Raag Ratlami Qurbani : कुर्बानी का त्यौहार निकला,पंजा पार्टी ने नहीं दी मुबारकबाद / जगह जगह जारी है पानी का गोरखधंधा
-तुषार कोठारी
रतलाम। जालीदार गोल टोपी वालो का कुर्बानी वाला त्यौहार आकर गुजर गया। त्यौहार कब आया और कब चला गया पता ही नहीं चला। कोई जमाना था,जब ऐसे त्यौहारों के आने के हफ्तों पहले से तैयारियां शुरु हो जाती थी और इन तैयारियों की खबरें अखबारों में छाई रहती थी। लेकिन बदलते वक्त के साथ अब सबकुछ बदलने लगा है।
बदलाव तो हो रहा है,लेकिन बदलाव इतना बडा होगा,इसकी उम्मीद कोई नहीं कर सकता था। पहले जब पंजा पार्टी की सरकारें हुआ करती थी,तो उन दिनों में कुर्बानी वाली ईद हो या मीठी ईद,हफ्तों पहले से तैयारियां शुरु हो जाती थी। जिला इंतजामिया के अफसरों और वर्दी वालों के कप्तान से लगाकर बडे बडे मंत्री संत्री तक इन तैयारियों में लग जाते थे। फिर जब ईदगाह पर नमाज वाला दिन आता था,तो तमाम अफसर और नेता वहां मुबारकबाद देने के लिए मौजूद हुआ करते थे।
लेकिन फूल छाप वालों के राज में अब अफसर वहां केवल इंतजामों के लिए मौजूद रहते है। पहले जिला इंतजामिया के सबसे बडे अफसर और वर्दी वालों के कप्तान को वहां मौजूद रहने के फरमान जारी होते थे,ताकि वे नमाजियों को गले मिलकर मुबारकबाद दे सके,लेकिन अब बडे अफसर मौजूद नहीं रहते। जो अफसर मौजूद होते है वे भी महज इंतजामों पर नजर रखने के लिए मौजूद रहते है।
लेकिन नमाजियों को इससे कोई खास फर्क नहीं पडता। उन्हे फर्क पडता है पंजा पार्टी वालों के रवैये से। पंजा पार्टी को शुरु से ही वे अपनी पार्टी समझते आए है। चुनावों के दौरान पंजा पार्टी को भर भर कर वोट भी देते रहे हैैं। पंजा पार्टी के दिल्ली से लेकर लोकल तक तमाम नेता भी पंजा पार्टी को उन्ही की पार्टी बताते है। ऐसे में अगर पंजा पार्टी के नेता ही मुबारकबाद देने के लिए मौजूद ना हो तो दर्द तो होगा ही।
इस बार यही हुआ। पंजा पार्टी के नेता मुबारकबाद ही देना भूल गए। ईदगाह पर ईद की नमाज अदा किए जाने के बाद जब नमाजी बाहर आए तो उन्हे उम्मीद थी कि पंजा पार्टी के नेता मुबारकबाद देने के लिए मौजूद होंगे लेकिन उन्हे तब धक्का लगा जब वहां कोई नजर नहीं आया।
कहने सुनने को ये बात छोटी लग सकती है,लेकिन इससे कई बडे सवाल खडे हो गए है। आज के हालात में पंजा पार्टी को जितने भी वोट मिलते है,इसी कौम के मिलते है। इसके बावजूद अगर पंजा पार्टी के नेता सबसे बडे त्यौहार पर उन्हे मुबारकबाद देना भूल रहे हैैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि पंजा पार्टी वालों को लगता है कि पंजा पार्टी को वोट देना इनकी मजबूरी है। ये पंजा पार्टी को वोट नहीं देंगे तो किसे देंगे। इसी सोच के चलते वे इनकी तरफ से लापरवाह हो गए है। नेताओं को मालूम है कि जालीदार गोल टोपी वाले फूल छाप को तो वोट दे नहीं सकते। मजबूरन उन्हे पंजा पार्टी के ही पाले में रहना है। इसलिए अगर पंजा पार्टी वाले उनका ज्यादा ध्यान नहीं भी रखेंगे तब भी वोट तो पंजा पार्टी को ही मिलेंगे।
दूसरी तरफ जालीदार गोल टोपी वालों में इस बात की बडी चर्चा है। उन्हे भी मालूम है कि फूल छाप वाले तो आज तक कभी मुबारकबाद देने नहीं आए है। लेकिन अब तो पंजा पार्टी वाले भी फूल छाप वालों की राह पर चल निकले है। ऐसे में कहीं ये लोग पंजा पार्टी को छोडकर कोई नया रास्ता ना ढूंढने लग जाए। अगर ऐसा हो गया तो पंजा पार्टी का क्या होगा? ये बडा सवाल है।
जगह जगह पानी का गोरखधन्धा
हफ्ते के आखरी दिन फूड सेफ्टी वालों ने शहर की एक कालोनी में पानी पैक करने वाली एक यूनिट पर छापामारी की और वहां के नमूने जब्त किए। यहां पैक की जा रही पानी की बाटलों पर ना तो पैकजिंग की तारीख दर्ज थी ना एक्स्पायरी डेट दर्ज थी। पानी की क्वालिटी का भी कोई भरोसा नहीं था और इतना ही नहीं यहां की व्यवस्थाएं भी मानक स्तर की नहीं थी। फूड सेफ्टी वालों ने शायद पहली बार ही ऐसी कोई कार्रवाई की होगी।
लेकिन पानी का गोरखधन्धा बहुत बडे पैमाने पर चल रहा है। किसी जमाने में लोग गर्मी के मौसम में प्याऊ लगाया करते थे,ताकि लोगों को पेयजल उपलब्ध करवा कर थोडा पुण्य अर्जित किया जा सके। लेकिन ज्यादा से ज्यादा कमाई करने के लालच से परोपकार की इस भावना को कहीं गायब कर दिया है और इसकी जगह अब कमाई करने के नए नए तरीके खोजे जा रहे हैैं।
पानी इसका बहुत बडा माध्यम बन गया है। जिले के छोटे से छोटे गांवों में भी अब प्याऊ नहीं मिलती बल्कि हर छोटी बडी दुकान पर पानी की बाटले बिकती है। पानी की बाटलों के धन्धे में बडा गोलमाल है। पानी की बाटलों की नामचीन कम्पनियों के नाम पर सैकडों नकली पानी की बाटलें गांव गांव में बेची जा रही है। बिस्लरी और किनले जैसी बडी कम्पनियों से मिलते जुलते नामों की सैकडों नकली कम्पनियां बाटलों में पानी भर भर कर बेच रही है। बिस्लरी के नाम पर -बिलसेरी-जैसे मिलते जुलते नाम लिखे होते है। खरीददार बाटल को बिस्लरी की समझ कर ही खरीदता है। हाईवे पर लगी दुकानों और गांव गांव में मौजूद दुकानों में शायद ही कहीं वास्तविक कम्पनी की बाटल मिलेगी। हर जगह नकली कम्पनी की बाटलें ही बिक रही है। जब कम्पनी ही नकली है,तो उसकी गुणवत्ता क्या होगी इसका अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है।
ये गोरखधन्धा हर कहीं खुलेआम चल रहा है। लेकिन आज तक किसी सरकारी महकमे ने इस पर अपनी नजरें नहीं लगाई है। जाहिर है यह गोरखधन्धा चलाने वाले इस गोरखधन्धे से मोटी कमाई कर रहे है और इस मोटी कमाई का एक बडा हिस्सा उन जिम्मेदार महकमों तक भी पंहुचता है,जिन पर इस गोरखधन्धे को रोकने की जिम्मेदारी है।