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 Raag Ratlami Navratri Fair : बच्चे,ठेकेदार और आयोजक हर कोई मजे में लेकिन झमेला बनकर रह गया कालिका माता का नवरात्रि मेला

 

 

-तुषार कोठारी

रतलाम। किसी जमाने में रतलाम के कालिका माता मेले की पूरे देश में धूम हुआ करती थी। नवरात्रि मेेले के मंच की भी जबर्दस्त पूछ परख होती थी। नवरात्रि मेले के कवि सम्मेलन में जो कवि हिट हो जाता था,वह पूरे देश में हिट हुआ करता था। देश के बडे बडे कवि कालिका माता मेले के मंच पर कविता पढने के सपने देखा करते थे। लेकिन मेले का झमेला कुछ ऐसा हुआ कि ना तो मंच की कोई महिमा रही और ना मेले की धूम रही।

मेले की गिरावट की असली शुरुआत तो तभी हो गई थी,जब बिना बैलों की गाडी पर बैठ कर आए झुमरू दादा ने शहर सरकार की कमान सम्हाली थी। एसा नहीं था कि पहले मेले से कमाई नहीं की जाती थी,लेकिन झुमरु दादा ने कमाई बढाने के लिए मंचीय कार्यक्रम को ठेके पर दे दिया और कालिका माता का मंच अश्लील नाच गानों का स्थान बन कर रह गया। नतीजा ये हुआ कि तब से लगातार मेले की महिमा कम ही होती जा रही है।

मेले की ठेकेदारी का रिवाज ऐसा चला कि आज तक जारी है। सबसे बडा कमाल इस बार किया गया। मेले के दसों दिनों के कार्यक्रम मेला शुरु होने तक तय नहीं हुए। शहर सरकार के कलाकारों ने इसका नया फार्मूला ढूंढ निकाला। मेले के आमंत्रण पत्र में कार्यक्रमों की सूचि तो छाप दी गई लेकिन इसमें कलाकारों का कोई जिक्र नहीं किया गया। कौन से कलाकार या कवि बुलाए गए है,इसका कोई उल्लेख नहीं किया गया।

ठेकेदार को दो सौ से ढाई सौ परसेन्ट का कमीशन देना पडता है। ठेकेदार ने भी कमीशन की अंधाधुंध बढोत्तरी को देखते हुए कलाकारों के नाम ही नहीं बताए। सिर्फ इतना घोषित किया गया कि फलां दिन आर्केस्ट्रा होगा और फलां दिन भजन गायकों का सुर संगम। एक दिन डांसिंग नाइट रखी गई तो एक दिन सेलिब्रिटी नाइट। लेकिन ये नहीं बताया गया कि डांसिंग नाइट में डांस कौन दिखाएगा और सेलिब्रिटी नाइट में सेलिब्रिटी कौन होगा?

कुल मिलाकर बीते कुछ सालों में मेले के मंच के सामने बैठने वालों की तादाद लगातार घटती जा रही है इसलिए मेला आयोजकों को अब इसकी चिंता भी नहीं है कि मेले के कार्यक्रमों का स्तर उंचा रखा जाए। मेले के कर्ता धर्ताओं को अपने कमीशन की ही अधिक चिंता रहती है और कार्यक्रम जितना घटिया होगा,कमाई उतनी अधिक होगी।

मंच का मामला बिगडा तो बाकी चीजों का स्तर कैसे अच्छा रह सकता था। मेले की शुरुआत में ही बिजली की दरों को लेकर लफडा हो गया और मेले के झूले बन्द हो गए। बिजली ठेकेदार और दुकानदारों में बिजली के रेट का मामला जैसे तैसे सुलटाया गया और तब जाकर झूले चालू हो पाए। झूले वाले इस बार इसलिए दुखी है,क्योकि झूला परिसर में जरुरत से ज्यादा दुकानें लगा दी गई है। नतीजा ये है कि लोगों के चलने के लिए  जगह बेहद कम बची है। मेले में अब मंच का आकर्षण तो रहा नहीं,इसलिए मेले का सबसे बडा आकर्षण झूला ही बचा है। शहर के तमाम बच्चे और उनके माता पिता को झूला परिसर में जाना ही पडता है। दुकानें ज्यादा लग जाने से इस परिसर में जबर्दस्त भीड भाड हो जाती है। ये तो कालिका माता की कृपा ही है कि अब तक कोई हादसा सामने नहीं आया है।

कुल मिलाकर मेले का झमेला लगातार जारी है। बच्चे मेले के मजे ले रहे हैैं। ठेकेदारों को अपना हिस्सा मिल रहा है और शहर सरकार के ठेकेदार भी मजे में है। अगर किसी का नुकसान हो रहा है,तो वह मेले का हो रहा है। मेले की महिमा लगातार कम होती जा रही है। मेला अब सिर्फ एक झमेला बनकर रह गया है।

बच्चों का पैदल मार्च,पीएम श्री में भी गडबडियां

वैसे तो सरकार में बैठा हर कोई नेता ये दम भरता है कि सरकारें,बच्चों और उनकी शिक्षा पर बहुत ध्यान देती है,लेकिन असलियत कुछ और होती है। आदिवासी बच्चों के लिए सरकार ने एकलव्य के नाम पर आवासीय विद्यालय बनाए है,जिसमें बच्चों को हर तरह की सुविधाएं देने का दावा किया जाता है। लेकिन जब हकीकत सामने आती है तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। बाजना के आवासीय विद्यालय की हकीकत तब सामने आईी,जब स्कूल के बच्चों ने वहां से जिला मुख्यालय तक पैदल मार्च शुरु कर दिया। बच्चे पैदल चल कर रतलाम आने वाले थे,ताकि जिला इंतजामिया के बडे अफसरों को स्कूल की हकीकत से वाकिफ करवा सके।

बच्चों को ना तो ठीक से भोजन मिल रहा था और ना ही पानी का इंतजाम था। बच्चे कह कह कर थक गए तो आखिरकार पैदल मार्च पर चल पडे। इस बात की खबर जैसे ही बाजना के अफसरों को लगी,वे फौरन हरकत में आए। बाजना से निकले बच्चों को रास्ते में रोका और उनकी समस्याएं सुनी। बच्चों को समस्याएं हर करने का भरोसा दिलाया। तब जाकर बच्चे वापस लौटने को राजी हुए। 

मामला सिर्फ वहीं का नहीं था। इधर रिंगनोद में प्रधानमंत्री के नाम पर बनाए गए पीएम श्री विद्यालय में भी सबकुछ ठीक नहीं था। जिला इंतजामिया के सबसे बडे साहब,जावरा के माननीय भैया के साथ इस स्कूल के औचक निराक्षण पर जा पंहुचे। वहां पंहुचे तो पता चला कि पीएम श्री स्कूल में बच्चों को देने के लिए पुस्तकें ही नहीं थी। बडे साहब ने जब पीएम श्री स्कूल की असलियत जानीतो उन्होने अपने मातहतों को स्कूल की समस्याएं दूर करने के निर्देश दिए। कुल मिलाकर ये तो उन स्कूलों की कहानी है,जिन पर सरकार विशेष ध्यान देती है। ऐसेे में उन सरकारी स्कलों की हालत का अंदाजा आसानी सससे लगाया जा सकता है,जिन पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता।