पांच राज्यों के चुनाव नतीजों का निष्कर्ष - प्रासंगिकता खोती जा रही है विपक्षी पार्टियां
- तुषार कोठारी
पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के विश्लेषण से कई नए सवाल सामने आ रहे हैैं। इनमें सबसे बडा सवाल यही है कि क्या भारत के लोकतंत्र में विपक्षी दल अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैैं। क्या भविष्य की राजनीति विपक्ष विहीन होने वाली है? इस तरह के सवाल कुछेक विपक्षी नेता भी उठा रहे हैैं,लेकिन गहराई से देखा जाए तो इस तरह की परिस्थितियां विपक्षी नेताओं की वजह से ही बन रही है।
पिछले लोकसभा चुनावों के पहले देश के तमाम विपक्षी दलों ने बडी मशक्कत से इण्डिया गठबन्धन बनाया था और यह नैरेटिव फैलाने की कोशिश की थी कि अब समूचा विपक्ष एक हो गया है। भाजपा के चार सौ पार के नारे को संविधान के लिए खतरा बताते हुए विपक्षी एकता के नैरैटिव ने आंशिक सफलता भी हासिल की थी और भाजपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत पाने से वंचित रह गई थी। लोकसभा चुनाव के नतीजों को विपक्ष ने कुछ इस तरह पेश किया था,मानो भाजपा और एनडीए चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो गए हो।
लेकिन असलियत यह नहीं थी। वास्तविकता यह थी कि नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी और दो सौ चालीस सीटों वाली भाजपा ने कथित तौर पर दो बैसाखियों के साथ सरकार चलाना शुरु कर दिया था। विपक्षी दल काफी दिनों तक इसी खुशफहमी में थे कि उन्होने भाजपा और नरेन्द्र मोदी को रोक दिया है। उन्हे यह भी खुश फहमी थी कि अब भाजपा ढलान पर चल पडी है और आने वाले दिनों में विपक्ष को बडी सफलताएं मिलने लगेगी।
लेकिन विपक्ष की यह खुशफहमी बडी जल्दी खत्म हो गई। बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के चुनाव नतीजों ने जल्दी ही ये साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा का मजबूत संगठन दोनो ही यथावत मजबूत है। उसमें कोई बदलाव नहीं आया है।
हाल में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में देश के दो सबसे मजबूत विपक्षी नेताओं की परीक्षा होना थी। याद करें लोकसभा चुनाव के पहले जब इण्डिया गठबन्धन बन रहा था और तमाम विपक्षी नेताओं को इन्ही दो मजबूत नेताओं से सबसे ज्यादा उम्मीद थी। ये दो नेता थे,पश्चिम बंगाल की फाइटर मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और तमिलनाडू के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन। अब जब इन्ही दोनो नेताओं के राज्यों के चुनाव आए तो कांग्र्रेस समेत अन्य दलों को उम्मीद थी कि ये दो मजबूत नेता भाजपा की लहर को रोक लेंगे,जिसकी वजह से आने वाले दिनों में होने वाले उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के लिए अच्छे आसार बन जाएंगे।
लेकिन नतीजों ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जिन दो नेताओं को सबसे मजबूत विपक्षी नेता माना जाता था,वे दोनो ही अपनी अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। एमके स्टालिन भी अपना चुनाव हार गए और ममता जी तो लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री होते हुए अपना चुनाव हार गई। एमके स्टालिन ने तो जनता के निर्णय को स्वीकार कर लिया है,लेकिन ममता जी चुनाव चोरी होने और चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक पर पक्षपाती होने के आरोप लगा रही है।
अब सवाल ये है कि राजनीति का भविष्य क्या होगा? विपक्षी नेता राजनीति के विपक्ष विहीन होने का खतरा जता रहे है। सवाल ये है कि विपक्ष को मजबूत करने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या ये जिम्मेदारी भाजपा की है कि वह अपने विरोधी दलों को मजबूत करें या ये जिम्मेदारी विपक्षी दलों की खुद की है कि वे अपने आप को मजबूत करें। हांलाकि विपक्षी नेताओं की हताशा अब इस स्तर तक पंहुच गई है कि वे ये चाहने लगे है कि अपनी हजार गलतियों और खामियों के बावजूद उन्हे मजबूत करने का काम भी भाजपा ही करें।
देश के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो साफ होता है कि देश में विचारधारा पर आधारित राजनीतिक पार्टी अब सिर्फ भाजपा ही बची है। इसके अलावा वामपंथी पार्टियों को विचारधारा आधारित पार्टियां माना जाता था,लेकिन केरलम में पराजय के बाद अब वामपंथी पार्टियां सत्ता से पूरी तरह बाहर हो गई है। इसके अलावा देश में जितनी भी राजनीतिक पार्टियां है,उनके पास वैचारिकी का स्पष्ट अभाव है।
देश की एकमात्र देशव्यापी विपक्षी पार्टी कांग्र्रेस के पास कोई विचारधारा नहीं है। विचारधारा के अभाव का ही असर है कि कांग्र्रेस अब वामपंथ के हिंसक स्वरुप अरबन नक्सलवाद की ओर झूकने लगी है। दूसरे नम्बर की क्षेत्रीय पार्टी समाजवादी पार्टी का नाम तो समाजवाद पर है,लेकिन समाजवाद की विचारधारा को वो दशकों पहले तिलांजली दे चुकी है। देश के किसी भी राजनीतिक दल को देखिए,किसी के पास कोई विचारधारा नहीं है। सारे के सारे विपक्षी दल एक एक परिवार की जागीर है।
देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों का चुनाव जीतने का एकमात्र माडल मुस्लिम तुष्टिकरण और इसके बाद जातिगत विद्वेष बढाकर अलग अलग समूहों के वोट कबाडने का था। अखिलेश जिस पीडीए की बात करते है,वह यही माडल है। बिहार में आरजेडी के पास भी चुनाव जीतने का एकमात्र यही माडल था। देश के जिस हिस्से पर नजर डालिए विपक्षी दलों के पास चुनाव जीतने का एकमात्र यही माडल होता था।
लेकिन कुछ सोशल मीडीया,कुछ आरएसएस जैसे स्वयंसेवी संगठनों की कोशिशें और कुछ सामान्य लोगों में बढी जागरुकता का असर है कि आम मतदाता विपक्षी दलों के इस चुनावी माडल को समझने लगा है और इसे पूरी तरह नकारने भी लगा है। इसी का नतीजा है कि मध्यप्रदेश और गुजरात जैसे कई राज्यों में भाजपा लगातार एक के बाद एक चुनाव जीतती जा रही है।
विपक्षी दल लगातार मिलती असफलताओं से इतने हताश हो चुके है कि वे स्वयं का आकलन करने को तैयार नहीं है। चुनाव नतीजे आने के बाद वे यह जानने की कतई कोई कोशिश नहीं करते कि उनकी गलतियां क्या थी जिसकी वजह से उन्हे हार का सामना करना पडा। तमाम विपक्षी दलों ने बीते डेढ दशक से यह तय कर लिया है कि चुनाव में पराजय का ठिकरा उन्हे कभी इवीएम पर,कभी चुनाव आयोग पर तो कभी सशस्त्र बलों पर फोडना है। ममता जी को देखिए,मुख्यमंत्री रहते हुए दो दो बार अपना खुद का चुनाव हारने के बाद भी वे हार का ठीकरा चुनाव आयोग और यहां तक कि न्यायपालिका पर फोड रही है।
अगले साल जिन राज्यों में चुनाव होना है वहां के नेताओं को ये नतीजे देखकर जबर्दस्त घबराहट होने लगी है। अखिलेश यादव भी चुनाव आयोग को कोसने लगे है। उत्तर प्रदेश का चुनाव 2027 में होना है।अखिलेश चाहे,तो अपनी रीति नीति की कमियां ढूंढ कर उन्हे दूर कर सकते है,लेकिन वे अभी से संभावित पराजय के बहाने खोजने लगे है। चुनाव आयोग को कोसना इसी का प्रमाण है।
यही हाल रहे तो यह तय है कि एक एक करके तमाम विपक्षी दल अप्रासंगिक हो जाएंगे। मुस्लिम तुष्टिकरण और जातियों में लोगों को बांट कर वोट कबाडने का फार्मूला अब जनता नकार चुकी है। ऐसे में अगर विपक्षी दलों ने अपने तौर तरीकों में आमूलचूल बदलाव ना किया तो वह दिन दूर नहीं है,जब देश का लोकतंत्र एक पार्टी वाला लोकतंत्र बन कर रह जाएगा। राजनीति पर नजर रखने वालों को यह तथ्य बडी आसानी से समझ में आ रहा है लेकिन विपक्षी नेता इसे समझने को तैयार नहीं है। ऐसे में भारत की राजनीति में विपक्षी पार्टियों को अप्रासंगिक होना तय है।