अहम है। वैसे जिला इंतजामिया की बडी मैडम जी भी आम लोगों से मिलने जुलने को हमेशा तैयार रहती है और उनके व्यवहार से भी अब तक किसी को कोई दिक्कत नहीं आई है। हर दिन उनके दफ्तर में दर्जनों आम लोग उनसे मुलाकात करते है और अपनी समस्याओं को हल करवाते है। ऐसे में माननीयों के साथ उनके बर्ताव पर भी सवाल खडे नहीं किए जा सकते। इसके बावजूद अगर माननीयों को सीढियों पर बैठना पड रहा है,तो निश्चित तौर पर ये गडबडी संवाद की कमी के कारण हो रही है। संवाद की कमी के चलते माननीयों के अहम को चोट लगी होगी और इसी वजह से दफ्तर की सीढियां चर्चाओँ में आई होगी।
दफ्तर की सीढियों पर पेश आए दो-दो वाकयों के बाद उम्मीद की जाना चाहिए कि माननीयों और साहब लोगों के बीच संवाद की कमी दूर होगी और आने वाले दिनों में बडे दफ्तर की सीढियां,दफ्तर के भीतर जाने के काम आएगी ना कि धरना देने के।
फूल छाप मेंं युवा से बुजुर्ग होने का सफर
फूल छाप पार्टी दो तरह की है। एक युवा फूल छाप पार्टी है। चूंकि एक फूल छाप युवा है इसलिए बची हुई फूल छाप को बुजुर्ग फूल छाप कहा जा सकता है। फूल छाप के एक युवा नेता लम्बे वक्त से अपने एक इन्दौरी आका के भरोसे युवा फूल छाप पार्टी का मुखिया बनने की जुगाड में लगे थे। लम्बे वक्त से वे कई तरह की कोशिशों में जुटे थे। कभी भजन संध्या कराते तो कभी और कोई आयोजन करवा कर खुद को सुर्खियों में बनाए रहते थे। लेकिन युवा फूल छाप पर न्यूरोड वाले वाले एक युवा नेता ने कब्जा जमा लिया था। जैसे तैसे उनका कार्यकाल पूरा हुआ और नए मुखिया की खोज शुरु हुई तो फिर युवा नेता ने जुगाड जमाना शुरु किया। लेकिन फूल छाप वाले भी कमाल करते है। जिसे युवा फूल छाप का मुखिया बनना था,उसे बुजुर्ग फूल छाप में दूसरे नम्बर का पद दे दिया गया। जो मुखिया के पद से हटा था,उसे प्रदेश में बडा पद दे दिया गया। युवा फूल छाप का मुखिया बनने का सपना संजोये बैठे युवा नेता अब बुजुर्ग फूल छाप में रह कर ही खुश है।
पियक्कडों के लिए आ सकती है खुशखबरी
वैसे तो हर साल अप्रैल का महीना मदिरा प्रेमी पियक्कडों के लिए दुखभरा महीना होता है,क्योकि इसी महीने में हर साल नए ठेके होते है और मदिरा महंगी हो जाती है। हर साल की तरह इस बार भी सरकार ने ठेके की दरें 20 प्रतिशत बढाने की योजना बनाई थी,लेकिन सरकार के मंसूबों पर ठेकेदारों ने पानी फेर दिया।
मार्च के महीने से अब तक ठेकों के चौदह चरण हो चुके है,लेकिन ठेकेदार दुकानें लेने को राजी ही नहीं है। सरकार ने तीन चार बार अपनी नीति तक बदल डाली। पहले ग्र्रुप में ठेके दिए जा रहे थे,जब ठेकेदार नहीं आए,तो अलग अलग दुकानों के ठेके देने की कोशिशें की गई। लेकिन फिर भी ठेकेदार टस से मस नहीं हुए। आखिरकार सरकार भाव कम करने को राजी हो गई। लेकिन तब भी कई सारी दुकानें अभी खाली ही पडी है। अगर यही हालात रहे,तो इस बार खुद सरकार को मदिरा बेचने के लिए उतरना पडेगा। ठेकों की दरें कम हो चुकी है,ऐसे में मदिरा प्रेमियों को उम्मीद है कि मदिरा के भाव नहीं बढेंगे और इससे अच्छी खुशखबर सुरा प्रेमियों के लिए क्या हो सकती है?

