Raag Ratlami Fake Shrines : सरकारी जमीनों पर नकली मजारें,उर्स की आड में कमाई का खेल,चीखते भोंगले और डरे हुए अफसर
-तुषार कोठारी
रतलाम। बेशकीमती सरकारी जमीनों को हडपने का सबसे आसान रास्ता है कि उस जमीन पर एक छोटी सी नकली मजार बना दो। कुछ वक्त गुजरने के साथ मजार को फैलाते हुए मकबरा बना दो फिर किसी नकली बाबा के नाम का उर्स मनाओं और जमकर कमाओ। सरकार भले ही जोर शोर से सरकारी जमीनों पर बनी नकली मजारों और मस्जिदों पर रोजाना पांच वक्त चीखते हुए भोंगलों को हटाने के हुक्मनामे जारी करती रहे,डरे हुए अफसर इन हुक्मनामों पर अमल करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते।
कभी कभार कोई मसला इस तरह का खडा हो जाता है कि लोगों की शिकायतों के चलते डरे सहमे अफसरों को भी कार्रवाई करने की हिम्मत दिखानी पड जाती है। सैलाना रोड पर बंजली के पास ऐसी ही एक नकली मजार पर होने वाला उर्स बीते दिनों रद्द कर दिया गया। मामले की शुरुआत नकली मजार पर होने वाले उर्स को रोकने की शिकायत से हुई थी।
नकली मजार पर उर्स होने वाला था,उर्स में कव्वाली का मुकाबला भी होने वाला था। बीते कुछ सालों में ये छोटी सी नकली मजार अब फैलते फैलते बडा मकबरा बन चुकी है। मजार बनाने वाले की खुद की इमारत भी चार मंजिला हो गई है। मजार पर उर्स होता है,तो जमाने भर से चन्दा इकट्ठा करके लाखों रुपए जमा हो जाते है,जिसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं।
ऐसा नहीं कि सरकारी जमीन के इस अतिक्रमण की शिकायतें नहीं होती। कई बार शिकायतें हुई। कई बार खबरें भी छपी,लेकिन पटवारी से लेकर गिरदावर और तहसील के मुखिया तक कोई भी इस मामले में हाथ डालने को तैयार नहीं होता था। सभी को गोल टोपीवालों का डर लगा रहता था। हर बार की तरह इस बार भी उर्स की तैयारियां जोर पकडने लगी थी।
लेकिन इसी बीच धामनोद के एक युवा नेता ने सरकारी जमीन पर बिना अनुमति किए जा रहे उर्स के आयोजन को रोकने के लिए अफसरों को लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत की खबरें भी अखबारों में छप गई। शायद इसी हो हल्ले का असर था कि अफसरों ने उर्स का आयोजन करने वाले को बुलाकर समझा दिया कि बिना अनुमति के अगर आयोजन हुआ तो अफसरों को कार्यवाही करना पड जाएगी। नतीजा ये हुआ कि आयोजक ने आयोजन ही रद्द कर दिया।
लेकिन सवाल अब भी वही खडा है। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कैसे हुआ और अगर हो ही गया है तो उसे हटाया क्यो नहीं जा रहा है। कुछ सालों पहले जब ये नकली मजार बनी थी,तब महज दो फीट जगह घेरती थी,आज हजार फीट से ज्यादा जगह घेर चुकी है। जैसे जैसे मजार का आकार बढ रहा है,कमाई भी बढती जा रही है। मजेदार बात ये है कि जिस बाबा के नाम पर ये मजार बनी है,उस बाबा को जानता कोई नहीं। किसी को ये नहीं पता कि इस मजार के नीचे कुत्ता दफन है या बिल्ली या वो भी नहीं है।
अफसर इसी बात से खुश है कि शिकायत पर कार्यवाही नहीं करना पडी और आयोजन रद्द हो गया। लेकिन सरकार के उन हुक्मनामों का क्या,जिनमें तमाम सरकारी जमीनों पर नकली मजारें बना कर किए गए अतिक्रमण हटाने का हुक्म दिया गया है। मस्जिदों पर रोजना पांच बार चीखते भोंगलो को हटाने का भी हुक्म जारी है,लेकिन अफसरों के कानों में भोंगलो के चीखने की आवाज ही नहीं जाती।
मजारों का खेल भी कमाल का है। सबसे पहले दो या चार इंटों को हरे कपडे में लपेट कर रख दिया जाता है। एकाध हफ्ते इस पर नजर रखी जाती है। अगर इसे किसी ने हटाया नहीं तो फिर इन इंटों को चूने सीमेन्ट से पक्का करके मजार बनाकर हरा रंग पोत दिया जाता है और अगरबत्तियां जलाई जाने लगती है। महीने दो महीने गुजरने के बाद मजार को और बडा कर दिया जाता है। फिर दो चार महीने गुजरने के बाद मजार के चारों ओर दीवार बना दी जाती है। कुछ महीनों के बाद उस पर छत भी पड जाती है और इसी तरह धीरे धीरे उसका आकार बढता जाता है। अंधश्रद्धा में डूबे कुछ मूर्ख वहां जाकर मन्नतें भी मांगने लगते है। इसी तरह ये सिलसिला चल निकलता है।
शहर में इस तरह की कई नकली मजारे हैैं। बीतें दिनों जावरा की ओर जाने वाले रोड को जब फोरलेन बनाया जा रहा था,उस वक्त भी सडक़ किनारे बनी एक दरगाह का मसला सामने आया था। इस दरगाह की आड में एक बडी सी मस्जिद तान दी गई थी। गोल टोपीवालो के जबर्दस्त विरोध और दबाव के बाद रास्ता ये निकला था कि अवैध मस्जिद को हटा दिया गया और दरगाह को फोरलेन के बीच में रख कर दोनो तरफ से रोड निकाल दिया गया। शर्त ये थी कि अब दरगाह का आकार नहीं बढाया जाएगा। रोड बन गई,लेकिन शर्त धरी रह गई। ताजा हाल ये है कि दरगाह वालों ने फिर से सडक़ के बीच में मौजूद इस दरगाह को चौडा करना शुरु कर दिया है। पहले दरगाह के चारों ओर अस्थाई कनातें बांधी गई थी,अब कनातों की जगह पक्का निर्माण कर दिया गया है। छत हटा दी गई थी,छत फिर से बना दी गई है। सडक़ संकरी होती जा रही है और भारी आवागमन के चलते ये संकरी सडक़ ना जाने कब किसकी जान ले लेगी कोई नहीं जानता। दरगाह फैलती जा रही है,लेकिन जिम्मेदार जान बूझ कर आंखे मूंदे हुए बैठे है। कई नहीं जानता कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अफसरों का डर कब दूर होगा और कब वे इस तरह की हरकतों पर रोक लगाने की अपनी जिम्मेदारी को ढंग से निभाएंगे।
कब मिलेगा इंसाफ
टीचर की क्रूर पिटाई से जावरा की नन्ही बच्ची जीवन भर के लिए अपाहिज बन गई है। संवेदनाओं से शून्य वर्दी वालों ने क्रूर टीचर के खिलाफ मामूली सा केस बना कर अपना कत्त4व्य पूरा कर लिया। बच्ची का मजदूर पिता कहां तो अपनी बच्ची को पढा लिखा कर योग्य बनाने के सपने देख रहा था और अब वह बच्ची को इंसाफ दिलाने के लिए दर दर की ठोकरें खा रहा है।
सरकारें बेटी बचाओ बेटी पढाओ के नारे लगवाती है,लेकिन जब स्कूल में पढती बच्ची को स्कूल की ही टीचर जिन्दगी भर के लिए अपाहिज बना देती है,तो सारी व्यवस्था दोषी टीचर को बचाने में लग जाती है। दोषी टीचर पहले तो बच्ची के पिता से इलाज का खर्च देने का वादा करती है,लेकिन जब उसे पता चलता है कि उसकी हरकत से बच्ची हमेशा के लिए लाचार हो गई है,तो वह पूरे मामले को रफा दफा करने की कोशिशों में जुट जाती है। इंतजामिया की संवेदनहीनता तब नजर आती है,जब दोषी टीचर उसी स्कूल में शान से नौकरी करती है,जहां उसने इतना बडा काण्ड किया। शिक्षा देने वाले महकमे के अफसर,पिटाई से अपाहिज बनी बच्ची से मिलने तक की कोशिश नहीं करते। वैसे तो शिक्षा विभाग पढाई के बीच में स्कूल छोड देने वाले ड्रापआउट बच्चों की भारी चिन्ता करता है,लेकिन जिस मामले में टीचर की ही वजह से बच्ची की पढाई छूट गई हो,ऐसे गंभीर मामले में विभाग कोई कार्यवाही नहीं करता। जिला मुख्यालय पर बैठी जिले की मुखिया मैडम जी से लगाकर तमाम बडे अफसरों में से किसी का भी दिल अब तक उस बच्ची के लिए नहीं पसीजा है और इसी का नतीजा है कि बच्ची का बाप अब तक दर दर भटक रहा है।