ओडिशा का लापता युवक 12 साल बाद परिवार से मिला, मानसिक बीमारी के कारण भटकते-भटकते पहुंच गया था चेन्नई
भुवनेश्वर/चेन्नई,30 जून (इ खबर टुडे)। किसी भी परिवार के लिए 12 वर्षों का इंतजार बेहद लंबा होता है। इतना समय बीतने के बाद अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि उनका बिछड़ा हुआ अपना शायद अब कभी वापस नहीं लौटेगा। लेकिन ओडिशा के अंगुल जिले के हनादिहा गांव के रहने वाले 29 वर्षीय प्रवता नाइक की कहानी उम्मीद और इंसानियत की ऐसी मिसाल है, जिसने एक परिवार को 12 साल बाद फिर से मिला दिया।
प्रवता नाइक लगभग 17 वर्ष की उम्र में गंभीर मानसिक बीमारी के कारण घर से लापता हो गए थे। उनके परिजनों ने काफी तलाश की, लेकिन उनका कोई सुराग नहीं मिला। समय बीतने के साथ उनके माता-पिता का निधन हो गया और भाई-बहनों ने भी यह मान लिया कि प्रवता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
हकीकत इससे बिल्कुल अलग थी। प्रवता जीवित थे, लेकिन मानसिक बीमारी के चलते उन्हें अपना घर, परिवार और गांव तक याद नहीं था। वे तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई की सड़कों पर वर्षों तक भटकते रहे। इस दौरान उनके पास न रहने का ठिकाना था, न नियमित भोजन और न ही कोई इलाज।
28 मई 2025 को चेन्नई पुलिस की सूचना पर सामाजिक संस्था उदवुम करंगल (Udavum Karangal) के सोशल वर्कर मोहन ने उन्हें मदुरावायल इलाके से सुरक्षित रेस्क्यू किया। इसके बाद उन्हें संस्था के डिग्निटी होम में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें साफ-सुथरे कपड़े, पौष्टिक भोजन, चिकित्सा सुविधा और मानसिक स्वास्थ्य का उपचार उपलब्ध कराया गया।
डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों और सोशल वर्करों की टीम ने लगातार धैर्य के साथ उनका इलाज किया। शुरुआत में प्रवता को अपने परिवार या गांव के बारे में कुछ भी याद नहीं था, लेकिन उपचार के दौरान उनकी याददाश्त धीरे-धीरे लौटने लगी। तमिल, हिंदी और ओड़िया भाषाओं में बातचीत के दौरान उन्होंने अपने अतीत से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां दीं, जिनके आधार पर उनकी पहचान की प्रक्रिया शुरू हुई।
सोशल वर्करों ने ऑनलाइन खोजबीन कर ओडिशा के हनादिहा गांव का पता लगाया और वहां स्थित मां संतोषी मेडिसिन स्टोर से संपर्क किया। दुकान संचालक ने परिवार को पहचान लिया और तुरंत उनके रिश्तेदारों तक सूचना पहुंचाई।
यह खबर सुनकर परिवार भावुक हो उठा। प्रवता के छोटे भाई पबाना नाइक, जो पिछले एक वर्ष से चेन्नई में काम कर रहे थे, तीन अन्य रिश्तेदारों के साथ संस्था पहुंचे। करीब 12 साल बाद दोनों भाइयों की मुलाकात भावनात्मक पलों से भर गई। गले मिलते ही परिवार के सभी सदस्य खुशी के आंसू रोक नहीं पाए।
घर लौटने से पहले संस्था के संस्थापक-सचिव, जिन्हें सभी प्यार से 'पापाजी' कहते हैं, ने परिवार को एक महीने की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दवाएं उपलब्ध कराईं और सलाह दी कि प्रवता का इलाज बिना किसी रुकावट के जारी रखा जाए।
प्रवता नाइक की यह कहानी केवल एक लापता व्यक्ति के घर लौटने की नहीं, बल्कि मानसिक बीमारी से जूझ रहे हजारों लोगों के लिए उम्मीद का संदेश भी है। यह बताती है कि समय पर बचाव, संवेदनशील देखभाल, उचित इलाज और पुनर्वास के माध्यम से मानसिक रोगियों को सामान्य जीवन में वापस लाया जा सकता है। चेन्नई की सड़कों से ओडिशा स्थित अपने घर तक प्रवता की वापसी इस बात का प्रमाण है कि उम्मीद और प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाते।