सच सबके सामने,फिर भी साबित करने की मजबूरी
-तुषार कोठारी
सच सबके सामने हो लेकिन फिर भी इसे साबित करने की मजबूरी हो,तो ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है। धर्म के नाम पर देश का बंटवारा हो चुकने के बाद भी इश्वर अल्ला तेरो नाम के स्वप्नलोक में जीने वाले हमारे कल्पनाजीवी नेताओं ने देश को इसी तरह के रास्ते पर ले जाने की कोशिश की थी और इसी का नतीजा है कि खुली आंखों से नजर आने वाले सच को भी साबित करने की मजबूरी खडी कर दी जाती है।
मामला भोजशला का हो या राम जन्मभूमि का। देश के बहुसंख्यक समाज को आज भी अदालतों में जाकर उस सच के सबूत देने पड़ रहे हैैं,जो खुली आंखों से हर किसी को साफ नजर आते हैैं। मुस्लिम हठधर्मिता कम होने का नाम ही नहीं लेती। राम जन्मभूमि के प्रकरण में तमाम पुरातात्विक प्रमाण सामने आ चुके थे। पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञ निर्विवाद रुप से बता चुके थे कि मन्दिर को तोड कर ढांचा खडा किया गया है। लेकिन मुस्लिम हठधर्मिता देखिए कि आज भी इसे नकारा जा रहा है।
ठीक यही कहानी भोजशाला में सामने आई है। तमाम टीवी चैनलों के कैमरे भोजशाला के भीतर की दीवारों पर बनी दवï प्रतिमाएं दिखा रहे है। टीवी देखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को ये देव प्रतिमाएं स्पष्ट नजर भी आ रही है,लेकिन भोजशाला मामले में प्रतिवादी धार के शहर काजी को ये देव प्रतिमाएं नजर नहीं आ रही। धार के शहर काजी से लगाकर हैदराबाद वाले औवेसी जैसे तमाम मुसलमान मौलवी मौलानाओं को इस तरह के प्रमाण नजर नहीं आते।
काशी विश्वनाथ और मथुरा के कृष्ण जन्मस्थान पर भी ठीक यही स्थिति बनी हुई है। सबूत सारे लोगों को साफ नजर आते है,लेकिन अदालतों को इन्हे देखने समझने में बरसों लग जाते है। बरसों गुजरने के बाद अदालतें ये तय कर पाती है कि सबूत मन्दिर के ही हैैं।
ये मामला हिन्दी फिल्मों जैसा है। हिन्दी फिल्मों में अक्सर हीरो भेस बदलकर विलेन के अड्डे पर पंहुचता है और वहां नाच गाना करता है। मजेदार बात ये होती है कि सिनेमा हाल में बैठकर फिल्म देख रहे प्रत्येक दर्शक को पता होता है कि हीरो भेस बदलकर आया है,लेकिन केवल विलेन ही ऐसा होता है,जो हीरो को पहचान नहीं पाता। मन्दिरों को लेकर चल रहे मामलों में भी ऐसा ही हो रहा है। केस लडने वाले दोनो पक्षों को असलियत पता है। दूसरा पक्ष केवल हठधर्मिता के कारण केस लड रहा है। वह जानता है कि उसी के पूर्वïवर्तियों ने मन्दिर तोड कर मस्जिद बनाई थी,लेकिन वह आज भी अपनी उसी ठसक में रहना चाहता है। वह आज भी चाहता है कि वही मुगल काल लौट कर आ जाए जिसमें हिन्दुओं पर जजिया लगाया जाता था और उनके मन्दिर तोड कर मस्जिद बना दी जाती थी। तीसरा पक्ष जिसे फैसला देना है,उसे भी पता है कि मन्दिर तोड कर मस्जिद बनाई गई थी,ये साफ नजर भी आ रहा है,लेकिन वह चाहता है कि इसे फिर से साबित किया जाए।
लेकिन सच को बार बार साबित करने की मजबूरी का वक्त काफी लम्बा हो चुका है। भारत को अब ऐसे मामलों में नए सिरे से विचार करना होगा। देश के बहुसंख्यक समाज को प्रताडित अपमानित करने का दौर भी काफी लम्बा हो चुका है। कहीं ऐसा ना हो कि किसी दिन बहुसंख्यक समाज के सब्र का बान्ध टूट जाए और देश को किसी नए झंझावात का सामना करना पड जाए। देश के मुसलमानों को अपने पुराने रवैये को छोड कर प्रगतिशील रवैया अपनाने की जरुरत है। अगर मुस्लिम समुदाय ने स्वयं में बदलाव लाने की तैयारी नहीं की तो इतना तय है कि ये बदलाव समय स्वयं ले आएगा।