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Raag Ratlami Vote Chori: रतलाम तक आ पंहुची वोट चोरी की फर्जी कहानी,नतीजा वही "ढाक के तीन पात"

 

 

-तुषार कोठारी

रतलाम। अब तक रतलाम के लोग भी देश के दूसरे शहरों के लोगों की तरह बुद्धु बक्से पर वोट चोरी की फर्जी कहानियां देख सुन रहे थे। दिल्ली के जन्तर मन्तर और सुप्रीम कोर्ट जैसी जगहों पर कभी तिलचïट्टों और कभी पंजा पार्टी के पप्पू युवराज और उनके पिछलग्गू वोट चोरी की फर्जी कहानियां गढ गढ कर हो हल्ला मचाने की कोशिशें कर रहे थे और रतलाम समेत देश भर के लोग बुद्धु बक्से पर ये देख देख कर हैरान हो रहे थे कि आखिर वोटों की ये चोरी हुई किस जगह पर है?

रतलाम में तो बेचारे पंजा पार्टी के नेता भी आपसी बातचीत में कबूल करते रहे हैैं कि शहर या जिले में किसी वोटर का वोट चोरी नहीं हुआ है। अगर हुआ होता,तो इतने हंगामें के बाद वो वोटर सामने तो आ ही जाता। सबके सामने आकर बताता कि मेरा वोट चोरी हो गया है। लेकिन अब तक यहां एक भी वोटर सामने नहीं आया है। यही हाल कमोबेश पूरे प्रदेश और देश का है। पंजा पार्टी के पप्पू युवराज जिस एसआईआर के जरिये वोट चोरी किए जाने की बात कह रहे हैैं वह एसआईआर तो हमारे सूबे में भी हो चुका है,लेकिन पूरे सूबे में कहीं ऐसा कोई वोटर अब तक सामने नहीं आया है जिसकी वोट चोरी हुआ हो।

शायद यही वजह है कि दिल्ली में महीनों तक वोट चोरी का हो हल्ला मचाते रहने और बुद्धू बक्से पर रोजाना इसकी खबरें आने के बावजूद लोगों पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। सीधी सी बात है जिसका वोट चोरी नहीं हुआ उसे इससे कोई लेना देना नहीं है और वोट चोरी हो चुका वोटर कहीं मौजूद ही नहीं है। ऐसी हालत में वोट चोरी के मुद्दे पर लोग खबरें देखते है,मुस्कुराते है और अपने दूसरे काम में लग जाते है। लोगों को यह भी पता है कि कुछ महीनों पहले पंजा पार्टी के पप्पू युवराज इवीएम को लेकर रोना रोया करते थे। लेकिन उस रोने धोने का भी लोगों पर कोई असर नहीं हो रहा था। इसी तरह अब वोट चोरी से भी लोगों का कोई लेना देना नहीं है।

लेकिन पप्पू युवराज इसे मानने को तैयार नहीं है। उन्हे लगा कि अगर बुद्धु बक्से की खबरें लोगों पर असर नहीं डाल पा रही है,तो अब लोगों पर असर डालने के लिए पंजा पार्टी के तमाम नेताओं को गांव गांव शहर शहर भेज कर वोट चोरी की फर्जी कहानियां सुनवाई जाए। इसी के चलते पंजा पार्टी की ओर से बुद्धु बक्से की बहस में हिस्सा लेने वाले सरदार जी को रतलाम भेजा गया। दूसरे शहरों में भी इसी तरह अलग अलग नेताओं को भेजा गया ताकि वे उन जगहों के खबरचियों को इकट्ठा करके वही कहानी फिर से सुनाए कि देश के साढे तेरह करोड वोटरों के वोट चोरी हो गए हैैं।

पंजा पार्टी के सरदार जी पप्पू युवराज का फरमान लेकर रतलाम पंहुचे। खबरचियों को इकट्ठा किया और वही कहानी फिर से दोहरा दी,जिसे महीनों से रोज दोहराया जा रहा है। खबरचियों ने भी कहानी सुनी। रस्म अदायगी के तौर पर सवाल भी पूछे,सरदार जी ने उसी तरह जवाब दिए जैसे वे टीवी की बहसों में देते है। चाय पानी हुआ और सरदार जी अगले शहर के लिए रवाना हो गए।

बहरहाल अब सवाल ये पूछा जा रहा है कि पिछले दो चार महीनों से पप्पू युवराज रोजाना यही फर्जी कहानी दोहरा रहे हैैं तो अब इसे दोहराने के लिए शहर शहर नेताओं को भेजने से भी क्या ही होगा? कुछेक लोगों को उम्मीद थी कि शायद ऐसे दो चार वोटरों को खबरचियों के सामने पेश किया जाएगा जिनके वोट चोरी कर लिए गए हैैं। लेकिन ऐसा कुछ तो हुआ नहीं। कुल मिलाकर इस कवायद का भी वही हश्र हुआ जो पप्पू युवराज की कवायदों का हो रहा है। नतीजा वही ढाक के तीन पात। लोगों पर कोई असर नहीं।  

58 दिन का अल्टीमेटम

चांदनी चौक को बाजना बस स्टैण्ड चौराहे से जोडने वाली सडक़ को ना जाने कभी से फोरलेन वाली सडक़ बन जाना चाहिए था। लेकिन शहर सरकार के तौर तरीके,शहर के लोग जानते है। सडक़ खुद गई। लोग इंतजार करते रहे कि आज नहीं तो कल शहर सरकार के जिम्मेदारों को इस सडक़ की याद आएगी और फिर इसका काम शुरु हो जाएगा। दिन गुजरे हफ्ते गुजरे और फिर महीनों गुजर गए। आखिरकार लोगों के सब्र का बान्ध टूट ही गया। सडक़ किनारे रहने वाले तमाम लोग खुदी हुई सडक़ पर आकर बैठ गए। जब लोग सडक़ों पर आ गए,तो शहर सरकार के मुखिया और बडे साहब दोनो पंहुचे। जब दोनो पंहुचे,तो इस राज का पर्दाफाश हुआ कि शहर सरकार के मुखिया की कोई सुनता नहीं है। पहले तो वे ऐसा बोल गए,फिर जब उन्हे लगा कि गलती हो गई है,तो उन्होने जैसे तैसे इसे रफू करने की कोशिशें शुरु कर दी। फिर मामले को सम्हालने के लिए 58 दिनों का अल्टीमेटम जारी कर दिया गया। 58 दिनों में से भी चार पांच दिन गुजर चुके हैैं। लोग अब 58 दिन पूरे होने का इंतजार कर रहे हैैं। हांलाकि इतनी उठापटक हुई फिर भी,अब भी कोई यह भरोसे से नहीं कह सकता कि 58 दिनों में सबकुछ हो ही जाएगा क्योकि ये शहर सरकार है और इसके तौर तरीके अलग है।
 

जमाई का जलवा,ससुरे का जलाल और शो रुम का शोर

बीते कुछ दिनों से रतलाम में इन बातों की जमकर चर्चा हो रही है। "जमाई का जलवा","ससुरे का जलाल" और "शो रुम का शोर"। हांलाकि कोई भी खुलकर कुछ नहीं बोल पा रहा है,क्योंकि मामला बडे नेताओं और बडे लोगों का है। बडे लोग चाहे जो करे। आम लोग उस पर सवाल नहीं उठा सकते। भले ही सडक़ें जाम कर दी जाए। लोगों के व्यापार धन्धे दिन भर के लिए ठप्प हो जाए। शहर में लगे बिजली के तमाम खंबे अभी तक इस बोझ से कराह रहे हैैं,लेकिन मजाल है कि शहर सरकार के जिम्मेदार इसे देख भी ले। और कोई होता तो शहर सरकार इन्ही खंबों से मोटी कमाई कर चुकी होती। जो भी हो, भले ही कोई खुलकर ना बोल रहा हो,लेकिन बातें हर कोई कर रहा है और इसी तरह की बातें आगे जाकर सियासत पर असर भी डालती है।