Raag Ratlami Anant Chaturdashi : बप्पा की बिदाई ने मैदान को दिलाया असली नाम,रात से लेकर दोपहर बाद तक झिलमिलाई झांकियां
-तुषार कोठारी
रतलाम। लगातार ग्यारह दिनों तक भक्तों को आनन्द देने के बाद जब बप्पा की बिदाई का मौका आया,तो कई सारी बातें हुई। नवाबी नगरी जावरा के मैदान को जहां अपना असली नाम पैलेस मैदान वापस मिला,वहीं रतलामी बाशिन्दों को त्यौहार की पुरानी सज धज और शानौशौकत देखने को मिली। चौदस की रात को प्रांरभ हुई झांकिया अगले दिन शाम तक झिलमिलाती रही और रतलामी लोगों को झांकियों के साथ साथ अखाडों के कलाकारों के हैरत अंगेज कारनामे भी देखने को मिले।
इस बार का गणेशोत्सव न सिर्फ दस दिनों की बजाय ग्यारह दिनों का था,बल्कि दूसरे कई मायनों में भी खास था। बरसों के बाद गणेश पाण्डालों में सामाजिक सरोकारों से जुडे विषयों पर चर्चाएँ हुई। भगवान की भक्ति के साथ साथ भक्तों ने पार्यवरण,स्वच्छता,स्वदेशी,नागरिक अनुशासन जैसे मामलों पर समाज में सुधार लाने की कोशिश की। इतना ही नहीं गणेश पाण्डालों में देश भक्ति के महामंत्र वन्दे मातरम का भी गायन किया गया।
ग्यारह दिनों के इस खास आयोजन के साथ साथ जावरा का गणेशोत्सव इस बार खासा चर्चा में रहा। कुछ मजहबी कïट्टरपंथियों के बेवजह के विरोध के कारण गडबडी की आशंकाएं बनी रही,लेकिन वर्दी वालों की सख्ती और प्रशासन के कडे रवैये के कारण कोई गडबडी नहीं हो पाई। इसके चलते शहर के मैदान को अपना असली नाम पैलेस मैदान वापस भी मिल गया।
कहानी महज मजहबी कïट्टरपंथियों की हठधर्मिता की थी। किसी जमाने में करीब सौ साल पहले किसी उदारमना व्यक्ति ने अपनी निजी जमीन ताजियों के जुलूस के लिए केवल उसी दिन उपयोग करने की अनुमति दे दी थी। एक बार इजाजत दी तो हर साल मैदान का उपयोग ताजिये ठण्डे करने के लिए होने लगा। भाई लोगों ने इस पैलेस मैदान का नाम ही बदलकर कर्बला मैदान रख दिया था। इस बार जब गणेश विसर्जन की शोभायात्रा के लिए इस मैदान के उपयोग की बात आई,तो कुछ मजहबी कïट्टरपंथियो ने इसका विरोध शुरु कर दिया। उनका कहना था कि इस मैदान पर ताजिये ठण्डे किए जाते है,इसलिए यहां गणेश जी को नहीं आने दिया जाएगा। कुछ मजहबी कïट्टरपंथियों ने सोशल मीडीया पर बेहद भडकाउ भाषण भी जारी कर दिए।
माहौल तनाव भरा बनने लगा। फिर मैदान में आए वर्दी वाले। उन्होने भडकाऊ बयानबाजी करने वालों को हडकाया और प्रशासन ने सख्ती दिखाई। भारी तादाद में वर्दी वाले तैनात कर दिए गए। बताया गया कि जिसे कर्बला मैदान कहा जा रहा है,वो असल में पैलेस मैदान है और निजी जमीन है। आखिरकार सबकुछ शांति से हो गया और मैदान को अपना असली नाम भी वापस मिल गया।
इधर रतलाम में रात से शुरु हुई झांकिया पूर्णिमा के दिन शाम तक झिलमिलाती रही। बरसों बाद अखाडे और झांकिया दोबत्ती से शुरु हुई। सुनियोजित तरीके से स्वागत मंच बनाए गए,ताकि अखाडों के कलाकार व्यवस्थित तरीके से अपनी कला का प्रदर्शन कर पाएं। सबसे कमाल की बात ये थी कि अखाडों में अब बडी संख्या में नन्ही बच्चियां तैयार की जा रही है। नन्ही बच्चियों के कमाल देखकर हर कोई दांतो तले उंगलिया दबाने को मजबूर था। लोगों की भीड के सामने तलवार बाजी और दूसरे खतरनाक करतब करने वाली ये बच्चियां नारी सशक्तिकरण का सबसे जबर्दस्त उदाहरण है। जिन बच्चियों ने अपने जीवन में तलवार चलाना सीख लिया,उनसे ज्यादा साहसी और कौन हो सकता है। ऐसी बच्चियां जब बडी होंगी,तब उन्हे ना तो कोई छेडने लायक होगा ना कोई उन्हे प्रताडित कर पाएगा। ये सक्षम और साहसी बच्चियां ही नए भारत का नेतृत्व करती हुई दिखाई देंगी।
नेतागिरी की आड में जुआघर का संचालन
पंजा पार्टी जब से सत्ता से बाहर हुई है,इसके नेता बेचारे बेरोजगार हो गए है। करने धरने को कुछ है नहीं इसलिए कई सारे पुराने नेता नए नए धन्धों में हाथ आजमाने लगे है। गले में क्रास लटकाने वाले एक आदिवासी नेता के घर पर वर्दी वालों ने जुआ घर पकड लिया। नेताजी के दो सुपुत्र धडल्ले से जुआ घर चला रहे थे। वर्दी वालों ने नेताजी के घर से हजारों रुपए की नगदी और जुआरियों को भी धर दबोचा।
पंजा पार्टी में कई सारी जिम्मेदारियां निभा चुके ये नेताजी कुछ सालों पहले धोखाधडी के मामले में भी फंस चुके है। पंजा पार्टी सत्ता से बाहर है इसलिए इनकी नेतागिरी भी चल नहीं पा रही। धोखाधडी का मामला अभी निपटा नहीं है,कि नेताजी के बेटे जुआघर के मामले में जमा हो गए। नेताजी सोचते होंगे कि जब तक पार्टी की पुरानी हैसियत वापस नहीं आती तब तक इसी तरह के धन्धों से कमाई कर ली जाए। भविष्य में अगर पार्टी की ताकत बढ गई तो फिर से नेतागिरी करने लगेंगे।
जल संकट की आहट
बारिश की कमी ने अब लोगों को डराना शुरु कर दिया है। किसी जमाने में पानी की कमी को लेकर बदनाम रहे रतलाम में धोलावाड बान्ध बनने के बाद पानी का संकट कुछ हद तक कम हो गया था,लेकिन इस बार बारिश की कमी के चलते धोलावाड बान्ध पूरी तरह भर नहीं पाया है। अगर बान्ध का जलाशय पूरी तरह नहीं भराया तो तय है कि गर्मियों के दिनों में पीने के पानी की कमी हो जाएगी। शहर के अधिकांश इलाकों में अभी एक दिन छोडकर पानी दिया जाता है। पानी की कमी होने के बाद दो या चार दिन छोडकर पानी देने की नौबत भी आ सकती है। अगर ऐसा हुआ तो डरावने दृश्य देखने को मिल सकते है। इसी को देखते हुए जिला इंतजामिया के बडे साहब ने धालावाड के पानी से होने वाली सिंचाई पर रोक लगाने का फरमान भी जारी कर दिया है,ताकि पीने का पानी गर्मियों के अंत तक मिल सके।
अब सबकुछ भगवान भरोसे है। अभी भी अगर दो-चार दिन की जबर्दस्त झडी लग जाए तो यह संकट दूर भी हो सकता है।

