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 उज्जैन का भारत सेवक मंदिर जो अपने में समेटे है देश के परम वीर चक्रधारियों की गाथा

 

 

उज्जैन,14अगस्त(इ खबर टुडे / ब्रजेश परमार)। भगवान श्री महाकालेश्वर की नगरी मंदिरों का शहर कही जाती है। 84 महादेव,नौ नारायण,अष्ट भैरव,सप्त सागर,108 हनुमान और सता मंदिर हैं तो यहा भारत सेवक मंदिर भी है जो अपने आप में देश के परम वीरों की गाथा को समेटे हुए है।देश की आजादी के बाद के 21 परमवीर चक्र विजेताओं को इस मंदिर में सम्मान मिला है। प्रतिदिन इनकी सेवा,पूजा,आरती यहां होती है, तो उनके साथ  ही देश के महापुरूषों को इस मंदिर में स्थान मिला हुआ है।

लालपूल से नर्सिंहघाट रोड पर भारत सेवक मंदिर की स्थापना 2007 में उज्जैन के महानंदा नगर निवासी पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश दानसिंह सुगनचंद चौधरी ने की थी। करीब दो बीघा जमीन पर सडक के किनारे बने 50 बाय 30 के दो मंजिला भवन रूपी इस मंदिर में देश की आजादी के बाद भारत भूमि की रक्षा में अपने प्राणोत्सर्ग करने वाले 21 परमवीर चक्रधारी परम पुरूषों की 3 बाय 3 फीट की फायबर की प्रतिमा स्थापित की गई है। 

मंदिर में परमवीर चक्रधारी परमपुरूषों को क्रम से रखा गया है। प्रतिमा के नीचे स्पष्ट एवं सुवाच्य हिनदी में उनकी वीरता की गाथा भी अंकित की गई है। युद्ध समय के सर्वोच्च बहादुरी पदक में यहां प्रथम परमवीर चक्रधारी मेजर सोमनाथ शर्मा 1947 से लेकर कारगिल युद्ध 1999 के कैप्टन विक्रम बत्रा,मेजर मनोज कुमार पांडे,ग्रेनेडियर योगेन्द्रसिंह यादव, रायफल मैन संजयकुमार तक की कुल 21परमवीर चक्रधारी की प्रतिमाएं हैं। 

भूतल पर इनके साथ ही 22 महापुरूषों की प्रतिमा भी यहां है। पीतल का भारत का एक वृह्द नक्शा मंदिर के बीचोंबीच स्थापित किया गया है। उसमें बारह ज्योर्तिलिंगों को स्थान दिया गया है। यही नहीं जय जवान ,जय किसान एवं जय विज्ञान का सिंबाल भी यहां नक्शे के पास स्थापित किया गया है। मंदिर के सेवक अलीराजपुर निवासी सुरभसिंह जामोद बताते हैं कि वर्ष 2017 में श्री चौधरी के देहांत के उपरांत केंद्रीय सेवाओं में अभियंता का दायित्व निभा रहे उनके पूत्र संजय चौधरी इसका बाहरी प्रदेशों में रहते हुए संचालन कर रहे हैं। 

साल में दो चार बार वे यहां आते हैं और मंदिर के आयोजनों में भाग लेते हैं। स्वतंत्रता दिवस पर यहां हर साल की तरह काव्य  गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। मंदिर की स्थापना के समय ही बाबूजी ने ये प्रतिमाएं महाराष्ट्र से बनवाई थी तत्कालीन दौर में ही इनकी कीमत हजारों रूपए में पडी थी। सुरभसिंह बताते हैं कि मंदिरों के शहर में आने वाले श्रद्धालुओं में से यहां बहुत कम ही लोग आते हैं और वे भी गिनती के। जानकारी के अभाव में सेना के लोग कभी कभार जब कभी इस और से गुजरते हैं और देखते हैं तो रूकते हैं एवं अपने परमवीरों को नमन करने से नहीं चूकते हैं। राष्ट्र दिवसों पर भी यहां राजनीतिज्ञ लोगों का आना जाना भी नहीं होता है और न ही सामान्य दिनों में ही कोई ऐसा जनप्रतिनिधि आता है।  

पिछले कई वर्षों से मंदिर में प्रतिदिन सेवा करने वाले जामोद का कहना है कि गुरू नरसिंहानंद जी के यहां जुडा हुआ था बाबूजी यहां ले आए। तभी से परमवीरों एवं महापुरूषों की सेवा में लगे हुए हैं। प्रति दिन मंदिर की सफाई एवं प्रतिमाओं का रखरखाव करते हैं। सुबह शाम यहां आरती होती है। मंदिर की शेष भूमि एक बीघा पर वे वे खेती भी करते हैं। उसकी आय एवं जो उन्हें सेवक के रूप में मिल जाता है उसी से दंपत्ति एवं तीन बच्चों का गुजर बसर होता है।

परमवीर चक्रधारी
मेजर सोमनाथ शर्मा-1947, लांस नायक करहमसिंह1948, सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राने1948,नायक यदुसिंह 1948,कंपनी हवलदार मेजर
पिरूसिंह 1948,केप्टन गुरूबचनसिंह1961,मेजर धानसिंह थापा 1962,सूबेदार जोगिंदरसिंह 1962,मेजर शैतानसिंह1962,कंपनी हवलदार  मेजर अब्दुल हमीद1965,ले.कर्नल आर्देशिर बरजोरजी तारापोरे1965,लांस नायक अलबर्ट एक्का 1971,फ्लांईंग आफिसर  निर्मलजीतt सिंह1971,से.लेफ्टिनेंट अरूण खेत्रपाल1971,मेजर होशियारसिंह1971,नायक सूबेदार बनासिंह1987,मेजर रामास्वामी परमेश्वरन 1987,कैप्टन विक्रम बत्रा1999, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे 1999,ग्रेनेडियर योगेन्द्रसिंह यादव1999, रायफल मैन संजयकुमार 1999।