{"vars":{"id": "115716:4925"}}

 शिक्षामंत्री का त्यागपत्र-लेफ्ट इकोसिस्टम के ट्रेप में बार बार फंसती मोदी सरकार

 

 

-तुषार कोठारी

नीट पेपर लीक मामले में आखिरकार केन्द्रीय शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने अपना त्यागपत्र दे दिया है। शिक्षामंत्री का यह त्यागपत्र सीधे सीधे केन्द्र सरकार के दबाव में आने का नतीजा है। अगर ये नैतिकता के आधार पर दिया गया इस्तीफा होता,तो यह उसी दिन हो जाना चाहिए था,जिस दिन नीट का पेपर लीक हुआ था और इसके बाद कई बच्चों ने आत्महत्याएं कर ली थी। लेकिन ये त्यागपत्र न सिर्फ सरकार के दबाव में आने के कारण हुआ है.बल्कि इससे ये भी साबित होता है कि केन्द्र की मोदी सरकार बार बार लेफ्ट इकोसिस्टम के ट्रेप में फंस जाती है और दबाव में आ जाती है।

तिलचïट्टों का आन्दोलन साफ तौर पर लेफ्ट इकोसिस्टम द्वारा खडा किया गया था। तिलचïट्टों के प्रदर्शन की शुरुआत में सरकार का साफ साफ मानना था कि यह आन्दोलन लेफ्ट इकोसिस्टम के टूलकिट की देन है और वास्तविक छात्रों का आन्दोलन से कोई लेना देना नहीं है। जन्तर मन्तर पर एक महीने तक चले प्रदर्शन में भी लेफ्ट लिबरल और देशविरोधी तत्वों की सक्रियता साफ नजर आती रही। वहां के मंच पर दिए गए भाषण और लगाए गए नारे भी यह साफ साफ दिखा रहे थे कि तिलचट्टों का आन्दोलन छात्रों की समस्याएं दूर करने की बजाय सरकार को किसी तरह अस्थिर करने की कोशिश है। मंच से हिन्दू विरोधी नारे तो लगाए ही गए थे,धारा 370 वापस लाने और मोदी सरकार को गिराने जैसी बातें ही प्रमुखता से होती रही थी।

इतना सबकुछ साफ साफ पता होने के बावजूद केन्द्र सरकार ने आखिरकार तिलचट्टों से बात करके,उनकी मांगे मानने के साथ साथ शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का त्यागपत्र दिलवा कर एक प्रकार से इस बात की स्वीकारोक्ति कर दी है कि तिलचट्टों की काक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) देशभर के छात्रों की प्रतिनिधि संस्था है। तिलचïट्टों के नेताओं से केन्द्रीय मंत्रियों की कई दौर की चर्चाओं ने भी सीजेपी को महत्वपूर्ण ही बनाया है।

केन्द्र की मोदी सरकार के बीते बारह वर्षों में सरकार के निर्णयों के खिलाफ हुए आन्दोलनों का पैटर्न ही यह साबित कर देता है कि मोदी सरकार घरेलु आन्दोलनों से निपटने में हर बार अक्षम साबित होती है। याद कीजिए सीएए पर हुए शाहीन बाग आन्दोलन को। कई महीनों तक सडक़े जाम की गई। हाथों में तिरंगे झण्डे लेकर देशविरोधी नारे लगाए गए भाषण दिए गए। आखिरकार दिल्ली दंगों में कई निर्दोषों की मौत के बाद यह आन्दोलन खत्म हुआ।

इसके बाद कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के तथाकथित किसानों का आन्दोलन भी इसी तरह चला। महीनों तक सडक़े जाम की गई। सड़को पर हिंसा की गई और पुलिसवालों पर हमले किये गए।  आखिरकार सरकार ने झुक कर तीनों कृषि कानून वापस ले लिए। केन्द्र सरकार को कहीं ना कहीं ये उम्मीद थी कि इससे पंजाब चुनावों में भाजपा को फायदा मिल सकता है। लेकिन भाजपा को कोई फायदा नहीं हुआ। और अब सीजेपी का आन्दोलन। वही चेहरे,वही नार,े वही भाषण और आखिरकार वही नतीजा।  पेपर लीक पर कडा कानून बनाने और फास्ट ट्रेक कोर्ट बनाने के बावजूद सरकार को झुकना पडा और शिक्षामंत्री का इस्तीफा लेना पडा।

अब देखिए केन्द्र की मोदी सरकार लेफ्ट इकोसिस्टम के ट्रेप में किस तरह फंसती है। सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगातार तानाशाह और लोकतंत्र विरोधी बताया जाता है। इसके बाद किसी भी मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन की शुरुआत की जाती है। विरोध प्रदर्शन के तथाकथित लोकतांत्रिक अधिकार का हवाला देकर बेवजह का विरोध शुरु किया जाता है। तानाशाही और लोकतंत्र विरोधी होने के आरोपों से बचने के लिए सरकार के लोग भी विरोध प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार को अपना समर्थन देने लगते है। परिणामस्वरुप विरोध प्रदर्शन चलता जाता है। फिर इसमें राष्ट्र विरोधी और असमाजिक तत्व सक्रिय होने लगते है। विरोध प्रदर्शन हिंसक होने लगता है।

सरकार विरोधी लोग और विपक्षी दल हिंसक प्रदर्शन को रोकने के प्रयासों को लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश बताने लगते है। फिर सरकार दबाव में आने लगती है। प्रदर्शनकारी पुलिस कर्मियों की पीटने लगते है। पुलिसकर्मी हिंसा का शिकार बनने लगते है। किसान आन्दोलन के प्रदर्शन को याद कीजिए,कितने पुलिसकर्मी घायल हुए थे। अभी सीजेपी के प्रदर्शन में भी सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए है। लेकिन आन्दोलनकारी अभी भी पुलिसवालों के खिलाफ ही कडी कार्यवाही करने की मांग कर रहे है।

सरकार की बेचारगी देखिए कि जिन आन्दोलनीवियों की वास्तविकता उन्हे अच्छे से पता है,उन्ही आन्दोलनजीवियों को अब वे छात्रों का अधिकारिक प्रतिनिधि बताकर उनसे चर्चाएं करने के लिए मजबूर है। सीजेपी की वास्तविकता देखिए। अमेरिका में बैठा,आम आदमी पार्टी से जुडा एक व्यक्ति,सर्वोच्च न्यायालय के मुख्यन्यायाधीश की एक टिप्पणी का मजाक उडाने के लिए काक्रोच जनता पार्टी नामक एक सोशल मीडीया हैण्डल बनाता है और एक ही दिन में इस पर दो करोड से ज्यादा फालोअर आ जाते है।

फिर वह व्यक्ति भारत आकर आन्दोलन की घोषणा करता है। यह घोषणा तब होती है,जबकि नीट की परीक्षा हो चुकी होती है और सफल छात्रों का एडमिशन भी शुरु हो चुका होता है। इस आन्दोलन में लद्दाख के एक व्यक्ति को जोडा जाता है और जन्तर मन्तर पर विरोध प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार का हवाला देकर विरोध प्रदर्शन शुरु कर दिया जाता है। शुरुआती दौर में इस प्रदर्शन से गिने चुने लोग ही जुडते है,लेकिन एक महीना बीतते बीतते प्रदर्शनकारियों की संख्या बढने लगती है और संसद सत्र के पहले दिन हिंसक प्रदर्शन किया जाता है। सबकुछ बिलकुल वैसे ही होता है,जैसे पहले के आन्दोलनों में हुआ था। अब सरकार खुद इस आन्दोलन को वास्तविक छात्रों का आन्दोलन मानने लगती है और उनके दबाव में झुक जाती है।

शिक्षामंत्री अपने त्यागपत्र में कहते है कि छात्रों को भ्रम में नहीं फंसने दिया जाएगा। लेकिन लगता यह है कि भ्रम में सरकार खुद फंस गई है। घरेलु आन्दोलनों से निपटने में सरकार की यह कमजोरी सरकार को और भी कई झटके देगी। काक्रोचों का यह आन्दोलन कहने को छात्रों के हित के लिए था,लेकिन इसमे सक्रिय सारे तत्वों का मुख्य लक्ष्य सरकार को अस्थिर करने का है। इसलिए अब नए नए मुद्दे उठाकर सरकार को दबाव में लाने की नई कोशिशें चलेगी जो आखिरकार सरकार के लिए दुखदायी साबित होगी।

मोदी सरकार के नीति नियन्ताओं को इस बारे में गंभीर चिंतन करना चाहिए कि तानाशाही के आरोपों से डर कर वे जब जब इस तरह के लेफ्ट इको सिस्टम के फर्जी आन्दोलनों को विरोध प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार के नाम पर पनपने देगी,तब तब उसे आखिर में पराजय का ही सामना करना पडेगी और अन्तत: इससे मोदी की 56 इंच की छाती वाली छबि बुरी तरह प्रभावित होगी।