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 जिन्दगी के सबसे बुरे सपने जैसा था इरान की जेल में गुजारा वक्त

 इरान युद्ध में फंसे रतलाम के डॉ रत्नदीप की आपबीती
 
 
** महीनों तक रहे जहाज पर
** गलतफहमी ने पंहुचाया जेल
** भारत सरकार ने छुडवाया कैदियों को
** गैस लेकर ही लौटे इरान से
 

रतलाम,24 अप्रैल (इ खबरटुडे)। इजराइल इरान युद्ध के दौरान इरान की एक जेल में बन्द रहना जिन्दगी के सबसे बुरे सपने की तरह है। ऐसे संकट के वक्त विदेश में फंसा व्यक्ति ही यह समझ पाता है कि मेरा भारत महान है। जब भारत की सरकार संकट के समय विदेश में फंसे भारतीय नागरिक को सुरक्षित निकाल कर उसके घर पंहुचाती है,तब जाकर ये समझ में आता है कि आज भारत की हैसियत दुनिया में कितनी बढ चुकी है और क्यो मेरा भारत महान है?

यह कहना है इजराइल इरान युद्ध के बीच में महीनों तक इरानी समुद्र में जहाज में फंसे रहे रतलाम के इलेक्ट्रिकल इंजीनियर डॉ रत्नदीप पैठनकर का। युद्ध के दौरान डॉ रत्नदीप ना सिर्फ महीनों तक जहाज में फंसे रहे थे बल्कि इस दौरान एक गलतफहमी के चलते उन्हे इरान की जेल में भी रहना पडा। भारत सरकार की कोशिशों के चलते जल्दी ही जेल से उनका छुटकारा हो गया और बाद में वे सही सलामत भारतीय नौसेना और इरानी नौसेना की सुरक्षा में गैस से भरा जहाज लेकर भारत भी आ गए।

रतलाम निवासी डॉ रत्नदीप पैठनकर ने बताया कि वे एक टर्किश जहाज कंपनी के जहाज पर इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के रुप में कार्यरत है और उनकी कंपनी भारत के लिए इरान से गैस के जहाज लेकर आती है। गैस फेट नामक उनका मालवाहक जहाज पिछली 17 नवंबर 2025 को गुजरात के सिक्का पोर्ट से इरान के आसुलिया पोर्ट के लिए निकला था। डॉ रत्नदीप के मुताबिकउनका जहाज करीब पन्द्ह दिनों में इरान से गैस लेकर भारत आ जाता है। युद्ध शुरु होने से पहले डॉ रत्नदीप का जहाज इरान के तीन चक्कर लगा चुका था। 

तेरह सौ जहाज मौजूद थे युद्ध शुरु होने के वक्त

दिसम्बर के आखरी दिनों में उनका जहाज फिर से भारत से इरान पंहुचा था। जहाज पर डॉ रत्नदीप समेत कुल 23 लोग  मौजूद थे। 28 दिसम्बर को इजराईल अमेरिका और इरान के बीच युद्ध शुरु हुआ। उस वक्त डॉ रत्नदीप का जहाज गैस फेट इरान के आसुलिया पोर्ट पर ही मौजूद था और जहाज में गैस लोड की जा रही थी। अचानक शुरु हुए युद्ध के चलते पोर्ट का सारा कामकाज रोक दिया गया। डॉ रत्नदीप के मुताबिक उस वक्त पोर्ट के नजदीक दुनियाभर के देशों के करीब तेरह सौ जहाज मौजूद थे।

ये सारे जहाज पोर्ट के आसपास के समुद्र में ही जस के तस खडे थे। इन जहाजों में से कई पर तो भोजन और पानी का भी संकट पैदा होने लगा था। डॉ रत्नदीप के मुताबिक उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्होने आसुलिया पोर्ट पंहुचने के कुछ ही पहले जहाज में पर्याप्त खाद्य पर्दाथ और पेयजल भर लिया था,जिसकी वजह से उनके जहाज पर खाने पीने का कोई संकट नहीं हुआ।

डॉ रत्नदीप ने बताया कि उस दौरान रोजाना आसमान में युद्ध के भयानक नजारे दिखाई देते थे। सारा दिन और रात को इधर से उधर जाती विंध्वसंक मिसाइले नजर आती थी। डॉ रत्नदीप ने आसमान से जाती कई मिसाइलों के फोटो और विडीयो अपने मोबाइल में रेकार्ड भी किए थे। शायद इसी वजह से उन्हे इरान की जेल में वक्त गुजारना पडा। गिरफ्तारी के दौरान इरानी अधिकारियों ने ये सारे विडीयो और फोटो भी डिलीट कर दिए थे। 

लगातार दो महीने एक ही जगह पर

डॉ रत्नदीप ने बताया कि 28 दिसम्बर को जैसे ही युद्ध शुरु हुआ,आसुलिया पोर्ट के सारे काम काज रोक दिए गए और तमाम जहाजों को पोर्ट से बाहर कर समुद्र में रहने को कह दिया गया था। आसुलिया पोर्ट के समुद्र में मौजूद तेरह सौ के करीब जहाज जहां खडे थे,वहीं स्थिर कर दिए गए। डॉ रत्नदीप का जहाज गैसफेट भी इन्ही में से एक था। ये तमाम जहाज दो महीने से ज्यादा वक्त तक वहीं मौजूद थे। कुछेक जहाजों ने जब इधर उधर जाने की कोशिशें की तो उन पर हमले हुए और इस वजह से कुछ जहाजों के कर्मचारी घायल भी हुए। इस दौरान उनका जहाज लगातार इरानी अधिकारियों के सम्पर्क में रहता था और उन्हे यह बताता रहता था कि वे सभी भारतीय नागरिक है।

छ:घण्टे की चैकिंग और पूछताछ

डॉ रत्नदीप ने बताया कि लगातार दो महीने तक आसुलिया पोर्ट के पास फंसे रहने के दौरान फरवरी महीने के बीच में अचानक एक दिन आइआरजीसी (इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स) की कोस्ट गार्ड यूनिट के कुछ सैनिक अचानक जहाज पर पंहुचे और उन्होने जहाज की तलाशी प्रारंभ कर दी। आइआर जीसी की ये चैकिंग असल में जहाजों पर पाकिस्तानी नागरिकों की जांच के लिए शुरु की गई थी।

डॉ रत्नदीप ने बताया कि उनके जहाज पर कोस्ट गार्ड के सैनिक करीब 6 घण्टे तक चैंिकग करते रहे। उनके साथ खोजी कुत्ते भी इस चैकिंग में शामिल थे। चैकिंग के दौरान जहाज पर मौजूद सारे अधिकारी कर्मचारियों के प्रत्येक सामान की बेहद बारीकी से चैकिंग की गई। जहाज पर मौजूद लोग इरानी सैनिकों की भाषा नहीं समझ पा रहे थे और ना ही इरानी सैनिक उनकी बात समझ पा रहे थे।

करीब छ: घण्टों तक चली चैकिंग के बाद इरानी सैनिकों ने जहाज पर मौजूद 23 लोगों में से ग्यारह व्यक्तियों को अलग निकाला और उन्हे अपने साथ बोट पर लेकर वे पोर्ट पर आ गए। पोर्ट पर बनाए गए एक इंटरोगेशन रुम में सभी पकडे गए लोगों से अलग अलग पूछताछ का सिलसिला शुरु हुआ। इरानी सैनिक सिर्फ डॉ रत्नदीप के जहाज से ही नहीं बल्कि दूसरे जहाजों से भी कई लोगों को पकड कर लाए थे। उनकी सबसे ज्यादा तवज्जोह पाकिस्तानी और बांग्लादेशी लोगों पर थी।  

गलतफहमी ने पंहुचाया जेल

डॉ रत्नदीप ने बताया कि पूछताछ करने के लिए दो व्यक्ति टेबल की दूसरी तरफ मौजूद थे। पकडे गए प्रत्येक व्यक्ति के हाथ कुर्सी पर पीछे की ओर बान्ध कर उनसे पूछताछ की जा रही थी। डॉ रत्नदीप ने बताया कि जब उनसे पूछताछ की जा रही थी तो उन्हे बिलकुल भी समझ में नहीं आ रहा था कि उनसे क्या पूछा जा रहा है। इतना ही नहीं पूछताछ करने वाले अधिकारी,डॉ रत्नदीप की बात भी नहीं समझ पा रहे थे। 

पूछताछ का ये दौर भी घण्टों तक चला। पूछताछ करने वाले एक ही बात को कई बार घुमा फिरा कर पूछते रहे। घण्टों चली पूछताछ के बाद अब सभी पकडे गए लोगों को जेल ले जाया गया। डॉ रत्नदीप के मुताबिक वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि उनके साथ आखिर हो क्या रहा है? उनके मोबाइल समेत सारे गैजेट्स उनसे छीन लिए गए थे। किसी से भी सम्पर्क करने का कोई जरिया उनके पास नहीं था। वे अपनी बात किसी इरानी अधिकारी को समझा भी नहीं पा रहे थे। पूछताछ के बाद उन्हे जेल ले जाया गया।

जेल में प्रत्येक बन्दी को एक दूसरे से तीन तीन फीट दूर रखा गया था। उनका एक हाथ हथकडी से बान्ध कर दीवार पर बान्ध दिया गया था। इस कैद में उन्हे पूरे वक्त इसी तरह रहना था। बांया हाथ हथकडी से दीवार पर बन्धा हुआ था और इसी स्थिति में उन्हे बैठे रहना था। डॉ रत्नदीप के मुताबिक उन्हे यह भी पता नहीं चल रहा था कि  बाहर दिन का वक्त है या रात का। हथकडी से बन्धे हुए हाथ के साथ ही उन्हे सोना भी था। बन्धे हुए हाथ पर ही सिर टिका कर वे सो सकते थे। डॉ रत्नदीप के मुताबिक जेल में गुजारा ये वक्त उनकी जिन्दगी के सबसे बुरे सपने जैसा था।

भारत सरकार ने निकाला जेल से

डॉ रत्नदीप ने बताया कि हथकडी से बन्धे हाथ के साथ करीब डेढ दिन तक वे जेल में बन्द रहे। इस दौरान वे कुछ भी सोचने समझने में असमर्थ थे। वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि उनका क्या होगा? करीब डेढ दिन तक इसी हालत में वक्त गुजारने के बाद अचानक उनके लिए अच्छी खबर आई। भारतीय दूतावास के एक अधिकारी ने वहां पंहुचकर उन सभी को छुडवाया और उन्हे बताया कि इरान के अधिकारियों ने सभी का वैरिफिकेशन कर लिया है और अब सभी आजाद है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात

जेल के छुडवाने के बाद दूतावास के अधिकारी सभी लोगों को एक शानदार होटल में लेकर गए और उन्हे वहां रुकवाया गया। करीब दो दिन तक वे सभी उसी होटल में आराम करते रहे। फिर उन्हे भारतीय दूतावास ले जाया गया। दूतावास पंहुचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर स्वयं वहां मौजूद थे। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सभी से संक्षिप्त मुलाकात की और उनके हालचाल पूछे। 

डॉ रत्नदीप ने बताया कि विदेश मंत्री से मुलाकात के बाद सभी लोगों को फ्लाइट से दुबई ले जाया गया,जहां उनका मैडिकल चैकअप करवाया गया। इरानी अधिकारियों द्वारा पकडे गए सभी भारतीय पूरी तरह सुरक्षित थे और किसी को भी कोई गंभीर क्षति नहीं पंहुची थी। दुबई में मेडीकल होने के बाद इन सभी लोगों को फ्लाइट से ही वापस लाकर उनके जहाज गैस फेट पर पंहुचा दिया गया।

डेढ महीना यूएई की टैरेटरी में

डॉ रत्नदीप ने बताया कि भारतीय नागरिकोंं को गलतफहमी के चलते पकडे जाने की घटना के बाद में विदेश मंत्रालय ने उन्हे वहां रखना सुरक्षित ना समझते हुए उनके जहाज को वहां से यूएई के अधिकार क्षेत्र वाले समुद्र में पंहुचने को कहा। यूएइ के समुद्र में पंहुचने के बाद डॉ रत्नदीप और उनके साथी अपने जहाज के साथ करीब डेढ महीने तक वहीं खडे रहे।

गैस लेकर लौटे भारत

जिस वक्त डॉ रत्नदीप अपने जहाज गैस फेट पर यूएई के समुद्र में थे,उस वक्त भारत सरकार की इरान सरकार के साथ लगातार चर्चाएं चल रही थी। करीब डेढ महीने के बाद इरान की सरकार ने भारत और चीन,इन दो देशों को होर्मुज में जाने की अनुमति प्रदान कर दी। होर्मुज में जाने की अनुमति मिलने के बाद डॉ रत्नदीप के जहाज गैस फेट को भारतीय नौसेना की सुरक्षा में होर्मुज के रास्ते इरान के बंदर इमाम खौमेनी पोर्ट पर ले जाया गया। इस दौरान इरानी नौसेना ने भी उनके जहाज को सुरक्षा प्रदान की।

बंदर इमाम खौमेनी पोर्ट पर गैस फेट जहाज में गैस लोड की गई। तीन दिनों तक लोडिंग होने के बाद फिर से भारतीय और इरानी नौसेना की सुरक्षा में होर्मुज से होते हुए डॉ रत्नदीप का जहाज भारत के रास्ते पर चल पडा। डॉ रत्नदीप ने बताया कि इरान के बंदर इमाम खौमेनी पोर्ट का निर्माण भारत की मदद से किया गया है,इसलिए इस पोर्ट पर किसी भी देश ने कोई हमला नहीं किया था और यह पोर्ट पूरी तरह सुरक्षित था।

रास्ते में मिले जले हुए जहाज और ध्वस्त बंदरगाह

डॉ रत्नदीप ने बताया कि  जिस समय उनकी जहाज होर्मुज जलडमरू मध्य से हाते हुए वापस लौट रहा था,रास्ते में उन्हे कई बुरी तरह जले हुए जहाज नजर आए। युद्ध शुरु होने के वक्त वे जिस आसुलिया पोर्ट पर मौजूद थे,वह आसुलिया पोर्ट इजराइल और अमेरिका के हमलों में पूरी तरह बरबाद हो चुका था। वापसी के रास्ते में उन्हे आसुलिया पोर्ट की बरबादी के मंजर भी नजर आए। उन्हे लगा कि वे भाग्यशाली है कि वे भारत के नागरिक है और इसीलिए सुरक्षित है। अगर उनका जहाज आसुलिया पोर्ट पर ही रहा होता तो उनकी मौत तय थी।

आखिरकार सुरक्षित पंहुचे घर

डॉ रत्नदीप ने बताया कि अपने जहाज गैस फेट पर गैस लोड करने के बाद जब वे होर्मुज पार कर रहे थे उस वक्त भी आसमान में कई मिसाइले इधर से उधर जाती हुई नजर आ रही थी। डॉ रत्नदीप ने बताया कि लगभग छ: महीने तक चले इस पूरे घटनाक्रम के दौरान उनके साथ हुआ घटनाओं की जानकारी तक वे अपने घर पर नहीं दे पा रहे थे। उन्हे पता था कि अगर घर के लोगों को इन खतरनाक स्थितियों के बारे में बताएंगे तो घर के लोगों की चिंता  और बढ जाएगी। आखिरकार 13 अप्रैल को भारत के सिक्का पोर्ट पर उनका जहाज सहा सलामत पंहुच गया और वे सिक्का पोर्ट से निकलकर रतलाम के लिए रवाना हो गए।

अब भी जारी है काउंसिलिंग

डॉ रत्नदीप ने बताया कि अत्यन्त खतरनाक परिस्थितियों में करीब छ: महीने गुजार कर घर पंहुचे,उनके जहाज के तमाम साथियों के लिए ये घटनाक्रम बहुत ही पीडादायक था और इसका ट्रामा लम्बे समय तक बना रह सकता है। इसी के चलते जहाजरानी मंत्रालय के निर्देशानुसार सभी की काउंसिलिंग करवाइ जाती है। इस समय तक सभी की काउंसिंलिंग जारी है। उनके सभी साथी धीरे धीरे सामान्य हो रहे हैैं।