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एक पत्रकार भी थे शहीदे आज़म भगतसिंह

शहीद भगतसिंह के बलिदान दिवसः23 मार्चः पर विशेष

रतलाम,23 मार्च (इ खबरटुडे)। भगतंिसंह में क्रांति के भाव बचपन से ही मौजूद थे। यह भी कहा जा सकता है कि भगतंिसंह जन्म से ही क्रांतिकारी थे। इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि जलियाँवाला बाग की घटना ने उन्हें इतना व्यथित किया कि वे इस स्थान पर जाकर षहीदों के खून से सनी मिट्टी अपने साथ ले आए। इस घटना ने भगतंिसंह को पत्रकारिता की तरफ जाने की प्रेरणा भी दी। भगतसिंह कुशल पत्रकार थे,और आज की विकसित पत्रकारिता से अधिक सशक्त और गंभीर पत्रकारिता करते थे। 

शहीदे-आज़म के इस रूप को उजागर किया है युवा लेखक आशीष दशोत्तर ने। लेखन से पिछले काफी समय से जुड़े रहे आशीष दशोत्तर की हाल ही में उद्भावना प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक‘समर में शब्द‘ में भगतसिंह को एक पत्रकार के रूप में देखने की कोशिश की गई है। आशीष ने इस बारे में बताया कि भगतसिंह जानते थे कि क्रांति के लिए चैतरफा प्रयास किये जाने आवष्यक है।  अमूमन किसी बड़े व्यक्ति के सामने जाने से या तो डर का भाव आता है या मन में बेचैनी होती है पर जब उन्हें गणेष षंकर विद्यार्थी जैसे   प्रखर पत्रकार का सन्निध्य मिला तो इससे भगतसिंह न तो हताष हुए और न ही परेषान,बल्कि इसे अपना सौभाग्य समझा और अपने मिशन मे पत्रकारिता का हाथ थाम लिया। उस वक्त ‘प्रताप’ का महत्व चरम पर था। ‘प्रताप’ से जुड़ना और गणेष षंकर विद्यार्थी का सामीप्य हर कोई चाहता था। विद्यार्थी जी की लेखनी से पूरा देष परिचित था। ‘प्रताप’ ने क्रांति की ऐसी मषाल जला रखी थी, जिसने अंग्रेजों को बेचैन कर रखा था। ऐसे वक्त ‘प्रताप’ से जुड़कर भगतसिंह ने अपने भीतर छुपे पत्रकारिता के गुणों को निखारा। यद्यपि पत्रकार बनना ही उनका एकमात्र लक्ष्य नहीं था, मग़र वे पत्रकार के महत्व से वाकिफ थे। विद्यार्थी जी के साथ रहकर उन्होंने इतना तो समझ ही लिया था कि क्रांति की अलख जगाने का यह सषक्त माध्यम है। उन्होंने यह भी समझ लिया था कि दुनिया की विसंगतियों को जवाब देना है तो अपने ज्ञान को परिपक्व बनाना आवष्यक है। उन्होंने लिखा भी, ‘‘मेरे मन-मस्तिश्क में अध्ययन की तीव्र इच्छा अंगडाइयाँ ले रही थी। विपक्ष   द्वारा पूछे गए सवालों का सामना करने के लिए अपने आप को अध्ययन के जरिये तैयार करों। मैंने अध्ययन करना षुरू किया।’’ भगतसिंह अब यह समझ चुके थे कि ‘‘हमें उस आदर्ष का स्पश्ट ज्ञान होना चाहिए जिसके लिए हमें संघर्श करना है।’’ विद्यार्थी जी और भगतसिंह का साथ जितना भी रहा वह उनके साथियों के लिए भी रहस्यमय बना रहा। वे ‘प्रताप’ में निरंतर लिखते रहे। भगतसिंह काकोरी के अभियुक्तों को जेल से छुडाने की योजना के समय कानपुर आए तब उन्होंने बबर अकाली आन्दोलन के षहीदों पर लेख ‘होली के दिन खून के छींटे’ षीर्शक से लिखा जो 15 मार्च 1926 के साप्ताहिक ‘प्रताप’ में प्रकाषित भी हुआ। यह लेख उन्होंने ‘‘एक पंजाबी युवक’’ के नाम से लिखा था।
दशोत्तर ने अपनी पुस्तक में अनेक संदर्भों का उल्लेख करते हए कहा है कि भगतसिंह अगर क्षणिक पत्रकार होते या सिर्फ क्रांतिकारी ही होते तो पत्रकारिता की राह को कभी का छोड़ देते। यह भी संभव था कि वे पत्रकारिता को समय मिलने पर महत्व देते। मग़र ऐसा नहीं था। वे पत्रकारिता से जिस तरह प्रारंभ से जुड़े थे, आखिरी समय तक उसी षिद्दत से जुड़े रहे। माडर्न रिव्यू के सम्पादक रामानन्द चटर्जी ने सम्पादकीय टिप्पणी में ‘‘इन्कलाब जि़न्दाबाद’’ नारे का मखौल उड़ाया। भगतसिंह को यह उचित नहीं लगा तो उन्होंने ‘सम्पादक के नाम पत्र’ का सहारा लिया। उन्होंने सम्पादक की टिप्पणी का माकूल जवाब इस पत्र में दिया जो बाद में 24 दिसम्बर 1929 के द ट्रिब्यून में छपा भी। इस पत्र में उन्होंने लिखा, ‘‘दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विषेश भावना प्राप्त हो चुकी है, जो सम्भव है भाशा के नियमों एवं कोश के आधार पर इसके षब्दों से उचित तर्क सम्मत रूप में सिद्ध न हो पाये परन्तु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इसके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के घोतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न हो गए हैं तथा एक सीमा तक उनमें निहित है।’’ किसी अखबार में सम्पादक को उसकी टिप्पणी पर इस तरह की चुनौती वही दे सकता है जो न सिर्फ अपने मकसद के प्रति संकल्पित हो, बल्कि वह अखबार की गरिमा, सम्पादक के महत्व और सम्पादकीय टिप्पणी के परिणामों को बखूबी समझता हो। यह संभव था कि यदि भगतसिंह द्वारा इस तरह सम्पादक के नाम पत्र लिखकर अपनी बात नहीं रखी जाती तो, सम्पादक की टिप्पणी को ही सच समझा जाता और ‘इन्कलाब जि़न्दाबाद’ के सही अर्थों को समझा ही नहीं जाता।
श्री दशोत्तर ने बताया कि किसी पत्रकार के लिए यह आवष्यक होता है कि वह अपने विचारों के प्रति दृढ़ रहे और अपने तथ्यों के प्रति आष्वस्त। यदि क्रांति की बात भगतसिंह करते थे तो वे अपने अन्य क्रांतिकारी साथियों से इसीलिए बेहतर साबित हुए क्योंकि उनमें मौजूद पत्रकार अपनी इस बात को प्रमाणित करने की क्षमता रखता था। उन्होंने तभी कहा, ‘‘क्रांति के लिए खूनी लडा़इयाँ अनिवार्य नहीं है। न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। ये बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय, अन्याय पर आधारित मौजूद समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन है।’’ भगतसिंह ने अपने पत्रकारिता जीवन में कई मुद्दों पर अनेक लेख लिखे। वे सिर्फ क्रांति की बात नहीं करते रहे। उन्हें अपने समाज की विसंगतियों का भी ध्यान था। समाज में बढ़ते भेदभाव पर उन्होंने कहा, ‘‘यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती।’’ आज अगर भगतसिंह की बातें सच साबित हो रही है तो इसका सीधा सा आषय यही है कि सच्चा पत्रकार अपने वर्तमान पर लिखता तो है मग़र उसके सामने आने वाले सौ सालों के बदलावों का मंज़र मौजूद होता है। यह गुण भी भगतसिंह केा एक पत्रकार साबित करता है।
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