"जेन जी" के जंजाल में फंसता राष्ट्रवादी विमर्श,युवा और छात्र हुए नदारद, रह गए केवल "जेन जी"
- तुषार कोठारी
अभी करीब तीन महीने पहले तक भारत में "जेन जी" की चर्चा नहीं के बराबर थी,लेकिन हाल के दिनों में जिधर देखिए सिर्फ "जेन जी" की चर्चाएँ हो रही है। टीवी चैनल हो या अखबार या सोशल मीडीया प्लेटफार्म्स,हर कहीं "जेन जी" चर्चाओं में है। टीवी चैनलों के कार्यक्रम राजनीतिक दलों को बता रहे है कि अब उन्हे "जेन जी" पर आधारित राजनीति करना होगी। नेता हो या बुद्धिजीवी या धर्मगुरु कर कोई "जेन जी" से जुडने की बातें कर रहा हैैं। यहां तक कि विश्व के सबसे बडे स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख भी "जेन जी" से वार्ता का एक कार्यक्रम कर चुके हैैं और कहा जा रहा है कि यह संगठन भी अब "जेन जी" को आकर्षित करने के प्रयासों में जुट चुका है।
क्या यह वास्तविकता है या फिर वामपंथी इको सिस्टम और कुछ विदेशी शक्तियों के आर्थिक सहयोग से फैलाया गया जंजाल है? आज लाख टके का सवाल यही है। इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें सबसे पहले "जेन जी" की चर्चाएं कैसे और क्यों शुरु हुई? इस प्रश्न का उत्तर खोजना होगा।
"जेन जी" यानी जेनरेशन जी। 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए बच्चों को "जेन जी" कहा जा रहा है। इस पीढी को ये नाम सबसे पहले अमेरिका में दिया गया। "जेन जी" यानी वह पीढी जो इन्टरनेट कनेक्टिविटी,सोशल मीडीया और स्मार्ट फोन के जमाने में पैदा हुई है। अमेरिका के लिए तो यह टर्म बिलकुल सही है लेकिन भारत में ये टर्म कुछ अलग है। भारत की वास्तविकता को देखा जाए तो भारत में इन्टरनेट कहने को तो 1997 में शुरु हो चुका था,लेकिन आम लोगों तक इसकी पंहुच 2012 के बाद ही बन पाई थी। यही स्थिति स्मार्ट फोन की भी रही है। भारत में मोबाइल का फोर जी नेटवर्क ही 2012 के बाद शुरु हो पाया है और इसीलिए प्रत्येक हाथ में स्मार्ट फोन पंहुचने की दौर भी 2012 के बाद ही शुरु हो पाया है। जबकि इन दोनो मामलों में अमेरिका भारत से कम से कम दस साल आगे रहा है। अगर इस लिहाज से देखें तो जिस पीढी को आज "जेन जी" कहा जा रहा है,वह तो भारत में 2012 के बाद शुरु हुई है। जिसे आज विश्व "जेन अल्फा" कह रहा है,वह भारत की "जेन जी" है। यानी वर्तमान संदर्भो में जिन युवाओ को "जेन जी" कहा जा रहा है वे "जेन जी" है ही नहीं।
ये तो हुई "जेन जी" की तथ्यात्मक जानकारी। लेकिन अब आते है वर्तमान दौर की परिस्थितियों पर। बांग्लादेश और नेपाल में सोशल मीडीया के जरिये हिंसक आन्दोलन और इसके जरिये तख्ता पलट होने की घटनाओं के बाद शासन विरोधी पार्टियों और अन्य तत्वों ने भारत पर भी इसका सीधा असर पडने की बातें शुरु कर दी थी। पूरी दुनिया का वामपंथी इकोसिस्टम येन केन प्रकारेण भारत में भी हिंसक आन्दोलन के माध्यम से सत्ता परिवर्तन के ख्वाब संजोने लगा था,और देश की विपक्षी पार्टियां भी इसमें अपना स्वर मिलाने लग गई थी।
नीट परीक्षा का पेपर लीक हुआ और इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने काकरोच वाली टिप्पणी की। इस टिप्पणी को वामपंथी इकोसिस्टम ने जमकर फैलाया और देश के बाहर एक काकरोच जनता पार्टी नामक सोशल मीडीया हैण्डल अस्तित्व में आ गया। वामपंथी इकोसिस्टम के समन्वित प्रयासों के चलते इस हैण्ड़ल पर करोडों फालोअर्स आए और इसकी परिणति आखिरकार जन्तर मन्तर के आन्दोलन के रुप में सामने आई। पूरे वामपंथी इकोसिस्टम ने इसे "जेन जी" का आन्दोलन बताते हुए हर ओर "जेन जी" को एक अलग समूह के रुप में प्रदर्शित करना शुरु कर दिया। इसके असर में देश के प्रमुख टीवी चैनल भी आ गए। टीवी चैनलों पर और दूसरे समाचार माध्यमों में यह बताया जाने लगा कि "जेन जी" देश का एक अलग वर्ग है,जिसकी आकांक्षाएं,इच्छाएं,सोचने और बोलने का तरीका पूरी तरह अलग है और न सिर्फ सरकार बल्कि तमाम विपक्षी पार्टियों और अन्य संस्था संगठनों ने "जेन जी" वाले इस वर्ग से अब तक दूरी बनाकर रखी है।
जबकि वास्तविकता इससे पूरी तरह अलग थी और ना सिर्फ अलग थी,बल्कि अलग है। देश में 14 से 28 वर्ष की आयुवर्ग वाले युवाओं मे कई तरह के अलग अलग समूह है। इनमें बडे शहरों में रहने वाले वे युवा हैैं,जो हाई फाई लाइफ स्टाइल में जीते है। पिज्जा बर्गर और आईफोन वाले ये युवा उच्च मध्यम वर्ग के युवा है,जो महंगे कालेजों में पढते हैैं और आर्थिक रुप से सम्पन्न है। इसी वर्ग में वो युवा भी शामिल है,जो टियर टू या टियर थ्री वाले छोटे शहरों में या छोटे गांवों में रहता है। जिसके जीवन में कई तरह के संघर्ष है,चुनौतियां है और उसे अपने जीवन में कोई व्यवस्थित कैरियर बनाना है। छोटे शहरों और गांवों में बसने वाले ये युवा संख्या में कई गुना अधिक है।
इससे अलग देश की राजनीतिक पार्टियों और आरएसएस जैसे सामाजिक संगठनों को देखें,तो लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल और सामाजिक संगठनों के अपने अपने युवा संगठन बरसों पहले से सक्रिय रहे हैैं। कांग्र्रेस के पास एनएसयूआई है,तो भाजपा के पास युवा मोर्चा और एबीवीपी। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात करें तो संघ की तो स्थापना ही संघ संस्थापक ने किशोर और तरुणों के साथ की थी। संघ की स्थापना के समय से ही उसमें युवाओं की भरपूर भागीदारी रही है। इतना ही नहीं देश के राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए कई आन्दोलनों में युवाओं ने बढचढ कर हिस्सा लिया और आन्दोलनों के माध्यम से परिवर्तन लाने में सफलताएं भी मिली। असम में विदेशी घुसपैठ के खिलाफ छात्रों का आन्दोलन रहा हो,या आपातकाल के विरुद्ध आन्दोलन रहा हो। युवाओं ने इस तरह के प्रत्येक आन्दोलन में हिस्सेदारी की और आन्दोलनों को सफल भी बनाया।
लेकिन 20 जुलाई 2026 से पहले देश में "जेन जी" नामक युवा दिखाई ही नहीं देते थे। 20 जुलाई 2026 से पहले के युवा या तो युवा थे,या छात्र। इनमें अगर आयु के आधार पर वर्गीकरण भी किया जाता था,तो हिन्दी भाषा में इसके लिए बालक, किशोर और तरुण जैसे शब्द मौजूद थे। 12 से 20 वर्ष की आयु तक के युवाओँ को किशोर और 20 से 30 वर्ष की आयु के युवाओं को तरुण कहा जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तो बाकायदा इसी आधार पर अलग अलग कार्यक्रम किए जाते रहे हैैं। किशोरों के लिए अलग कार्यक्रम होते है,तो तरुणों के लिए अलग। लेकिन 20 जुलाई 2026 के बाद अब देश में ना तो युवा बचे है,ना छात्र और ना ही कोई किशोर है या तरुण। अब जो भी युवा है,वो या तो "जेन जी" है या "जेन अल्फा"।
ये पूरा परिदृश्य इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वामपंथी इकोसिस्टम के पास जनाधार नामक कोई चीज भले ही ना हो,लेकिन प्रचार माध्यमों को प्रभावित करने की उनकी क्षमता अद्वितीय है। पिछले कुछ महीनों के पूरे परिदृश्य को व्यापकता में देखें तो साफ समझ में आता है कि बांग्लादेश और नेपाल में हुए हिंसक आन्दोलनों के बाद चर्चाओँ में आए "जेन जी" शब्द को वे ना सिर्फ मुख्य धारा में लाने में सफल रहे,बल्कि उनकी सफलता उस स्तर तक पंहुच गई,जहां युवाओं में पर्याप्त जनाधार रखने वाले भाजपा और संघ जैसे संगठन भी "जेन जी" के भ्रमजाल में उलझ कर रह गए।
भाजपा की केन्द्र सरकार के लोग भलिभांति जानते थे कि काकरोच जनता पार्टी वामपंथी इकोसिस्टम का खडा किया हुआ तमाशा है। 15 जुलाई तक उन्हे सोशल मीडीया पर तो समर्थन मिल रहा था,लेकिन धरातल पर उनके साथ कोई नहीं था। जन्तर मन्तर पर युवाओँ की संख्या नगण्य थी। केवल वामपंथी विचारक या फिल्मी लोग वहां पंहुच रहे थे। लेकिन 20 जुलाई के दिन अपनी तमाम शक्ति झोंक कर जब उन्होने हिंसा का ताण्डव कर दिखाया तो अचानक सरकार और भाजपा के तमाम लोग भूल गए कि ये वामपंथी इकोसिस्टम के विदेशी फण्डिंग पर चलने वाले आन्दोलनजीवी है। सरकार और भाजपा को लगने लगा कि सचमुच देश का "जेन जी" नाराज है। जेन जी को मनाना जरुरी है। भाजपा के प्रवक्ता टीवी डिबेट में कहने लगे कि सरकार "जेन जी" के प्रति गंभीर है और उनकी मांगों को सुनने के लिए तैयार है और मात्र दो दिनों के भीतर सरकार ने अपने मंत्री का त्यागपत्र लेकर कथित "जेन जी" की मांगे भी मान ली।
भ्रमजाल का असर यहीं तक नहीं रहा। किशोरों और तरुणों के लिए अलग अलग कार्यक्रम रखने वाले संघ के प्रमुख भी "जेन जी" से संवाद के कार्यक्रम में पंहुच गए और ना सिर्फ पंहुच गए बल्कि उन्होने कहा कि वे "जेन जी" पर पूरा विश्वास करते है। संघ की शाखाओं में जाने वाले किशोर और तरुण बेचारे ये सोचते रह गए कि वे तो किशोर और तरुण है,"जेन जी" शायद मंगल ग्र्रह से उतरे हुए कोई लोग है,जो आज तक संघ के सम्पर्क में नहीं आए थे।
इतना ही नहीं,वे यह भी भूल गए कि श्रावण के महीने में देश भर में सड़को पर काँवड़े लेकर जाते कांवड़ यात्रियों में बड़ी संख्या उन युवाओ की है जो "जेन जी" के युवा है। मंदिरो में हनुमान चालीसा का पाठ करते और खेल मैदानों में प्रतियोगिताओ की तैयारी करते हज़ारो लाखो युवा भी "जेन जी" वाले ही है। मंदिरो में भगवान के दर्शन के लिए लगी लम्बी कतारों में भी हज़ारो युवा नज़र आते है.ये भी "जेन जी" वाले ही है जो कि वामपंथी विचारधारा से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं रखते।
भ्रमजाल का असर अब भी दिखाई दे रहा है। टीवी चैनलों पर पार्टियों के प्रवक्ता कह रहे है कि वे अपनी पार्टियों में "जेन जी" के लिए अलग से प्रकोष्ठ बनाएंगे। अब सवाल ये है कि पार्टियों की युवा इकाई में काम करने वाले कहां काम करेंगे? युवा इकाई चालू रहेगी या बन्द कर दी जाएगी?
गंभीर प्रश्न यह है कि वामपंथी इकोसिस्टम द्वारा फैलाए गए इस भ्रमजाल में पार्टियां कब तक फंसी रहेगी? युवाओं को किशोर और तरुण में बांटने की बजाय "जेन जी" का एक नया वर्ग खडा करने की वामपंथी कोशिशों को अब राष्ट्रवादी विचार वाले ही सफल बनाने में जुट गए है। वामपंथी इकोसिस्टम की ये सफलता आगे कहां तक जाएगी और क्या असर दिखाएगी? इन प्रश्नों का उत्तर कौन खोजेगा...?

