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गोरा तालाब के बगैर खेतों की चिंता, संरक्षण की सख्त ज़रूरत

 

Damoh News: गोरा ग्राम पंचायत में स्थित गोरा तालाब कभी क्षेत्र का प्रमुख जलस्रोत और पिकनिक स्पॉट हुआ करता था। छतरपुर से लगभग 21 किलोमीटर दूर फैला यह तालाब ऐतिहासिक चंदेल काल का स्मारक है और चारों ओर हरी-भरी पहाड़ियाँ तथा समृद्ध वन्यजीव क्षेत्र फैला है। तालाब के आसपास करीब 200 प्रजाति के परिंदे बसे हुए पाए जाते थे और जलवैयविध्य से यह क्षेत्र खास माना जाता था।

वर्षों से तालाब का रखरखाव सुस्त पड़ा है। तालाब का भराव क्षेत्र अब घटता जा रहा है और बांधों पर हुए क्षतियों से पानी का रिसाव बढ़ रहा है। पुराने समय में तालाब के किनारे स्थित रेस्ट हाउस भी खंडहर बन चुका है; खिड़कियाँ और दरवाजे टूटे पड़े हैं और कुछ हिस्सों में असामाजिक तत्वों ने अड्डा बना लिया है। पिछले दशक में लगातार कम वर्षा के कारण तालाब अक्सर सूखने की कगार पर रहा, जिसके चलते विभागीय मरम्मत और निगरानी भी बंद हो गई।

हालाँकि इस वर्ष अच्छी बारिश होने के बावजूद तालाब की व्यवस्था टूटे नहरों और बंधों के कारण खेतों तक पानी नहीं पहुँचा पाई। तालाब की कुल भराव क्षमता लगभग 264 एमसीएम बताई जाती है, पर वास्तविक उपयोगिता घट चुकी है। तालाब के बांध पर पहले की गई पत्थर पिचिंग कई स्थानों पर टूट चुकी है और अब गिरती हुई पत्थर संरचना के लिए जोखिम बन रही हैं। मरम्मत की सही समय पर न होने से आसपास के ग्रामीणों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

गोरा तालाब पर निर्भर लगभग दर्जनों गांवों की जमीनें — गोरा, राजापुरवा, श्यामाझोर, बरा, पुरवा, सुकवां, चंद्रपुरा, बंछौरा, मचा और सुनाटी — समय पर पानी न मिल पाने के कारण प्रभावित हो रही हैं। यहां की प्रमुख फसलें मूंगफली, गेहूं और ज्वार हैं; सिंचाई में व्यवधान के चलते कई किसान खेती छोड़ने को मजबूर हुए हैं। रोजगार के सीमित साधनों के कारण लगभग 20 प्रतिशत परिवार पलायन कर चुके हैं और युवा नई नौकरी की तलाश में शहरों की ओर रहे हैं।

गांव की जनसंख्या लगभग 1700 है और साक्षरता दर करीब 57 प्रतिशत है। शिक्षा के विकल्प सीमित हैं — ग्राम में आठवीं तक ही सरकारी स्कूल उपलब्ध है, इसलिए आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को नज़दीकी कस्बों तक जाना पड़ता है; फलतः करीब 90 प्रतिशत बालिकाएँ आगे की पढ़ाई नहीं कर पातीं।

स्थानीय लोगों का मानना है कि तालाब का संरक्षण, नहरों की सफाई और बांध की मरम्मत तत्काल प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही तालाब से जुड़े मछली पालन और पर्यटन संबंधी योजनाओं में ग्रामवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए ताकि उन्हें आय का वैकल्पिक स्रोत मिले। समय रहते यह कदम उठाए न गए तो न सिर्फ कृषि संकट बढ़ेगा बल्कि गांव का सामाजिक व आर्थिक पतन भी तेज होगा।