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 मकान धोखाधड़ी मामला: रतलाम के तत्कालीन रजिस्ट्रार प्रदीप निगम की अग्रिम जमानत याचिका कोर्ट ने की खारिज

 ​पद का दुरुपयोग कर आरोपियों से सांठगांठ करने और 1.90 करोड़ की जालसाजी का आरोप; कोर्ट ने माना गंभीर मामला
 
 

​रतलाम,19 मई (इ खबर टुडे)। रजिस्ट्री कार्यालय में पद का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपये के एग्रीमेंट को अवैध रूप से निरस्त करने और धोखाधड़ी के मामले में घिरे तत्कालीन उप-पंजीयक (रजिस्ट्रार) प्रदीप निगम को अदालत से बड़ा झटका लगा है। अष्टम अपर सत्र न्यायाधीश (रतलाम) निर्मल मंडोरिया की अदालत ने आरोपी प्रदीप निगम पिता वृंदावन निगम की अग्रिम जमानत याचिका को अपराध की गंभीरता को देखते हुए पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। आरोपी के खिलाफ थाना स्टेशन रोड, रतलाम में पद के दुरुपयोग और जालसाजी की गंभीर धाराओं में मामला दर्ज है।

​मामले के अनुसार, फरियादी सुभाष जैन और सह-आरोपी संजय जैन व मनोरमा जैन के बीच पूर्व में एक विवाद के बाद माननीय हाईकोर्ट खंडपीठ इंदौर के निर्देश पर 1,90,00,000/- (एक करोड़ नब्बे लाख रुपये) का आपसी समझौता हुआ था। इस राशि की गारंटी के तौर पर जैन कॉलोनी स्थित मकान नंबर 40 को फरियादी सुभाष जैन के पक्ष में अनुबंधित (एग्रीमेंट) किया गया था। शर्त थी कि भुगतान होने तक इस मकान को बेचा या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।

​आरोप है कि आरोपियों ने इस मकान पर बैंक ऑफ महाराष्ट्र से ₹1.10 करोड़ का लोन भी ले लिया और बाद में तत्कालीन रजिस्ट्रार प्रदीप निगम ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए, फरियादी सुभाष जैन की अनुपस्थिति में और नियमों को ताक पर रखकर, इस रजिस्टर्ड अनुबंध पत्र को एकपक्षीय रूप से निरस्त कर दिया। रजिस्ट्रार की इस मिलीभगत के कारण फरियादी को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ और वह मकान का मालिकाना हक पाने से वंचित रह गया।

​इन गंभीर धाराओं में दर्ज है मामला
​फरियादी की रिपोर्ट पर थाना स्टेशन रोड पुलिस ने तत्कालीन रजिस्ट्रार प्रदीप निगम व अन्य के खिलाफ अपराध क्रमांक 1023/24 के तहत धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान सुरक्षा की कूटरचना), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), और 471 (फर्जी दस्तावेज को असली के रूप में उपयोग करना) भा.दं.सं. (IPC) के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस मामले में जांच कर रही है और आरोपी की गिरफ्तारी शेष है।

​वृद्ध और शासकीय सेवक होने की दलील नहीं आई काम
​सुनवाई के दौरान आरोपी तत्कालीन रजिस्ट्रार के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल एक सेवानिवृत्त शासकीय सेवक और वृद्ध व्यक्ति हैं, उनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, इसलिए उन्हें धारा 482 बीएनएसएस (BNSS) के तहत अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाए।

​वहीं अभियोजन और फरियादी के वकील ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि जिम्मेदार पद पर रहते हुए आरोपी ने जानबूझकर इस गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम दिया है।

​अदालत की तल्ख टिप्पणी
​न्यायालय ने केस डायरी का अवलोकन करने के बाद मामले को बेहद गंभीर माना। अदालत ने आदेश में स्पष्ट किया कि:
​"आवेदक/अभियुक्त (तत्कालीन रजिस्ट्रार) के उक्त अपराध में आलिप्त होने के प्रथम दृष्टया (Prima Facie) प्रमाण अभिलेख पर मौजूद हैं। आरोपी का कृत्य गंभीर प्रकृति का है। शासकीय पद पर रहते हुए किए गए इस कृत्य को देखते हुए अग्रिम जमानत पर मुक्त किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता।"

​अदालत ने बिना किसी राहत के आरोपी प्रदीप निगम की अग्रिम जमानत याचिका (क्रमांक 283/2026) को सीधे निरस्त कर दिया।