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 Raag Ratlami Congress:पप्पू की हरकतों का असर,रतलाम की पंजा पार्टी पर/सांप निकलने के बाद लकीर पीटता खाद्य सुरक्षा महकमा

 

 

-तुषार कोठारी

रतलाम। भगवान ना करें किसी सियासी पार्टी को इतना बुरा वक्त देखना पडे,जितना इन दिनों पंजा पार्टी को देखना पड रहा है। सियासत में चुनावी हार जीत तो होती रहती है,लेकिन किसी पार्टी की इतनी बुरी हालत हो जाए कि आम लोग,कठिन वक्त में भी पार्टी को दुतकारने लग जाए,तो सोचिए उस पार्टी के बेचारे नेताओ का क्या होगा..?

पंजा पार्टी के साथ इन दिनों ऐसा ही बुरा वक्त पेश आ रहा है। पहले यह माना जाता था कि सरकार की ज्यादतियों से निपटने के लिए लोग विपक्षी पार्टी का सहारा लेते है। यह सच भी है,कि जब भी शासन या प्रशासन किसी मामले में कडे कदम या कडी कार्रवाई करने की कोशिश करता है,तो उस कडी कार्रवाई से लोगों को बचाने के लिए विपक्षी पार्टी मैदान में उतर जाती है और आन्दोलन प्रदर्शन आदि करके सरकार को कडे कदम वापस लेने को मजबूर कर देती है। लेकिन अगर लोगों का भरोसा ही विपक्षी पार्टी से उठ जाए तो क्या होगा..?

पंजा पार्टी के नेता जब चौपाटी के दुकानदारों की मदद करने के लिए अपने झण्डे डण्डे लेकर पंहुचे तो दुकानदारों ने पंजा पार्टी के नेताओं को साफ साफ भाषा में बता दिया कि वे पंजा पार्टी के झण्डे उठाने को तैयार नहीं है। वे अपनी लडाई खुद ही लड लेंगे। बेचारे पंजा पार्टी के नेता मन मसोस कर रह गए और नारेबाजी करने की औपचारिकता पूरी करके मौके से बिदा हो गए। आखिरकार दुकानदारों की समस्या का समाधान,खुद प्रथम नागरिक ने कर दिया और पूरे मामले का पटाक्षेप महापौर जिन्दाबाद के नारों से हुआ।

पंजा पार्टी पर अब कई सारे सवाल खडे हो रहे हैैं। अगर लोगों में पंजा पार्टी के प्रति भरोसा ही नहीं रहेगा तो पंजा पार्टी का भविष्य क्या होगा? और अगर पंजा पार्टी का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा तो बिना विपक्ष के लोकतंत्र कैसे चलेगा? खुद पंजा पार्टी के नेता भी दबी जुबान में इसी तरह के सवाल एक दूसरे से पूछ रहे हैैं।

वैसे इस सवाल का जवाब भी सभी को पता है। लेकिन समस्या सिर्फ इतनी है कि ये जवाब कोई खुलकर बताता नहीं है और समस्या की जड को छुपाते रहने से यह भी तय है कि समस्या का समाधान कभी भी संभव नहीं है। पंजा पार्टी के नेता जानते है कि मूल समस्या उपर से आ रही है। पंजा पार्टी के पप्पू युवराज की हरकतों का असर अब नीचे तक नजर आने लगा है। लेकिन पंजा पार्टी की परम्परा ये है कि युवराज की मूर्खता को मूर्खता नहीं बल्कि मास्टर स्ट्रोक कहा जाता है। अगर कोई नेता गलती से मूर्खता को मूर्खता कह देने की हिमाकत कर देता है,तो पंजा पार्टी से उसकी रवानगी तय हो जाती है।

दिल्ली में पप्पू की हरकतों का असर दिल्ली से भोपाल होता हुआ अब नीचे रतलाम तक आ चुका है। पंजा पार्टी के नेता जानते है कि सारा बखेडा पप्पू की हरकतों की वजह से है,लेकिन इसे बोल कोई नहीं सकता। पंजा पार्टी के नेता बेचारे अपनी किस्मत पर खून के आंसू रोते है। वे जानते है कि तमाम कोशिशों के बावजूद वे आम लोगों में भरोसा नहीं जगा पा रहे हैैं।

शहर में दो दो बडे काण्ड हो गए। पहले तो शहर सरकार के कारिन्दों ने दो सौ से ज्यादा लोगों को उनके घरों से बेघर कर दिया। किसी विपक्षी पार्टी के लिए इससे बडा कोई दूसरा मौका नहीं हो सकता था। नेतागिरी करने पंजा पार्टी के झुमरू दादा मौके पर पंहुचे भी थे। उस दिन तो लोगों ने पंजा पार्टी को इतनी बुरी तरह से बेइज्जत भी नहीं किया था। लेकिन एक दिन की उठापटक के बाद झुमरू दादा भी शान्त पड़ गए। जिस मामले पर बडा आन्दोलन खडा किया जा सकता था,वह टांय टांय फिस्स हो गया। अब दूसरा मौका ये आया था,जहां दर्जनों लोगों को उनकी रोजी रोटी से महरूम किया जा रहा था,लेकिन यहां तो लोगों ने पंजा पार्टी को ही दुतकार दिया। 

 ये सारे वाकये देख देख कर फूल छाप वाले बेहद खुश है। उन्हे बिना कुछ किए धरे ही सबकुछ मिल रहा है। उन्हे साफ दिख रहा है कि आने वाले तमाम चुनावी संघर्षों में उन्हे ज्यादा मशक्कत नहीं करना पडेगी। पंजा पार्टी लोगों में भरोसा खो चुकी है इसलिए फूल छाप को हर कहीं वाक ओवर मिलता रहेगा।

सांप निकलने के बाद लकीर पीटते खाद्य सुरक्षा वाले

खाद्य पदार्थो की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले महकमे के कारिन्दों ने अब जाकर छापामारी और जांच की कार्रवाई शुरु की है। महकमे के अफसरों की नींद तक खुली जब इसी कालम में उनकी हरकतों को उजागर किया गया। मध्यप्रदेश समेत देश के कई राज्यों ने एनालाग पनीर को कई दिनों पहले प्रतिबन्धित कर दिया था। नकली पनीर बेचने वाले रतलाम के तमाम दुकानदारों को यह पता चल गया था कि अब प्रतिबन्ध लग चुका है,लेकिन महकमे के अफसरों से नजदीकी के चलते उन्हे इस बात का कोई खौफ नहीं था कि उन पर कोई गाज गिरने वाली है। इसलिए वे बडे आराम से अपना नकली माल खपाते रहे।

फिर जब इ खबर टुडे ने इस मामले को उठाया,जब कहीं जाकर महकमा हरकत में आया। लेकिन हरकत में आने में भी महकमे ने तीन चार दिन लगा दिए। जानकारों का अंदाजा है कि इतना वक्त इसीलिए लगाया गया,ताकि अपने चहेतों को खबर की जा सके कि नकली माल हटा लिया जाए। जब खबरें पंहुचा दी गई,तब जाकर महकमे ने छापेमारी का खेल शुरु किया। इतना ही नहीं महकमे के लोग इतने कलाकार है कि एकाध चहेते को नकली माल रखने को भी कहा गया ताकि उनकी छापेमारी पूरी तरह असली लगे और कुछ मात्रा में नकली माल की जब्ती भी दिखाई जा सके। कुछेक होटलों में घटिया खाद्य सामग्र्री भी जब्त की गई। 

कल्पना कीजिए कि अगर महकमा पहले से चेत गया होता तो कितना नकली माल और घटिया सामग्र्री जब्त होती? लेकिन महकमे के लोग जानते है कि अगर सभी को धर लिया तो कमाई कैसे होगी? कुल मिलाकर महकमे की सक्रियता अभी त्यौहार तक देखने को मिलेगी। दो चार दस केस भी बनेंगे ताकि देखने सुनने वालों को लगे कि महकमा काम भी करता है। दो चार हफ्ते गुजरने के बाद हालात फिर वैसे ही हो जाएंगे जैसे पहले थे। पूरी कहानी सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने वाली ही है।

कान्वेन्ट का कहर....

भले ही देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश को मानसिक गुलामी से निकालने के लिए लगातार कोशिशों में जुटे हो,लेकिन देश का एक बडा वर्ग आज भी अंग्र्रेजों और अंग्र्रेजियत की मानसिक गुलामी करने में गर्व का अनुभव करता है। इसका सबसे बडा उदाहरण कान्वेन्ट स्कूल है,जहां अपने बच्चों को एडमिशन करवा देना,कई सारे अभिभावकों के लिए गर्व का विषय होता है।

अंग्र्रेजों के शासन के जमाने में कान्वेन्ट स्कूल ही औपचारिक शिक्षा का एकमात्र माध्यम बना दिए गए थे,जहां धनी और प्रभावशाली लोगों के बच्चे मोटी फीस देकर पढा करते थे। अंग्र्रेजों के जाने के बाद भी वह मानसिकता यथावत रह गई और कई प्रभावशाली लोगों के लिए कान्वेन्ट में बच्चों का एडमिशन करवाना ही उनकी बडा उपलब्धि होता है। इनमें भी देश के अधिकारी वर्ग की संख्या बहुत अधिक है। कान्वेन्ट स्कूल चलाने वालों को भी अपना महत्व अच्छे से पता है। इसीलिए वे अपने आपको हर नियम कायदे से उपर समझते है।

हांलाकि वास्तविकता इससे एन उलट है। रिजल्ट के मामले में आजकल कान्वेन्ट स्कूलों के बच्चे अक्सर पिछड जाते हैैं। कान्वेन्ट स्कूलों में पढाने वाले शिक्षकों की योग्यता भी तुलनात्मक रुप से अन्य अच्छे स्कूलों से बेहद कम होती है। लेकिन मानसिक गुलामी में रहने वाले लोगों के लिए कान्वेन्ट फिर भी उनके गौरव का विषय है।

कान्वेन्ट वाले जानते है कि अधिकांश अफसरों के बच्चे उनके स्कूल में पढते हैैं इसलिए वे ना तो किसी नियम को मानते है और ना ही सरकारी आदेशों को महत्व देते हैैं। हाल ही में कान्वेन्ट वालों ने अपनी पुरानी बिल्डिंग को तोडकर नई बिल्डिंग बनाने का काम शुरु किया है। कान्वेन्ट वाले हैैं इसलिए उन्हे अन्य लोगों की कोई चिन्ता नहीं होती। पुरानी स्कूल बिल्डिंग गिराने के दौरान पूरी लापरवाही बरती गई और इसी वजह से बगल की कालोनी में लगातार मलबा गिरती रहा। इतना ही नहीं खुदाई के दौरान कालोनी मेंं जाने वाली पेयजल की मुख्य पाइप लाइन भी तोड दी गई,जिससे हजारों लीटर पेयजल व्यर्थ बह गया और कालोनीवासी पेयजल के लिए तरस गए।

इतना सबकुछ हो गया,लेकिन कान्वेन्ट वालों को कोई फर्क नहीं पडा। कान्वेन्ट वालों की दादागिरी से परेशान कालोनीवाले बाकायदा जुलूस निकाल कर नारेबाजी करते हुए थाने पर पंहुते और कान्वेन्ट के खिलाफ प्रकरण दर्ज करने की मांग की। नगर निगम ने भी कालोनी वालों की शिकायत पर ना सिर्फ कान्वेन्ट पर भारी भरकम जुर्माना लगाया,बल्कि उनके खिलाफ केस दर्ज करने के लिए पुलिस को पत्र भी लिख दिया। 

लेकिन कान्वेन्ट का असर देखिए कि इतना सबकुछ होने के बावजूद पुलिस वालों ने कान्वेन्ट के खिलाफ अब तक कोई केस दर्ज नहीं किया है। कान्वेन्ट वालों की हरकतें उसी तरह चल रही है,जैसे पहले चला करती थी। जानकारों का कहना है कि हिन्दूवादी सरकार के होने के बावजूद कान्वेन्ट के खिलाफ कार्रवाई ना होने का एकमात्र कारण है कि ना सिर्फ अफसरों के बच्चे बल्कि कई हिन्दूवादी नेताओं के बच्चे भी इसी स्कूल में पढते है। ऐसे में कान्वेन्ट के खिलाफ कार्रवाई करने की हैसियत किसकी हो सकती है...?