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 सीजेआई को ज्ञापन-बार बार खुद को पप्पू साबित करते राहूल

 

 

-तुषार कोठारी

भारत की आजादी से लेकर अब तक के अस्सी सालों में देश में कई मुद्दों को लेकर आन्दोलन हुए हैैं। इन आन्दोलनों में धरना,ज्ञापन,चक्काजाम,बन्द जैसी गतिविधियां की जाती रही हैैं लेकिन आज तक किसी भी आन्दोलन में देश के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन देने जैसा कदम किसी आन्दोलनकारी नेता ने नहीं उठाया। देश के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय कभी भी ज्ञापन दिए जाने का स्थान नहीं रहा है और ना हो सकता है। भारत राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर आसीन महामहिम राष्ट्रपति को ज्ञापन दिए जाने के बाद में और किसी को ज्ञापन दिए जाने की जरुरत भी नहीं रह जाती है। लेकिन राष्ट्रपति को ज्ञापन दिए जाने के बाद सीजेआई को ज्ञापन देने की घोषणा करके राहूल ने सिर्फ यही बताया है कि वे बार बार खुद को पप्पू ही साबित करते हैैं।

अब कल्पना कीजिए कि हाथ में संविधान की किताब लेकर राहूल जब सर्वोच्च न्यायालय ज्ञापन देने जाएंगे तो क्या हो सकता है? अस्सी सालों में कभी भी कोई व्यक्ति या संस्था ज्ञापन देने किसी अदालत में नहीं गया होगा। यदि कोई गया भी होगा तो वे न्यायालय के कर्मचारी रहे हो सकते है,जो अपनी समस्याएं लेकर किसी न्यायाधीश के पास गए होंगे। अब जब राहूल ज्ञापन लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जाएंगे तो या तो मुख्य न्यायाधीश ज्ञापन लेने न्यायालय भवन के द्वार पर आएंगे या ज्ञापन देने वाले कुछ व्यक्तियों को भीतर बुलाएंगे। लेकिन इन दोनो संभावनाओं के अतिरिक्त एक तीसरी और सबसे अधिक संभावना यह भी है कि वे इस प्रकार का ज्ञापन लेने से ही इंकार कर देंगे। कई उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय केवल प्रचार के लिए प्रस्तुत की जाने वाली तथाकथित जनहित याचिकाओं को खारिज करने के साथ याचिकाकर्ता पर न्यायालय का समय खराब करने के लिए भारी अर्थदण्ड भी लगाते रहे हैैं। राहूल गांधी द्वारा मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन दिए जाने की घोषणा को भी न्यायालय का बहुमूल्य समय नष्ट करने और सस्ता प्रचार हासिल करने की ही कोशिश क्यों नहीं माना जाएगा?

मजेदार तथ्य यह भी है कि एसआईआर को संविधान विरोधी बताने वाली और एसआइआर पर रोक लगाने की कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहले ही सुन भी चुका है और इन पर अपना निर्णय भी दे चुका है। पश्चिम बंगाल में हुए एसआइआर को रुकवाने के लिए ममता बैनर्जी ने भी याचिकाएं दायर की थी,जिन्हे न सिर्फ खारिज कर दिया गया था,बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने ही एसआईआर करवाने के लिए न्यायिक अधिकारियों तक को तैनात किया था। वर्तमान में भी तमाम शासन विरोधी वकीलों और संस्थाओं ने एसआइआर के खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत कर रखी है। इतना ही नहीं मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लम्बित है। ऐसी स्थिति में राहूल द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाकर ज्ञापन देने को क्या माना जाएगा? क्या इसे न्यायालय को अवैध तरीके से प्रभावित करने या न्यायालय पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं माना जा सकता? और अगर सचमुच में ऐसा हो गया तो राहूल सर्टिफाइड पप्पू नहीं हो जाएंगे?

वैसे राहूल गांधी द्वारा इस तरह की घोषणा किया जाना राहूल की हताशा को ही प्रदर्शित करता है। लगातार चुनाव हारते जाने से उपजी निराशा ने सिर्फ राहूल गांधी को ही पप्पू नहीं बनाया है,बल्कि कई सारे विपक्षी दल भी अब पप्पू बनने की राह पर चल निकले हैैं। राहूल की हताशा के साथ साथ ममता और अखिलेश जैसे नेताओं की हताशा भी उन्हे पप्पू बना रही है। जिस राहूल गांधी ने पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत को ममता की गलती बताया था और हार का ठीकरा पूरी तरह ममता बैनर्जी पर डाला था। हार से हताश ममता बैनर्जी आज उसी राहूल के पीछे चलने को तैयार है। उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्र्रेस को लताडने वाले अखिलेश भी दिल्ली में राहूल के पीछे चलते नजर आ रहे हैैं। 

असल में ममता और अखिलेश अपनी दुविधा से बाहर ही नहीं निकल पा रहे हैैं। एक पल उन्हे लगता है कि राहूल के पीछे ना चलने से उनका नुकसान हो सकता है,फिर अगले ही पल उन्हे लगता है कि राहूल के पीछे चलने से भी उनका भारी नुकसान हो सकता है। दोनो परिस्थितियों में से किसी एक को वे चुन नहीं पा रहे हैैं। इसी चक्कर में वे कभी तो राहूल के प्रदर्शन में शामिल हो जाते है और कभी उससे दूरी बना लेते है। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट को ज्ञापन देते वक्त वे राहूल के पीछे रहेंगे या दूरी बना लेंगे?

दूसरी ओर कांग्र्रेस की हालत इन दिनों अजीब हो रखी है। ऐसा नहीं कि कांग्र्रेस में अनुभवी और समझदार नेता नहीं है। बल्कि सुप्रीम कोर्ट के बडे बडे वकील भी है। लेकिन इनमें से किसी में भी राहूल को सलाह देने की सलाहियत नहीं है। अगर एक बार राहूल के मन में आ गया कि सीजेआई को ज्ञापन देना है तो फिर कोई उन्हे ये नहीं समझा सकता कि सीजेआई को ज्ञापन देने से कांग्र्रेस को कोई फायदा नहीं होगा,उलटे नुकसान जरुर हो सकता है। अगर किसी ने ऐसी सलाह देने की हिम्मत जुटा भी ली तो अगले ही पल वह व्यक्ति नरेन्द्र मोदी से डरने वाला और नरेन्द्र मोदी से मिला हुआ हो जाएगा। राहूल के पवन खेडा जैसे दरबारी राहूल के इस कदम को ऐतिहासिक जरुर बता रहे होंगे।

ab यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट,राजनीतिक पार्टी द्वारा सुप्रीम कोर्ट को ज्ञापन दिए जाने की घोषणा पर क्या और कैसी प्रतिक्रिया देता है? सुप्रीम कोर्ट देश की एकमात्र ऐसी संस्था है जिसके द्वारा कहा गया एक एक शब्द नजीर बनता है। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया पर सबकी नजर होगी। लेकिन इतना तय है कि सुप्रीम कोर्ट को ज्ञापन देने की घोषणा करके राहूल ने फिर से खुद को पप्पू ही साबित किया है।