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चन्द्रशेखर जीवन भर आजाद रहे और आजाद रहकर मृत्यु को वरन कर शहीद हो गए

लेखक – श्यामलाल बोराना

क्रांतिकारी शब्द में ही व्यवस्था परिवर्तन एवं क्रांति के व्यक्तित्व की गाथा छिपी हुई होती हैं। इस व्यवस्था परिवर्तन के लिये क्रांतिकारियों ने अपना जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया एवं अपना नाम भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित करवा लिया। देश की आजादी के लिये प्रथम प्रयास सन् 1857 की क्रांति के द्वारा हुआ था परन्तु इस समय अंग्रेजों ने क्रांति को दबा दिया था। उसके बाद सन् 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई थी इसी स्थापना अंग्रेज ए.ओ.ह्मूम ने की थी। अंग्रेजों ने अपने हित के लिये तथा भारतीयों के असंतोष को कम करने के लिये की थी।

प्रारंभ में दादाभाई नोरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने भारतीयों के लिये न्याय एवं सुधारों की मांग करते रहे। धीरे धीरे कांग्रेस का नेतृत्व एवं विचारधारा में परिवर्तन हुआ। उनके प्रमुख नेता थे लोकमान्य तिलक, विपिन चन्द्रपाल, लाला लाजपत राय ये अंग्रेजों से अधिकार पूर्ण दमदारी से बात करते थे। सुधार के बजाय पूर्ण स्वराज्य की मांग की जाने लगी। इसी के बीच में देश में नवयुवकों में क्रांतिकारी विचारधारा का उदय हुआ। इनके प्रमुख नेता थे श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला हरदयाल, वीर सावरकर आदि। इन्हानें अंग्रेजी सत्ता को भारत से उखाड़ फेंकनें के लिये सभी प्रकार के प्रयासों को अपनानें में संकोच नहीं किया। इसी उग्र वरिवर्तन विचारधारा ने देश में कई युवा क्रांतिकारियों को जन्म दिया जिन्होनें अंग्रेजी सत्ता को हिला दिया उनमें से एक देदीप्यमान क्रांति का चमकता हुआ सितारा चन्द्रशेखर आजाद भी प्रमुख थे। चन्द्रशेखर आजाद का जन्म म.प्र. के आदिवासी क्षैत्र झाबुआ अलिराजपुर के पास छोटे से गांव भाभरा में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। इनके पिता का नाम सीताराम तिवाारी था। इनकी माता का नाम श्रीमती जगरानी था।
आपकी माता बहुत ही स्वाभिमानी थी। आपने जीवन में बहुत कठिनाईयों को छेलना स्वीकार किया परन्तु किसी से किसी प्रकार की सहायता स्वीकार नही की। चन्द्रशेखर का बचपन गरीबी में व्यतीत हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई फिर अलीराजपुर में आपने पढ़ाई की। भोले भाले आदिवासी भीलों के बिच में रहने के कारण चन्द्रशेखर बचपन से ही निर्भिक, साहसी, जुझारु एवं स्वाभिमान से जीवन यापन करनें के आदि हो गए थे। अतः आप हर पस्थििती में प्ररसन्न रहते थे। 14 वषर््ा की उम्र में आगे अध्ययन करनें के लिए तथा सेस्कृत पढ़नें के लिए आप काशाी चले गए। इस समय अंग्रेज प्रथम विश्व युद्ध में (1914-1919 तक) उलझे हुए थे तथा भारतीय भी अपनी स्वतंत्रता के सपने संजोए जा रहे थे। भारतीयों के ह्मदय पटल पर स्वतंत्रता की चिंगारी प्रज्जवलित हो रही थी। भारतीयों में अंग्रेजों के खिलाफ भावना प्रज्जवलित हो रही थी एवं राष्ट्रीयता की भावना दृढ़ होती जा रही थी। इस समय गांधीजी के नेतृत्व में भारत में असहयोग आंदोलन चल रहा था। चन्द्रशेखर की इस आंदोलन में भागीदारी दे रहे थे। अंग्रजो ंने आपको गिरफ्तार कर लिया। मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया मजिस्ट्रेट ने इनसे इनका नाम पुछा।

इन्होनें उत्तर दिया। मेरा नाम आजाद है। पिता का नाम स्वतंत्रता है। निवास स्थान जैल बताया। इस प्रकार चन्द्रशेखर की निर्भिकता निडरता ने क्रांतिकारियों में उत्साह का संचार कर दिया। भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना को दबानें के लिये अंग्रजों ने 1919 में रोलेट एक्ट पारित किया इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए किसी को भी गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया जाएगा। भारतीयों ने इसे काला कानून कहा। इसका पूरे भारत में विरोध हुआ। गांधीजी के आव्हान पर इस कानून के विरोध में 6 अप्रेल 1919 को हड़ताल और प्रदर्शन किये गए। आंदोलन की तिव्रता को देखते हुए गांधीजी 7 अप्रेल 1999 को दिल्ली आ रहे थे। उन्हें पलवल (हरियाणा) में गिरफ्तार कर लिया तथा बंबई भेज दिया। 13 अप्रेल 1919 को अमृतसर के जलियावा बाग में रोलेट एक्ट के विरोध में सभा हो रही थी। उस समय जनरल डायर ने भीड़ को तीतर बीतर करनें के लिये सभा पर मशीनगन से गोलियाँ चलवा दिया जिसमें सैकड़ों व्यक्ति मारे गए।
चन्द्रशेखर आजाद के मन को रोलेट एक्ट एवं जलियावा बाग के हत्याकाण्ड ने झकझोंर दिया उन्होनें अपने मन ही मन दृढ़ संकल्प किया कि अंग्रेजों को भारत से निकाल कर ही दम लेंगे। इस समय उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी दल का नेतृत्व चन्द्रशेखर आजाद रामप्रसाद बिस्मिल और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी कर रहे थे। इस दल के पास धन का अभाव था। क्रांतिकारी हथियार आदि सामग्री खरीदना चाहते थे। उन्होनें सरकारी खजना लूटनें की योजना बनाई जिस गाड़ी से सरकारी खजाना जाता है। उस गाड़ी से सरकारी खजाना लूटनें के लिए योजना बनाई तथा कांकोरी गांव के यहॉ 9 अगस्त 1925 को जंजीर खींचकर गाड़ी को रोक दिया। क्रांतिकारियों ने हवा में गोलियॉ चलाई और खजानें की पेटियॉं तांेड़कर उसमें से खजानें की थेलियॉ लूटकर चले गए। इतिहास में इस काण्ड को कांकोरी केस के नाम से जाना जाता हैं। इसमें चन्द्रशेखर आजाद का भी प्रमुख हाथ था परन्तु वो गिरफ्तार नहीं किये जा सके थे। इस केस में रामप्रसाद बिस्मिल तथा अन्य नेताओं को मृत्युदण्ड दे दिया। रामप्रसाद बिस्मिल की मृत्यु के पश्चात् क्रांतिकारी दल का नेतृत्व चन्द्रशेखर आजाद के हाथ में आ गया। भारत में अंग्रेजों के खिलाफ वातावरण निर्मित हो गया था। इसको कम करनें के लिये अंग्रेजों ने भारत में नागरिकों को सुधारों एवं सुविधाएॅ देकर अंग्रेजों के खिलाफ नाराजगी को दूर करनें का प्रयास करने के लिये एक आयोग साइमन कमीषन भेजा परन्तु साइमन कमीशन का भारत ने विरोध किया।
लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध लाला लाजपतराय के नेतृत्व में हुआ। एक बड़ा जुलूस निकाला गया। उस जुलूस अंग्रेज पुलिस अधिकारी सेंडर्स ने लाठी चार्ज करवा दिया। इसमेें लाला लाजपत राय पर भी लाठियॉ बरसाई गई। उन्हें गंभीर चोंटे आई वो अधिक दिन जिंदे नहीं रह सके। 17 नवम्बर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। लाला लाजपतराय की मृत्यु पर विशाल शोक सभा हुई। इस शोक सभा में वासन्ती देवी ने भावुक होकर ह्दयस्पर्शी उद्बोधन देकर श्रद्धांजली दी इस समय उन्होनें कहा यह भारत के 30 करोड़ नर नारीयों का प्यारा था। क्या देश का योवन और मनुष्यत्व आज जीवित है। युवक आगे आकर मुझे उत्तर देंवे। इस श्रद्धांजलि सभा में वासन्ती देवी के उद्बोधन का चन्द्रशेखर के ह्दय पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होनें सेन्डर्स की हत्या की योजना बनाई। चन्द्रशेखर ने यह कार्य भगतसिंह और अन्य साथियों को सौंपा। 17 दिसम्बर 1928 को सेंडर्स की हत्या कर दी गई। चन्द्रशेखर इन्हें यहॉ से बचाकर निकाल ले गए। दिल्ली असेम्बली में बम फेंकने की योजना भी चन्द्रशेखर ने भगतसिंह के साथ मिलकर बनाई थी।

चन्द्रशेखर ने अंग्रजों के मन में भय पैदा कर दिया था। अंग्रेज चन्द्रशेखर के नाम से ही विचलित होने लगे थे। वो किसी भी प्रकार से चन्द्रशेखर को गिरफ्तार करना चाहते थे। अंग्रेजों ने सभी प्रकार के हतकंडे अपनाए। 27 फरवरी 1921 को चन्द्रशेखर आजाद ईलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में अपने साथियों के साथ बैठकर योजना बना रहे थे। इसी समय उन्हीं के दल के सदस्य ने पुलिस को सूचित कर दिया। पुलिस ने आकर उन्हें घेर लिया। उन्होनंे अपने साथियों को वहां से निकल जानें को कहा और आमने-सामने गोलियॉ चल रही थी। उनकी पिस्तोल में एक गोली बची थी चो उन्होनें अपनी कनपट्टी पर मारी और शहीद हो गए। वो गिरफ्तार होकर गुलामी का जीवन नहीं चाहते थे। वो जीवन भर आजाद रहे और आजाद रहकर मृत्यु को वरन कर शहीद हो गए। भारत की आजादी के महायज्ञ में क्रांतिकारियों के बलिदान, त्याग को हमेंशा याद रखा जावेगा। क्रांतिकारियों की शहादत को नमन्

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