राग रतलामी अनन्त चतुर्दशी : बरसों बाद पुराने स्वरुप में लौटेगा बप्पा की बिदाई का त्यौहार / पंजा पार्टी के युवराज को मुंह दिखाने नेता पंहुचे,छात्र थे नदारद
-तुषार कोठारी
रतलाम। कोई जमाना था जब लोगों को बप्पा की बिदाई वाले त्यौहार यानी अनन्त चतुर्दशी का इंतजार कई हफ्तों पहले से हुआ करता था। रतलाम शहर ही नहीं,आसपास के दर्जनों गांवों से महिला पुरुष और बच्चे अनन्त चौदस की झांकिया और अखाडों के करतब देखने के लिए रतलाम आया करते थे। रात को दोबत्ती क्षेत्र की तमाम दुकानों के ओटलों पर ग्र्रामीण लोग कब्जा करके झांकियों का इंतजार किया करते थे। आधी रात के बाद डेढ-दो बजे झांकियों का जुलूस दोबत्ती से प्रारंभ होता था,जो अगले दिन शाम तक चलता रहता था।
लेकिन बीते कुछ सालों से यह त्यौहार धीरे धीरे खत्म सा होने लगा था। पहले उद्योगों द्वारा झांकियां बनाई जाती थी। लेकिन उद्योग बन्द होने लगे और झांकियों की संख्या घटने लगी। फिर कुछ सामजिक संस्थाओँ और व्यायामशालाओं(अखाडों) ने ही झांकिया बनाने की जिम्मेदारी भी सम्हाल ली। लेकिन प्रशासन ने जुलूस के मार्ग को छोटा कर दिया। दोबत्ती से शुरु होने वाला चल समारोह पहले लोकेन्द्र टाकीज चौराहे से और आजकल शहर सराय से शुरु होने लगा था। झांकियां देखने के लिए आने वालों की संख्या भी घटने लगी थी।
लेकिन इस बार मामला अलग है। हिन्दू समाज ने अनन्त चतुर्दशी के पर्व को फिर से पुरानी सज धज के साथ मनाने का निर्णय किया है। त्यौहार को पुरानी आन बान और शान से मनाने के लिए इस बार झांकियों का जुलूस फिर से दोबत्ती चौराहे से प्रारंभ किया जाएगा। त्यौहार को और अधिक व्यवस्थित ढंग से मनाने के लिए स्वागत मंचों की व्यवस्था को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया गया है और पूरे झांकी मांर्ग में कुल बीस स्वागत मंच बनाने का निर्णय लिया गया है। ये स्वागत मंच भी एक दूसरे के पास ना होकर कम से कम पांच सौ मीटर की दूरी पर रहेंगे ताकि एक मंच दूसरे मंच की व्यवस्था में बाधक ना बन सके।
सभी झांकियों और अखाडों ने मिलकर तय किया है कि जुलूस के दौरान समय पालन का पूरा ध्यान रखा जाए ताकि जुलूस निर्धारित समय पर चले और सभी अखाडों को अपनी कला के प्रदर्शन का पूरा समय भी मिल सके। कुल मिलाकर इस बार बप्पा की बिदाई पहले की तरह धूम धाम से किए जाने की तैयारी जोरों पर है। आयोजकों में नया उत्साह है तो लोगों के उत्साह में भी वृद्धि साफ नजर आ रही है।
छात्रों की गूंज- नेता ही नेता,छात्र नदारद
पंजा पार्टी के युवराज इन्दौर आए,हजारों की भीड में उन्होने कामेडी शो भी किया। छात्रों की इस गूंज में रतलाम के कई सारे नेता मुंह दिखाई के लिए पंहुचे थे,लेकिन रतलाम का छात्र कोई भी नहीं पंहुचा।
कहने को तो रतलाम के भी हजार डेढ हजार छात्रों ने बारकोड स्कैन किया था,ताकि वे पंजा पार्टी के युवराज के कार्यक्रम के लिए रजिस्टर्ड हो सके। पंजा पार्टी के नेताओं ने भी दावे किए थे कि बडी तादाद में छात्र इन्दौर पंहुचेंगे। छात्रों को उम्मीद थी कि पंजा पार्टी छात्रों को इन्दौर ले जाने के लिए बस या अन्य वाहनों की व्यवस्था करेगी। लेकिन पंजा पार्टी का कोई भी नेता जेब में हाथ डालने को तैयार नहीं था। नतीजा ये हुआ कि वाहनों की कोई व्यवस्था नहीं हुई और कोई भी छात्र इन्दौर नहीं पंहुचा।
पंजा पार्टी के नेताओं ने छात्रों को ले जाने के लिए तो जेब में हाथ नहीं डाला,लेकिन तमाम नेता मुंह दिखाई करने खुद वहां पंहुच गए। रतलामी नेता, अपने बडे आकाओं के सामने खुद को मेहनती और पार्टी के लिए समर्पित दिखाना चाहते थे। इसी वजह से कई सारे तो एक दिन पहले ही इन्दौर में जाकर टिक गए थे। कुल मिलाकर रतलामी नेताओं ने अपनी अपनी झांकी तो कर ली,लेकिन छात्रों की गूंज में रतलामी छात्रों को जोडने में कामयाब नहीं हो पाए। शहर में भी कई स्थानों पर स्क्रीन लगाकर कार्यक्रम दिखाया गया,लेकिन यहां भी देखने वालों की तादाद उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली ही थी।
कोर्ट ने नही दिया स्टे,क्या अब हटेगी फर्जी मजार
सैलाना रोड पर बेशकीमती सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके बनाई गई फर्जी मजार के मुतवल्ली ने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि मजार को नहीं हटाने के लिए स्थाई निषेधाज्ञा प्रदान की जाए। अदालत ने सुनवाई में पाया कि मजार सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके बनाई गई है। अदालत ने स्टे आर्डर देने से साफ इंकार कर दिया।
फर्जी मजार का मामला इससे पहले तहसीलदार की अदालत में चल रहा था और तहसीलदार न्यायालय इसे अवैध अतिक्रमण करार दे ही चुका था। साथ ही इसे हटाने के आदेश भी जारी क दिए गए थे। अदालत में मामला जाने से हटाने की कार्रवाई कुछ दिनों के लिए रोक दी गई थी। लेकिन अब जब अदालत भी स्टे देने से इंकार कर चुकी है,तो अब सवाल ये है कि इस फर्जी मजार को कब हटाया जाएगा?
मजार का बिजनेस माडल भी गजब का रहा है। कुछ सालों पहले सरकारी जमीन पर एक छोटी सी मजार बनाई गई थी। धीरे धीरे इसका आकार फैलता गया और आज ये सरकारी जमान का काफी बडा हिस्सा हडप चुकी है। जमीन की कीमत भी करोडों रुपए की है। मजार का आकार बढने के साथ ही इसे बनाने वाले का मकान भी बढता ही गया और आज तीन मजिला इमारत बन चुकी है। मजार बनी तो उर्स भी मनने लगा और चढावा भी आने लगा। हांलाकि कोई ये नहीं जानता कि इसके नीचे क्या है? कुछ है भी या नहीं? लेकिन कमाई बदस्तूर जारी है। हर बार उर्स मनाया जाता था,लेकिन इस बार उर्स पर आपत्ति के चलते प्रशासन ने अनुमति नहीं दी और उर्स नहीं हो पाया। अब यही सवाल बाकी है कि मजार हटेगी या नहीं?