Raag Ratlami Sacrifice : यूपी के बाबा और बंगाल के दादा में है दमखम लेकिन डरी हुई है एमपी सरकार / पंजा पार्टी में जारी है सिर फुटौव्वल
-तुषार कोठारी
रतलाम। दो तीन दिन बाद कुर्बानी वाला त्यौहार आ रहा है। पहले के जमाने में कुर्बानी वाले त्यौहार का ढंग बिलकुल अलग हुआ करता था,लेकिन अब इसके तौर तरीके बदलते जा रहे है। यूपी के बाबा और बंगाल के दादा ने साफ साफ एलान कर दिया है कि कुर्बानी के त्यौहार पर सडक़ें बाधित नहीं होने दी जाएगी। बाबा और दादा के एलान के बाद जालीदार गोल टोपी वालो के बडे लोगों ने भी सडक़ों को बाधित नहीं करने की अपीलें जारी कर दी है। लेकिन मध्यप्रदेश में इस तरह की कोई खबर देखने सुनने को नहीं मिली है। इससे यही अंदाजा लगाया जा रहा है कि यहां की सरकार में सडक़ों को बाधित होने से रोकने की हिम्मत नहीं है।
वैसे तो सूबे में जब नए मुखिया बने थे,तो उन्होने पहला फरमान ही लाउड स्पीकरों पर रोक लगाने का किया था। सूबे के लोगों को लगा था कि उज्जैनी भैया भी बाबा के नक्शेकदम पर चलना चाहते है। लोगों को इससे बडी खुशी भी हुई थी,लेकिन वक्त गुजरने के साथ उज्जैनी भैया की तवज्जो कहीं ओर होने लगी और लाउड स्पीकरों पर रोक वाला फरमान पूरी तरह बेअसर हो गया। लोगों ने याद दिलाने की कोशिश भी की,लेकिन चूंकि उज्जैनी भैया की तवज्जोह दूसरी चीजों की तरफ हो गई थी,इसलिए उन्होने अपने ही फरमान के बेअसर हो जाने पर भी कोई कदम नहीं उठाया।
अब मामला कुर्बानी वाले त्यौहार का है। पहले जब पंजा पार्टी की सरकारें होती थी,तो यह त्यौहार सडक़ों को रोक कर ही मनाया जाता था। इतना ही नहीं इंतजामिया के अफसरों को भी वहां जाकर टोपी वालों को गले लगाकर उन्हे मुबारकबाद भी देना पडती थी। जिला इंतजामिया के बडे साहब और वर्दी वालों के कप्तान दोनो ही अपनी इस ड्यूटी को बखूबी अंजाम दिया करते थे। हांलाकि मुबारकबाद देना उनकी ड्यूटी में नहीं आता था लेकिन पंजा पार्टी वाले नेताओं के हुक्म को पूरा करना उनके लिए जरुरी होता था,इसलिए अफसर बिना हील हुज्जत मुबारकबाद देने की ड्यूटी किया करते थे।
सूबे में फूल छाप पार्टी की सरकार आने के कुछ सालों बाद तक भी ये सिलसिला चलता रहा,लेकिन बाद में अफसरों की समझ में आया कि ये काम उनकी ड्यूटी का हिस्सा नहीं है। तब जाकर ये सिलसिला रुक गया। लेकिन सडक़ पर त्यौहार मनाने का सिलसिला बदस्तूर अब भी जारी है। त्यौहार के दिन सुबह से सडक़ें जाम कर दी जाती है और लोग घण्टों तक परेशान होते रहते है। अफसरों को लगता है कि कुर्बानी का त्यौहार मनाने वालों को सडक़ें जाम करने का अधिकार मिला हुआ है।
अब यूपी के बाबा और बंगाल के दादा ने सडक़ पर होने वाले त्यौहार पर रोक लगा दी है। यूपी और बंगाल दोनो ही सूबों के बडी बडी दाढी वाले मौलानाओं ने भी इसे मान लिया है और ना सिर्फ मान लिया है बल्कि अपनी कौम से अपीलें भी की है,कि वे सडक़ों पर त्यौहार ना मनाए। कुर्बानी वाला त्यौहार तय की गई जगह पर ही मनाया जाए और अगर जगह कम पडती हो तो त्यौहार को शिफ्ट में मना लिया जाए,लेकिन सडक़ों को किसी भी हालत में जाम ना किया जाए।
यूपी और बंगाल की खबरें सामने आने के बाद अब मध्यप्रदेश में इस बारे में चर्चाएं हो रही है। लोग पूछ रहे है कि मध्यप्रदेश की सरकार को सडक़ें जाम होने से कोई फर्क पडता है या नही? सरकार सम्हालते ही लाउड स्पीकरों पर रोक लगाने का फरमान जारी करने वाले उज्जैनी भैया का जोशोखरोश अब कहां चला गया? लाउड स्पीकर ही बन्द नहीं हो पाए तो वे सडक़ों को जाम होने से कैसे रोक पाएंगे? एमपी सरकार डरी हुई नजर आने लगी है। यूपी और बंगाल के दमखम के सामने एमपी का डर साफ नजर आता है।
पंजा पार्टी की सिर फुटौव्वल
कहावत है सूत ना कपास जुलाहो में लट्ठम लट्ठा। पंजा पार्टी की हालत कुछ इसी तरह की है। लगातार मिल रही नाकामयाबियों के बाद भी पंजा पार्टी के बचे खुचे नेताओं की आपसी कलह खत्म होने का नाम नहीं ले रही। ताजा वाकया तीन चार दिन पहले का है। पंजा पार्टी की शहर और जिला इकाइयो ने पार्टी को मजबूत करने और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने की तैयारियों के लिए जावरा में समन्वय बैठक रख ली। पार्टी के सही तरीके से चलाने के लिए उपर वालों ने जिले और शहर के लिए अलग अलग प्रभारी नियुक्त किए है। नेताओं को निर्देश है कि वे अपने कार्यक्रम करने से पहले अपने प्रभारियों से इस बारे में चर्चा करें और प्रभारी की सहमति से ही कोई निर्णय करें।
लेकिन पंजा पार्टी में निर्देशों को मानने की कोई परिपाटी नहीं है। जावरा में जिस दिन समन्वय बैठक रखी गई उसी दिन सुबह सवेरे शहर प्रभारी बनाए गए इन्दौरी नेता जी को बैठक की खबर पंहुचाई गई। इस बात से शहर प्रभारी का नाराज होना स्वाभाविक ही थी। शहर प्रभारी ने शहर के नेताओं से पूछा कि बिना प्रभारी की सहमति के बैठक क्यो रखी गई? इतना ही नहीं शहर प्रभारी ने इस बैठक में आने से ही इंकार कर दिया। कहा तो ये भी जा रहा है कि लगातार की जा रही उपेक्षा के चलते शहर प्रभारी ने अपने पद से इस्तीफा देने का भी मन बना लिया है।
अब सवाल ये पूछा जा रहा है कि शहर प्रभारी की नाराजगी और इस्तीफा,रतलामी नेताओं की सेहत पर कोई असर डालेगा या नहीं? वैसे पंजा पार्टी के नेता अपने अपने गाड फादर के भरोसे रहते है इसलिए उन्हे किसी प्रभारी की नाराजगी का कोई असर नहीं पडता।
धरने ने खोली पोल
कुछ सालों पहले वर्दी वालों के पूरे महकमे के मंत्री रहे फूल छाप वाले सेठ को वर्दी वालों के दफ्तर में ही धरना देना पड गया। सेठ के धरने ने ना सिर्फ वर्दी वाले महकमे में चल रही ढील पोल उजागर की बल्कि फूल छाप पार्टी में चल रही गडबडियों को भी सतह पर ला दिया। सेठ के धरने पर बैठते ही वर्दी वालों के कप्तान उनके पास पंहुच गए और किसी तरह मान मनौव्वल करके उन्हे मना लिया। सेठ जिस समस्या को लेकर पंहुचे थे,उसे भी सुलझा लिया गया। लेकिन धरने की इस घटना ने यह साफ कर दिया कि वर्दी वाले महकमे में सामान्य लोगों की सुनवाई होने के मौके बहुत ही कम है। फूल छाप वालों के लिए भी सेठ का धरना एक संकेत था कि अगर सरकारी महकमों में ठीक से काम नहीं हो रहे है,तो इसका बुरा असर आखरी में फूल छाप की सरकार पर ही पडेगा। अब तक फूल छाप पार्टी के तीन तीन नेताओं के धरने की खबरें बन चुकी है। इससे साफ जाहिर है कि सूबे में अफसरशाही हावी हो रही है और फूल छाप पार्टी के नेता बे असर है।