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 ना चाहते हुए भी राहूल के नक्शे कदम पर चल पडा है समूचा विपक्ष

 
 

-तुषार कोठारी

महाराष्ट्र के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा की एकतरफा जीत के बाद विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाओं ने एक बात साफ कर दी है कि राहूल गांधी सिर्फ कांग्र्रेस के ही सर्वोच्च नेता नहीं है,बल्कि वे अब समूचे विपक्ष के नेता बन चुके है। गैर कांग्र्रेसी विपक्षी पार्टियां चाहे राहूल को अपना नेता मानने को तैयार ना हो,लेकिन वे ना चाहते हुए भी राहूल गांधी के नक्शे कदम पर ही चलने लगे है।

2019 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद राहूल गांधी ने हार के लिए अपनी कमजोरियों को जिम्मेदार मानने की बजाय अन्य कारणों को जिम्मेदार बताने की शुरुआत की थी। वे यहीं नहीं रुके थे,बल्कि उन्होने चुनाव परिणामों के लिए मतदाताओं की समझ पर सवाल उठाने भी शुरु कर दिए थे। याद कीजिए 2019 की पराजय के बाद ही कांग्र्रेस ने इवीएम का मुद्दा जोर शोर से उठाना शुरु किया था। 

इससे पहले भारतीय राजनीति का दौर याद कीजिए,जब चुनाव हारने वाली पार्टी के नेता जनता जनार्दन के निर्णय को शिरोधार्य करते हुए मतदाताओं का आभार व्यक्त करते थे और ये कहा करते थे कि हम अपनी पराजय के कारणों का विश्लेषण करेंगे और अपनी गलतियों को ठीक करेंगे। लेकिन याद कीजिए कि 2019 के चुनावों में कांग्र्रेस की हार के बाद आपने कभी हारने वाले नेताओं की इस तरह की प्रतिक्रिया सुनी हो। कांग्र्रेस के प्रवक्ता इवीएम और वोट चोरी जैसे बहानों के साथ साथ मतदाताओं की समझ पर ही सवाल उठाने लगते है। वे कहते है कि मतदाताओं ने गलत निर्णय किया है या मतदाताओं को भ्रमित करके वोट हासिल किए गए है।

पराजित नेताओं द्वारा मतदाताओं की समझ पर सवाल उठाने और इवीएम या वोट चोरी जैसे बहाने सुनकर मतदाताओं में कांग्र्रेस के प्रति नाराजगी और बढती है। जिस मतदाता ने जीतने वाली पार्टी को वोट दिया होता है,उसे इस तरह के बयान सुनकर गुस्सा आता है। उसे लगता है कि कांग्र्रेस के नेता उसकी बुद्धिमत्ता पर सवाल उठा रहे है। नतीजा यह होता है कि वह कांग्र्रेस से और ज्यादा नाराज हो जाता है और अगले चुनाव में कांग्र्रेस को और अधिक नुकसान उठाना पडता है।

अन्य  विपक्षी दलों के नेता पहले इस मामले में कुछ अलग थे। वे हारने पर व्यवस्थाओं को दोष नहीं देते थे और ना ही मतदाताओं की समझ पर सवाल खडे करते थे। बल्कि लोकतंत्र की स्थापित मर्यादाओं के अनुरुप चुनाव हारने पर वे मतदाताओं को निर्णय को शिरोधार्य करने और आत्ममंथन करने के बयान देते थे। लेकिन बीते कुछ सालों में अन्य विपक्षी दलों के नेता भी ना चाहते हुए ही राहूल के नक्शेकदम पर चल पडे है। वे चुनाव हारने पर इवीएम,वोट चोरी,चुनाव आयोग आदि पर सवाल खडे करने लगे है।

हाल में महाराष्ट्र के नगरीय निकायों के चुनाव परिणामों पर शिवसेना यूबीटी के मुख्य रणनीतिकार संजय राउत यही कहते हुए सुनाई दिए कि चुनाव का नतीजा तो एक दिन पहले ही तय कर दिया गया था। राहूल गांधी तो मतदाताओं की उंगली पर लगाई जा रही स्याही को दोष दे ही रहे थे,संजय राउत भी उसी के सुर में सुर मिलाने लगे। उन्होने एक बार भी यह नहीं कहा कि पार्टी पराजय के कारणों का विश्लेषण करेगी। ना ही उन्होने मतदाताओं का आभार व्यक्त किया।

दूसरे नेताओं को भी देख लीजिए। बिहार चुनाव में पराजय के बाद तेजस्वी यादव और उनके प्रवक्ताओं ने हार के लिए मतदाताओं के मत के अलावा अन्य सभी कारणों को दोषी ठहराया। उन्होने इवीएम,वोट चोरी,चुनाव आयोग इन सभी को अपनी पराजय का जिम्मेदार बताया। आरजेडी के नेताओं के मुंह से एक बार भी यह सुनाई नहीं दिया कि वे अपनी पराजय का विश्लेषण करेंगे। इतना ही नहीं,कथित इण्डिया ब्लाक में राहूल के नेतृत्व को सिरे से खारिज करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी राहूल की राह पर ही चल पडी है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश की भी यही स्थिति है। वे भी चुनाव आयोग,एसआईआर,इवीएम जैसे मुद्दों का जिक्र करने में बिलकुल भी नहीं हिचकिचाते। वे भी पराजय के लिए मतदाताओं की समझ पर सवाल उठाने को ही सही मानते है।

उन्होने बंगाल में अभी में चुनाव आयोग को दोषी ठहराना शुरु कर दिया है। चुनाव आयोग द्वारा किए गए एसआइआर पर वे लगातार सवाल उठा रही है। प्रकारान्तर से वे भी वोट चोरी के मुद्दे को सामने ला रही है। इसके अलावा उन्होने इडी की कार्यवाहियों को भी चुनावी तैयारियों पर हमला बताना शुरु कर दिया है। 

राजनीति की थोडी सी समझ रखने वाला भी यह जानता है कि लोकतंत्र में चुनाव प्रचार की रणनीतियां गोपनीय नहीं होती। कौन नेता किस जगह सभी करने जाएगा,यह बात छुपाने की, किसी पार्टी को आवश्यकता नहीं होती। सामान्य मतदाता यह नहीं समझ पा रहा है कि तृणमूल कांग्र्रेस ने ऐसी कौनसी चुनावी रणनीति की फाइलें बनाई थी,जिन्हे चुराने के लिए केन्द्र सरकार को इडी जैसी एजेंसी की मदद लेना पडी। सामान्य समझ वाला व्यक्ति भी यह समझ रहा है कि ममता दीदी की ये बहानेबाजी चुनाव नतीजों के बाद की तैयारी में की जा रही है,ताकि बाद में अगर पराजय हो गई तो मतदाताओं के निर्णय को शिरोधार्य करने की बजाय अन्य कारणों पर दोष डाला जा सके।

इस पूरे माहौल में इक्का दुक्का नेता ही ऐसे बचे है,जो वास्तविक बातों का उल्लेख अब भी कर रहे है। एनसीपी नेता सुप्रिया सुले का बयान याद कीजिए,जब उन्होने कहा था कि इवीएम में कोई गडबड नहीं है। लेकिन ऐसे नेताओं की गिनती नगण्य ही रह गई है।

कुल मिलाकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्र्रेस के सबसे बडे नेता राहूल गांधी का व्यक्तित्व समूचे विपक्ष को प्रभावित कर रहा है। धीरे धीरे उनके तौर तरीके अन्य विपक्षी दल भी अपनाने लगे है और शायद यही कारण है कि ये क्षेत्रीय दल भी अपनी जमीन खोते जा रहे है।