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पन्द्रह हजार फीट पर स्थित सतोपन्त झील पर गूंजे नमस्ते सदा वत्सले के स्वर

सतोपंत स्वर्गारोहिणी यात्रा- धर्मलाभ के साथ पर्वतारोहण का मजा

यात्रा वृत्तान्त-तुषार कोठारी

धार्मिक यात्रा और पर्वतारोहण या ट्रैकिंग दो सर्वथा भिन्न बातें है। धार्मिक यात्रा,व्यक्ति श्रध्दा के वशीभूत होकर धर्मलाभ अर्जित करने के लिए करता है,जबकि पर्वतारोहण या ट्रैकिंग एक साहसिक गतिविघि है,जिसे अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता जांचने के लिए किया जाता है। आमतौर पर दोनो बातें एक साथ नहीं होती। लेकिन यदि इन दोनो का ही मजा एकसाथ लेना हो तो निस्संदेह रुप से सतोपंत स्वर्गारोहिणी की यात्रा करना होगी। जिस रास्ते से पाण्डवों ने सशरीर स्वर्ग जाने की योजना बनाई थी और जिससे केवल युधिष्ठिर ही सशरीर स्वर्ग जा पाए थे,उसी स्वर्गारोहिणी की यात्रा आपको धार्मिक आध्यात्मिक अनुभव तो देती ही है,पर्वतारोहण की साहसिकता भी इसमें शामिल होती है।भारत भक्ति परिवार और अधिवक्ता परिषद से जुडे हम सात लोगों का दल विगत दिनों इसी दुर्गम यात्रा से लौटा। इस यात्रा की एक खासियत यह भी रही कि पन्द्रह हजार फीट की उंचाई पर स्थित सतोपंत झील के किनारे नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे के स्वर भी गुंजायमान हुए। आईए आप भी कीजिए स्वर्गारोहिणी की यात्रा।
सतोपंत स्वर्गारोहिणी की इस दुष्कर यात्रा में भारत भक्ति परिवार से आशुतोष नवाल मन्दसौर,अनिल मेहता सैलाना,तुषार कोठारी(मैं स्वयं),अधिवक्ता परिषद से प्रकाश राव पंवार,दशरथ पाटीदार और संतोष त्रिपाठी तथा भारतीय किसान संघ के महेश चौधरी शामिल हुए। हमारा दल चार पहिया वाहन से करीब डेढ हजार किमी की यात्रा कर १० सितम्बर को उत्तराखण्ड के बद्रीनाथ पंहुचा। हमारे एक साथी अधिवक्ता संतोष त्रिपाठी ने सतोपन्त की कठिन यात्रा के लिए स्वयं को सक्षम नहीं पाया,ऐसे में इस यात्रा पर जाने वाले दल में छ: सदस्य थे।


सतोपन्त यात्रा हिमालय के ऐसे पर्वतीय क्षेत्रों से गुजरती है,जहां न तो कोई गांव है और ना ही इन्सानी बस्ती। कुछ है तो  सिर्फ आसमान से बातें करते बर्फ से ढंके पहाड,दुर्गम पहाडी रास्ते,बर्फीली हवाएं और हड्डियां जमा देने वाली सर्दी। इसलिए इस यात्रा के दौरान रात रुकने और भोजन इत्यादि की सारी व्यवस्था यात्रियों को अपने साथ ही लेकर चलना होता है। यात्रा की तैयारियों के लिए हमें एक दिन बद्रीनाथ में ही गुजारना पडा। यात्रा के दौरान उपयोग में आने वाली कई आवश्यक और महत्वपूर्ण वस्तुएं हल्के टेण्ट,स्लीपींग बैग्स,हैड लाईट्स आदि तो हमारे दल को उत्तराखण्ड एसडीआरएफ के पुलिस महानिरीक्षक संजय गुंजियाल जी के सौजन्य से प्राप्त हो चुकी थी,लेकिन यात्रा के दौरान लगने वाला राशन और गाईड इत्यादि की व्यवस्था हमें बद्रीनाथ में ही करना थी। इन सारी व्यवस्थाओं को जुटाने के बाद अब हमारा दल तेरह सदस्यीय हो गया था। हमारे दल में हम छ: यात्रियों के अलावा गाईड सूरज,कुक देवेन्द्र और प्रकाश ,कमल इत्यादि पांच पोर्टर शामिल थे।

पहला दिन-लक्ष्मीवन

 हमारी सतोपन्त यात्रा बारह सितम्बर को बद्रीनाथ से शुरु हुई। हम सारा सामान लेकर वाहनों द्वारा बद्रीनाथ से करीब तीन किमी माणा गांव के समीप पंहुचे,जहां से सतोपन्त का रास्ता शुरु होता है। आइटीबीपी के कैम्प के नजदीक से हमारी यात्रा करीब ग्यारह बजे शुरु हुई। चमकदार धूप खिली हुई थी और मौसम बेहद सुहावना था। चलना प्रारंभ ही किया था कि सामने एक छोटा सा मन्दिर आ गया। हमारे गाईड ने बताया कि यह भगवान बद्रीनाथ की माता का मन्दिर है। हमारा रास्ता अभी खेतों के बीच संकरे रास्ते से गुजर रहा था। कुछ ही देर बाद हम पहाडी संकरी पगडण्डी पर थे। हमारी दाई ओर नीचे अलकनन्दा प्रचण्ड वेग से बह रही थी,जबकि बाई ओर पहाड था। पहाड पर तरह तरह के जंगली फूल खिले हुए थे,जो मन को खुश कर रहे थे। लेकिन पगडण्डी तिरछी और बेहद संकरी थी। दाईं ओर सैकंडो फीट की गहराई में गिरने का भय था। बडी सतर्कता से चलते रहे। एक पहाड को घुमावदार रास्ते पर चलते हुए पार किया था कि अब सामने पथरीला रास्ता था। पहले तो घांस की वजह से फिसलन का डर नहीं था,लेकिन अब पथरीले रास्ते में सूखी मिट्टी की वजह से फिसलने का डर था। बडे बडे पत्थरों पर कूदते फांदते और कहीं कहीं पगडण्डी पर पांव धरते करीब तीन घण्टे तक लगातार चलते रहे। धीरे धीरे हमारी उंचाई बढ रही थी और आक्सिजन का दबाव कम होता जा रहा था। थोडी सी उंचाई चढने पर सांस फूलने लग रही थी। दाई ओर अलकनन्दा नदी के दूसरी ओर कुछ आगे एक विशालकाय झरना दिखाई देता रहा। यह वसुधारा झरना है। कहते है कि यह देवताओं का झरना है। वसुधारा झरने से गिरने वाले पानी फुहारे सामान्य मानव को स्पर्श नहीं होती। आप चाहे जितना कोशिश कीजिए झरने की फुहारें एकदम नजदीक होते हुए भी आपको स्पर्श नहीं करेंगी। ऐसे लोग बिरले ही होते है जिन्हे वसुधारा झरने का स्पर्श मिलता है। हांलाकि सतोपन्त जाने वाले यात्री वसुधारा को समीप से नहीं देख सकते। इसे समीप से देखने के लिए माणा गांव से नदी पार करके दूसरे रास्ते पर चलना पडता है।
एक पहाड की साईड से कुछ उंचाई चढने पर सामने नीचे की ओर घांस का मैदान सा नजर आया। इस मैदान में कुछ टेण्ट लगे हुए थे। यह देखते ही पहाडी रास्ते की थकान से कुछ राहत महसूस हुई। लगा कि हमारे रुकने का स्थान आ गया है। लेकिन गाईड सूरज ने बताया कि हमें अभी और चलना है। यह घाटी या मैदान चमटोली कहलाता है। आमतौर पर यात्रा से लौटते वक्त यात्री यहां पडाव करते है। लेकिन हमें लक्ष्मी वन पंहुचना था। फिर चल पडे। चमटोली का मैदान पार करते ही सामने फिर एख पहाडी उंचाई थी। इस पहाडी को पार करने और करीब एक घण्टे  तक चलते रहने के बाद जब एक पहाडी उंचाई पर चढे,तो सामने नीचे की ओर फिर से एक घांस का मैदान सा नजर आया। इस मैदान की दाईं ओर नीचे की तरफ भोजपत्र के ढेरों पेड लगे हुए थे। यही लक्ष्मीवन कहलाता है। दाई ओर अलकनन्दा का पाट भी चौडा हो चुका है। इसी लक्ष्मीवन में हमें पडाव करना था। हम लोग थक कर चूर हो गए थे,लेकिन हमारे पोर्टर अब तक आए नहीं थे। करीब एक घण्टा उनके इंतजार में बीता। पहाडों में आमतौर पर दोपहर दो बजे तक मौसम साफ रहता है,लेकिन दो बजने के बाद आसमान पर बादलों का कब्जा होने लगता है और सूर्य देवता अदृश्य होने लगते है। जैसे ही सूर्यदेव अदृश्य होते है,बर्फीली हवाएं तेज गति से बहने लगती है और ऐसे में खुले मैदान में बैठना या खडे रहना बेहद कठिन हो जाता है।
पोर्टरों के आने के बाद तेजी से टेण्ट लगाए गए। हम लोगों ने तुरंत दो टेण्टों पर कब्जा जमाया। अब हमारा कुक भोजन के इंतजाम में जुट चुका था। थोडी ही देर में उसने गर्मागर्म सूप हमें परोस दिया और शाम का भोजन तैयार करने में जुट गया। अब अंधेरा छा चुका था और हमें छोटे छोटे टेण्ट में स्लिपिंग बैग्स में रात गुजारना थी।  कडाके की ठण्ड में टेण्ट के भीतर स्लीपींग बैग में नींद ठीक से आती नहीं है। खैर जैसे तैसे हमारी यात्रा का पहला दिन गुजरा। पहले दिन हम जहां पंहुचे थे,वहां पंहुचने पर पाण्डवों का दूसरे अनुज सहदेव ने अपने प्राण छोडे थे। द्रौपदी और नकुल इससे पहले ही प्राण छोड चुके थे।

श्वान का साथ

महाभारत की कथा के अनुसार,जब पाण्डवों ने हिमालय से स्वर्ग जाने की यात्रा प्रारंभ की तो यात्रा की शुरुआत से ही एक काले रंग का कुत्ता उनके पीछे चल पडा था। कथा यह भी बताती है कि द्रौपदी और चारों पाण्डव एक एक करके युधिष्ठिर का साथ छोड गए लेकिन काले श्वान ने अंत तक युधिष्ठिर का साथ नहीं छोडा। जब युधिष्ठिर स्वर्ग के द्वार पर पंहुच गए तो उनसे कहा गया कि वे भीतर आ सकते है,लेकिन कुत्ता नहीं आ सकता। तब युधिष्ठिर ने कहा कि वे कुत्ते के बगैर स्वर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे। तभी कुत्ते के रुप में चल रहे धर्मराज स्वयं प्रकट हो गए। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि सतोपन्त यात्रा प्रारंभ करने वाले यात्रियों के पीछे आज भी काला कुत्ता चलता है। हमारी यात्रा शुरु हुई,तभी एक झबरीला काला कुत्ता न जाने कहां से आया और हमारे साथ साथ चलने लगा। यह श्वान लक्ष्मी वन और उसके बाद भी हमारे साथ चलता रहा।

दूसरा दिन-चक्रतीर्थ

 यात्रा का दूसरा दिन पहले दिन से अधिक कठिन था। रास्ता पहले से अधिक दुर्गम। लक्ष्मी वन की जिस घाटी में हम रुके थे,उससे आगे बढने के लिए सामने मौजूद एक पहाड को पार करना था। सामने खडी चढाई थी। खडी चढाई पार करने में बार बार सांस फूलने लगती थी। हमारी दाई ओर चल रही अलकनन्दा नदी का उद्गम स्थल भी वहीं था। इस क्षेत्र को अलकापुरी कहा जाता है। इसी ग्लैशियर से अलकनन्दा का उद्गम है।
खडी चढाई पार करने के बाद उंचे पहाड से गिरते एक झरने को हमने निचले हिस्से से पार किया। ये पूरी रास्ता बडे बडे पत्थरों वाला था। यहां ये पता ही नहीं चलता है कि जाना किधर है। यात्रियों के मार्गदर्शन के लिए एक के उपर एक पत्थर जमा कर संकेतक बनाए गए है। हमारे साथ तो हमारा गाईड सूरज भी था। इस पथरीले रास्ते को पार करना बेहद कठिन है। पत्थरों का कोई भरोसा नहीं कि वे कब लुढक जाएंगे। इन पत्थरों पर कूदते फांदते हम आगे बढे। अब हमारी बाई ओर एक दीवारनुमा पहाड था,जिसपर एक के बाद एक कई झरने गिर रहे थे। ये क्षेत्र सहधारा कहलाता है। सहधारा के झरनों के सामने ही एक उंची पहाडी की कगार पर से हमारा रास्ता गुजर रहा था। इस पहाडी कगार की दोनो ओर गहरी खाईयां है और चलने के लिए बेहद संकरा रास्ता। प्राकृतिक सौन्दर्य का दर्शन करने की इच्छा होती है और साथ ही रास्ते की भयावहता आपको इस सौन्दर्य का आनन्द लेने से रोकती है। एक गलत कदम आपको सैंकडों फीट नीचे पथरीली खाईयों में पंहुचा सकता है। तलवार की धार जैसी इस पहाडी कगार पर करीब दो ढाई किमी चलने के बाद रास्ता नीचे की ओर उतरा और हम अपेक्षाकृत समतल मैदान में से गुजरने लगे। ये मैदान समाप्त होने पर सामने फिर से एक पहाड खडा था। इस पहाड की दूसरी ओर वह स्थान था जिसे चक्रतीर्थ कहा जाता है। चक्रतीर्थ में ही धनुर्धारी अर्जुन ने अपने प्राण त्यागे थे।
हम सुबह करीब साढे आठ बजे लक्ष्मीवन से चले थे। हमारा भाग्य अच्छा था कि मौसम बिलकुल साफ था और चमकदार धूप खिली हुई थी। चक्रतीर्थ की घाटी में पंहुचते पंहुचते दोपहर के दो बज गए। अभी हम चक्रतीर्थ की घाटी में पंहुचे ही थे कि बूंदाबांदी शुरु हो गई। घाटी के किनारे पर बनी एक प्राकृतिक गुफा के भीतर घुस कर हमने बारिश से अपना बचाव किया। बूंदाबांदी थोडी ही देर हुई। आसमान फिर से साफ हो गया और सूरज फिर से चमकने लगा। हमारे पोर्टर अभी पंहुचे नहीं थे। हमें उनका इंतजार करना था। करीब साढे तीन बजे हमारे पोर्टर चक्रतीर्थ पर पंहुचे और टेण्ट लगाए गए।
चक्रतीर्थ का यह मैदान भी बडा अनोखा है। पूरे मैदान में घांस बिछी हुई है। मैदान के चारों ओर पहाडी झरने से बनी प्राकृतिक नहरें है,जिसमें पानी मन्द गति से बहता रहता है। कैम्प लगाने के लिए यह आदर्श स्थान है। पानी एकदम पास में उपलब्ध है। टेण्ट लगाने के लिए बडे बडे पथरीले टीले मौजूद है,जिसकी आड में टेण्ट को तेज हवा से सुरक्षा मिलती है।
चक्रतीर्थ का पडाव बडा ही सुकून देने वाला था। शाम को भोजन के बाद हमारे पोर्टर आसपास से जंगली घांस उखाड लाए थे। केरोसीन की मदद से इस घांस का अलाव जलाया गया और काफी देर तक अलाव का आनन्द लेते रहे। अब हम सतोपंत के बेहद नजदीक पंहुच चुके थे। चक्रतीर्थ से सतोपन्त झील करीब साढे पांच किमी ही दूर है। पहले हमारा इरादा अगली रात सतोपन्त पर बिताने का था,लेकिन हमें पता चला कि सतोपन्त पर कैम्प लगाने के लिए बहुत सीमित जगह उपलब्ध है। इसलिए सभी साथियों ने यही विचार किया कि चक्रतीर्थ में लगाए हुए कैम्प को यहीं रहने दिया जाए और सभी यात्री अगले दिन सतोपन्त और स्वर्गारोहिणी तक जाकर पुन: चक्रतीर्थ पर ही आ जाएं।

तीसरा दिन-देवताओं की झील सतोपन्त

सतोपन्त वास्तव में सत्य का पंथ है। कहते है स्वर्ग की यात्रा के दौरान युधिष्टिर के साथ यहां तक केवल भीमसेन पंहुच सके थे। लेकिन इससे आगे भीमसेन भी नहीं जा पाए। यहां से आगे युधिष्ठिर के साथ केवल एक श्वान स्वर्ग की सीढियों तक पंहुचा था,जो वास्तव में धर्मराज थे। चक्रतीर्थ से हमारी पदयात्रा सुबह करीब साढे आठ बजे प्रारंभ हुई। आसमान साफ था और चमकीली धूप खिली हुई थी। चक्रतीर्थ के मैदान से निकलते ही सामने एक विशालकाय पहाड मौजूद था,जिसकी दूसरी तरफ सतोपन्त झील का रास्ता था। इस पहाडी की कगार पर झण्डे लगे हुए है,जो बताते है कि सतोपन्त अब नजदीक ही है। इस पहाड की चढाई एकदम खडी चढाई थी। इस पर चढना बेहद कठिन साबित हो रहा था। आठ-दस कदम चलने पर ही रुकना पडता था,क्योंकि इतने में ही सांस फूल जाती थी। बहुत धीमे धीमें इस खडी चढाई को पार कर पहाडी की चोटी पर पंहुचे। पहाडी की कगार बेहद संकरी और तीखी थी। यहां केवल एक व्यक्ति खडा रह सकता है। दोनो ओर तीखी ढलान है। पहाडी के उपर पंहुचते ही दूसरी ओर तीखी ढलान से उतरना पडता है। यह ढलान पथरीली तो है ही सूखी मिट्टी के कारण फिसलन भरी भी है। पहाडी की कगार पर कुछ देर सुस्ताने के बाद सभी यात्री ढलान पर सतर्कता के साथ उतरने लगे। आगे का रास्ता पत्थरों पर से ही था। दो तीन पहाडियों को साईड से पार करने के बाद सामने फिर एक चोटी नजर आई,जिस पर फिर से झण्डे लगे हुए नजर आए। पता चला कि इसी पहाडी के पीछे सतोपन्त झील है। झण्डे नजर आने के बाद थकान का एहसास खत्म सा हो गया और झील को देखने का उत्साह हावी हो गया। इस पहाडी की खडी चढाई इसी उत्साह के सहारे पार कर ली। पहाडी के उपर पंहुचते ही दूसरी ओर देवताओं की झील सतोपंत  हमारी आंखों के सामने थी। हम पन्द्रह हजार एक सौ फीट की उंचाई पर थे। झील के किनारे पर पंहुचने के लिए फिर से पहाडी पर नीचे उतरना था। हम करीब ढाई घण्टे में सतोपन्त झील पर पंहुच गए थे। यह एक तिकोनी झील है। कहते है ये ब्रम्हा,विष्णु और महेश की झील है। तीनों देवता इस झील में स्नान करने आते है। इस झील की एक ओर विशेषता है कि इसके पानी की सतह पर एक तिनका भी नहीं रहता। यदि कहीं से कोई कचरा या तिनका आ जाते है,तो इस क्षेत्र में पाए जाने वाले विशीष्ट पक्षी तुरंत इस कचरे या तिनके को अपनी चोंच से उठाकर बाहर फेंक देते है।
हमारी यात्रा का लक्ष्य सतोपन्त ही था। सभी यात्रियों ने सतोपंत के पवित्र जल में डुबकी लगाई। यात्रा शुरु होने के बाद यह पहला मौका था,जब स्नान का अवसर मिला था। यह पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक चेतना वाला  क्षेत्र है। स्नान के बाद सभी ने ध्यान भी किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक भारतीय किसान संघ के प्रान्तीय संगठन मंत्री महेश चौधरी ने झील के किनारे पर शाखा लगाकर प्रार्थना करने का सुझाव दिया। सभी ने इसका समर्थन किया और फिर झील के किनारे पर नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि के स्वर गुंजायमान हो गए। सतोपंत झील पर अधिवक्ता परिषद के साथी प्रकाश राव पंवार द्वारा साथ लाए गए राष्ट्रीय ध्वज और अधिवक्ता परिषद के बैनर के साथ फोटो खींचे गए। वन्दे मातरम के नारे भी खूब लगाए। करीब डेढ घण्टे तक झील के शांत आध्यात्मिक वातावरण में रहने के बाद अब समय था आगे बढने या लौट जाने का। छ: यात्रियों में केवल दो दशरथ पाटीदार और महेश जी चौधरी ने आगे जाने की इच्छा जताई। वे पहाड पर आगे बढ गए। शेष साथियों का कहना था कि जब स्वर्ग की सीढियों के दर्शन यहीं से हो रहे हैं,तो आगे जाने का क्या फायदा?
वैसे स्वर्गारोहिणी के लिए यहां से करीब सात किमी आगे तक जाना होता है। कहते है कि स्वर्गारोहिणी पर्वत पर तो कोई नहीं जा पाता,इस पर्वत पर जमी बर्फ में स्वर्ग जाने की सीढियां साफ दिखाई देती है। ये सीढियां सतोपंत झील से भी साफ नजर आती है। हांलाकि कोई भी यात्री बहुत अधिक आगे तक नहीं जा पाता क्योंकि आगे ग्लैशियर प्रारंभ हो जाता है और बर्फीली खाईयों में होकर चलना संभव नहीं हो पाता।
बहरहाल,हमारे दो साथी भी करीब एक डेढ किमी आगे जाने के बाद लौट आए। वापसी आसान थी,क्योंकि अब ढलान अधिक था और ढलान पर सांस फूलने की समस्या नहीं रहती। केवल इस बात की सतर्कता बरतनी होती है कि पैर फिसल ना जाए। हमारा दल करीब ढाई बजे तक फिर से चक्रतीर्थ के मैदान में था।

चौथा दिन-फिर से बद्रीनाथ

वास्तविक यात्रा पांच दिनों की थी। लेकिन पहाड की थका देने वाली कठिन यात्रा ने सभी यात्रियों को थका दिया था। सभी का यह मत था कि वापसी का पूरा रास्ता एक ही दिन में पार किया जा सकता है। सुबह नौ बजे चक्रतीर्थ से चले,तो सहधारा की खतरनाक पहाडी कगार,सीधी चढाई वाले पहाड,तीखी ढलान और पथरीले रास्तों को तेजी से पार करते हुए करीब डेढ बजे चमटोली के मैदान में जा पंहुचे। यहां कुछ देर रुक कर आराम किया। पोर्टर साथ ही चल रहे थे। हमारे कुक ने यहां चाय बनाकर पिलाई,जिससे सभी लोग फिर से तरोताजा हो गए। शाम को चार-साढे चार तक हम सभी लोग माणा के समीप आईटीबीपी के उसी कैम्प पर पंहुच गए जहां से पदयात्रा प्रारंभ की थी। यहां से अब हमें बद्रीनाथ पंहुचना था। अपने वाहन से हम बद्रीनाथ जा पंहुचे। अंतिम दिन हमने करीब उन्नीस किमी की पैदल यात्रा की। यात्रा समाप्ति के बाद शरीर का पोर पोर दुख रहा था,लेकिन मन में संतोष था कि हम भी देवताओं की झील के पवित्र पानी में डुबकी लगा चुके है और स्वर्ग की सीढियों को देख चुके है।

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