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 नेपाल की पर्यावरणीय त्रासदी: जिम्मेदारी की सीमा पड़ोसी देशों तक क्यों?

 

 

- राजेश घोटीकर

नेपाल की हालिया पर्यावरणीय त्रासदी ने दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल फिर खड़ा किया है—प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय क्षति के लिए जिम्मेदारी किसकी तय की जाए? नेपाल द्वारा पर्यावरणीय नुकसान के लिए मुआवजे की मांग एक गंभीर विषय है, लेकिन यदि जलवायु परिवर्तन को इसका आधार माना जा रहा है, तो इस जिम्मेदारी को केवल अमेरिका और पड़ोसी देशों तक सीमित करना कितना उचित है, इस पर भी व्यापक बहस आवश्यक है।

ग्लोबल वार्मिंग किसी एक देश की सीमा में पैदा होने वाली समस्या नहीं है। वातावरण और जलवायु किसी राजनीतिक सीमा को नहीं मानते। दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पृथ्वी की समग्र जलवायु प्रणाली को प्रभावित करता है। इसलिए यदि पर्यावरणीय नुकसान के लिए आर्थिक या अन्य प्रकार के मुआवजे की बात होती है, तो उसके लिए जिम्मेदारी तय करने का आधार भी वैज्ञानिक और वैश्विक होना चाहिए।

कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी वैश्विक हो

आज दुनिया के विभिन्न देशों में उद्योग, परिवहन, ऊर्जा उत्पादन, निर्माण और अन्य मानवीय गतिविधियों से बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन हो रहा है। इसके अतिरिक्त युद्ध और सैन्य गतिविधियां भी ईंधन की खपत, हथियारों के निर्माण, परिवहन तथा बुनियादी ढांचे के विनाश के माध्यम से पर्यावरण पर प्रभाव डाल सकती हैं।

ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी देश को जलवायु परिवर्तन के कारण हुए नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाना है, तो क्या युद्ध लड़ रहे देशों तथा बड़े पैमाने पर उत्सर्जन करने वाली अन्य गतिविधियों को भी इस वैश्विक जिम्मेदारी के आकलन में शामिल नहीं किया जाना चाहिए?

जलवायु न्याय का अर्थ किसी एक देश को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि प्रत्येक महत्वपूर्ण उत्सर्जन स्रोत के योगदान का निष्पक्ष वैज्ञानिक आकलन करना होना चाहिए।

टायर और सिलेंडर में भरी गैस पर भी वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी

इसी व्यापक पर्यावरणीय विमर्श में Birds Watching Group द्वारा टायरों और सिलेंडरों में भरी हवा/गैस से जुड़े संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। इस विषय पर भावनात्मक या अनुमान आधारित निष्कर्षों के बजाय वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।

किसी भी गतिविधि को जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ठहराने से पहले यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उससे किस प्रकार का उत्सर्जन होता है, उसकी मात्रा कितनी है और उसका वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव क्या है। पर्यावरण संरक्षण की बहस तभी प्रभावी हो सकती है जब उसके आधार में विश्वसनीय वैज्ञानिक आंकड़े हों।

Birds Watching Group के संस्थापक राजेश घोटीकर का कहना है कि कार्बन एमिशन को स्थानीय समस्या मानना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि कार्बन उत्सर्जन का प्रभाव वैश्विक है, इसलिए इसकी जिम्मेदारी तय करने का दृष्टिकोण भी वैश्विक होना चाहिए।

नेपाल को भी अपनी आंतरिक जिम्मेदारियों पर विचार करना होगा

जलवायु परिवर्तन के लिए अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी की मांग करना उचित बहस का विषय हो सकता है, लेकिन इसके साथ प्रत्येक देश को अपनी आंतरिक पर्यावरणीय नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा भी करनी चाहिए।

नेपाल के मामले में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत संवेदनशील है। पर्वतीय पर्यटन, सड़क निर्माण, कचरा प्रबंधन, शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग जैसे मुद्दों पर प्रशासन द्वारा लिए गए निर्णयों का पर्यावरणीय प्रभाव हो सकता है। इसलिए किसी भी पर्यावरणीय त्रासदी के कारणों का आकलन करते समय बाहरी कारकों के साथ-साथ स्थानीय नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की भूमिका की भी जांच आवश्यक है।

समाधान आरोपों में नहीं, जवाबदेही में है

आज आवश्यकता इस बात की है कि पर्यावरणीय क्षति को लेकर आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर एक वैज्ञानिक और पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए। कौन-सा उत्सर्जन कितना है, किस गतिविधि से कितना पर्यावरणीय नुकसान हुआ और उस नुकसान के लिए किस स्तर की जिम्मेदारी बनती है—इन सभी सवालों का उत्तर स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन और विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर मिलना चाहिए।

नेपाल की पर्यावरणीय चुनौतियां हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती हैं—जलवायु परिवर्तन की समस्या सीमाओं से बड़ी है। यदि प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन वैश्विक हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी केवल किसी एक पड़ोसी देश के खाते में नहीं डाली जा सकती।

मुआवजे की मांग हो या पर्यावरण संरक्षण की नीति, दोनों में एक ही सिद्धांत महत्वपूर्ण होना चाहिए—जिम्मेदारी भी वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित हो और समाधान भी।

हिमालय को बचाने की जिम्मेदारी केवल नेपाल की नहीं है, लेकिन नेपाल में हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण की जिम्मेदारी से नेपाल का प्रशासन भी मुक्त नहीं हो सकता। इसी संतुलित दृष्टिकोण से ही जलवायु न्याय और वास्तविक पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।